सुपरपावर हिन्दू राष्ट्र के पंख खुलने लगे
पलाश विश्वास
बंगाल में जमीन और मुसलमान वोट बैंक हासिल करने के खातिर बंगाली कुलीन ब्राह्मण मार्क्सवादी और कांग्रेसी अमेरिकी गुलामों के सौजन्य से भारत अमेरिकी परमाणु समझौते के बहाने आपरेशन ब्लू स्टार के जरिये राष्ट्रव्यापी सिखनिधन, राम मंदिर आंदोलन और बाबरी विध्वंस के बाद फिर एक बार ब्राह्मणवादी हिन्दू पुनरुत्थान ने जोर मारा है और उत्तर आधुनिक आकाशगंगा मनुस्मृति व्यवस्था का ग्लोबल श्वेत यहूदी ब्राह्मण सत्तावर्ग बाग बाग है कि नेपाल में अंतिम हिंदू राष्ट्र का अवसान हुआ तो क्या भारत अब सुपर पावर हिन्दू राष्ट्र , बस, बनने ही वाला है।
मार्क्सवादी, कम्युनिस्ट और नक्सलवादी धड़ों के तमाम नेता चूंकि व्राह्मण ही हैं, सो हिन्दू राष्ट्र के इस इंद्रधनुषी सपने से उनकी नींद में खलल नहीं पड़ने वाली। आखिर वे अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस की सरकार गिरी तो भी आखिरकार राज करेंगे बामहण ही। अमेरिकी आका नाराज भी न होंगे, क्योंकि जो परमाणु समझौता रुका हुआ है साठ वामपंथी सांसदों की नौटंकी की वजह से, वह संघ परिवार के सत्ता में आते ही अमल में आ जाएगा।
भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते पर कांग्रेस और वामपंथी दलों के बीच जारी गतिरोध आज और गहरा हो गया तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने धमकी दी कि अगर संप्रग सरकार ने इस समझौते को आगे बढ़ाया तो वह उससे समर्थन वापस ले लेगी ।
आज नई दिल्ली में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि अगर सरकार ऐसे हानिकारक समझौते को आगे बढ़ाने का फैसला करेगी, जिसे संसद में समर्थन नहीं मिला है, तो माकपा अन्य वामपंथी दलों के साथ मिलकर संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लेगी ।
परंतु संप्रग की नेता कांग्रेस ने इस धमकी को ज्यादा महत्व न देते हुए कहा कि इस चेतावनी में कुछ भी नया नहीं है । गौरतलब है कि संप्रग सरकार वामपंथी दलों के 59 सांसदों के सहयोग पर टिकी हुई है, जो बाहर से समर्थन दे रहे हैं ।
संप्रग के महत्वपूर्ण सहयोगी दल, राष्ट्रीय जनता दल, जिसके 24 सांसद हैं, ने विश्वास जताया कि इस समझौते पर सरकार नहीं गिरेगी और यह समझौता भी सम्पन्न होगा ।
सरकार इस समझौते को आगे ले जाने की इच्छुक है, जिससे सरकार और वामपंथी दलों के बीच गतिरोध गहराता जा रहा है । माकपा के महासचिव प्रकाश करात ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में समर्थन वापस लेने की पहली सार्वजनिक घोषणा की ।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसे अन्य वामपंथी दल पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगर सरकार इस समझौते पर अड़ी रही तो वे समर्थन वापस ले लेंगे, लेकिन माकपा अभी तक केवल समर्थन वापस लेने के संकेत दे रही थी ।
बताया जाता है कि अब संप्रग सरकार समाजवादी पार्टी, जिसके 39 सांसद हैं और कुछ अन्य छोटे दलों का समर्थन लेने का प्रयास कर रही है ताकि वामपंथी दलों द्वारा समर्थन वापस लिये जाने पर लोकसभा में उसे पर्याप्त सांसदों का समर्थन मिल जाए और सरकार बची रहे ।
अब सबकी नजरें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव पर टिकी हुई हैं, जिन्होंने अपनी पार्टी के रवैये के बारे में कुछ खुलासा नहीं किया है और कहा है कि वह 3 जुलाई को फैसला करेंगे, जब यूएनपीए की बैठक होगी । परंतु समझा जाता है कि उनके प्रमुख सहयोगी अमर सिंह के अमेरिका से लौटने के बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच समझौते की कवायद शुरू हो जाएगी ।
भारतीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को कम्युनिस्ट नेता प्रकाश करात से मिलकर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए उनकी मंजूरी लेने की कोशिश की थी ।
परंतु कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ यह समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे अमेरिकी सौदे को आगे बढ़ाया जा सकेगा ।
प्रस्तावित परमाणु सौदे से भारत को परमाणु ईंधन और तकनीक में व्यापार करने की अनुमति मिल जाएगी । भारत अपने कुछ नागरिक परमाणु रियेक्टरों को राष्ट्र संघ की निगरानी में भी रखेगा ।
