उत्तर आधुनिक ब्रह्मांड मनुस्मृति व्यवस्था में खतरे में हैं मनुष्य और प्रकृति।
कारपोरेट साम्राज्यवाद ने पूरी दुनिया को आखेटगाह बना डाला है। स्वतंत्रता, संप्रभुता,राष्ट्रीयता बेमायने हो गयी हैं।
मारे जा रहे हैं मूलनिवासी। मेरे अपने लोग। आधी दुनिया शरणार्थी हैं। नागरिकता, मानवाधिकार, उत्पादन साधनों और आजीविका से बेदखल। बाजारू नयी दुनिया में जिनका प्रवेश निषेध।
ऐसे मूलनिवासियों के ग्लोबल प्रतिरोध का कथा हे पलाश कथा।
मैंने पहले खाड़ी युद्ध के बाद अपना उपन्यास शुरु किया- अमेरिका से सावधान। तो लोगों ने कहा कि भारत स्वतंत्र, संप्रभु राष्ट्र है और यहां अमेरिका कोई खतरा नहीं है।
अब हम क्या देख रहे हैं?
प्रधानमंत्री तक विश्व बैंक का गुलाम। बजट वाशिंगटन में तय होता है। सेज के बहाने देश के भीतर सैकड़ों उपनिवेश तैयार हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरोधी वामपंथी पूंजीवाद के सबसे बड़े प्रवक्ता बन गये हैं।
नंदीग्राम से कातिलो की नयी संस्कृति शुरु हो गयी।
पलक पांवड़े बिछाकर कोलकाता में वियतनाम के कसाई का स्वागत हुआ।
आखेटगाह बनगया है पूरा देश। राजनीतिक दल , सरकारे और लोकतांत्रिक संस्थानें कारपोरेट बन चुकी हैं। नौकरिया हैं नहीं। उच्च शिक्षा का बंटाधार। मातृभाषाएं, देशज उत्पादन प्रणालियां, आजीविकाएं , राष्ट्रीयताएं, नागरिकता, मानवाधिकार सबकुछ बेदखल।
ग्लोबल दुनिया में जनपद मृत। ग्लोबल बाजार में ग्लोबल सत्तावर्ग के विरुद्ध वैश्विक प्रतिरोध के सिवाय अब कोई विकल्प नहीं है।
आपके विचारों का स्वागत है। हिंदी में नेट पर लिखने के पिछले सारे प्रयास फेल हो गये। अब देखें कि संवाद का कोई जरिया बन पाता है या नहीं।
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