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले हफ्ते कहा था कि इस समझौते से भारत अन्य देशों के साथ नागरिक परमाणु सहयोग कर सकेगा, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत आवश्यक है ।
अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा के अतिरिक्त, इस समझौते के लिए न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप और अमेरिकी कांग्रेस से मंजूरी लेना भी आवश्यक है ।
सभी शुभ नक्षत्रों के योग का अवसर बांचकर संघ परिवार ने सत्ता हस्तांतरण का समां भी बांध दिया है। संख्या ज्योतिष के हिसाब से भावी प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी समेत छह उम्मीदवारों कके नामों की घोषणा करते हुए। इन्ही आडवाणी के जनतादल शासनकाल में सूचना व प्रसारण मंत्रित्व काल में मीडिया में घुसपैठ करने वाले संघी बालवृंद अब विदेशी पूंजी निवेश और उपभोक्ता संस्कृति के मक्खन मलाई से बालिग हो गए हैं। संघ परिवार और इंदिरा गांधी के आपातकाल का विरोध करने वाले, सत्ता और व्यवस्था परिवर्तन की गुहार लगाने वाले, विचारधारा का परचम लहराने वाले लोग अब चांद सूरज हाथ में लेकर ढंढने से भी कही नहीं मिलेंगे। सब सार्वभौम बाजार और रियेलिटी शो, उपहार, पुरस्कार और अनुदान की संताने हैं या कारपोरेट मालिकों के अंग्रेजीपरस्त अधपढ़ अनपढ़ दलाल और भड़ुवे। जिन्हें शौच और सोच की तमीज नहीं हैं, समाचार ,सूचना , विचार और इतिहास का ज्ञान नहीं हैं, वे मालिक के कारिन्दे प्रबंधक हुक्मवरदार संपादक सत्तानशीं है। इनमें से भी ज्यादातर ब्राह्मण या सवर्ण। सूबों और केंद्र में शासक दलों के जूठन पर पलने वाले तमाम सुविधाओं, सहूलियतों, संबंधों और रियायतों से लैस। संघ परिवार की हवा बनाने वालों में इन महाशयों का भारी योगदान है।
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वामदलों की ओर से लगातार मिल रही धमकियों के बीच लगभग सभी राजनीतिक दलों ने चुनावी तैयारियाँ शुरू कर दी हैं।
अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर चौतरफा संकट झेल रही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का घटक दल राष्ट्रीय जनता दल भी इससे अछूता नहीं है। भारतीय जनता पार्टी ने तो लोकसभा चुनाव के लिए छह सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम की घोषणा भी कर दी है।
उत्तरप्रदेश में सत्तारुढ़ बहुजन समाज पार्टी और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी भी कई उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी हैं।
इस संबंध में राजद ने शनिवार को अपनी कोर कमेटी और केन्द्रीय समिति की बैठक की। राजद प्रमुख एवं रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव की अध्यक्षता में चली बैठक में पार्टी ने परमाणु करार और महँगाई के कारण देश में व्याप्त संकट को देखते हुए चुनाव की तैयारियाँ शुरू कर दी।
बैठक में पार्टी ने अगले लोकसभा चुनाव में धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के मूल्यों में आस्था रखने वाली पार्टियों के साथ चुनावी गठबंधन करने के बारे में भी विचार-विमर्श किया।
भारत-अमेरिका परमाणु करार को आगे बढ़ाने पर सरकार से समर्थन वापस लेने की वाम दलों की धमकी को खास अहमियत नहीं देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने सोमवार को कहा कि वे समझौते के क्रियान्वयन से पहले इस मुद्दे पर संसद का सामना करने को तैयार हैं।
भारत-अमेरिका परमाणु करार पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की संसद का सामना करने की नई पेशकश ने वाम दलों को और नाराज कर दिया। करार पर सरकार के कदम बढ़ाने को सुनिश्चित मानकर अब वामदल समर्थन वापसी की तारीख पर विचार-विमर्श करने लगे हैं।
प्रधानमंत्री ने परमाणु करार मुद्दे पर कहा कि सरकार समझौते के कार्यान्वयन से पूर्व संसद का सामना करने को तैयार है लेकिन उससे पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी और परमाणु आपूर्ति समूह के साथ प्रक्रिया पूरी करना चाहेगी।
कांग्रेस को हालांकि वाम दलों के समर्थन वापस लेने पर सरकार बच जाने के सपा से कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं जिसके 39 सांसद लोकसभा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस मुद्दे पर संप्रग और वाम दलों के बीच बने गतिरोध के एक पखवाड़े बाद अपनी चुप्पी तोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने वरिष्ठ संवाददाताओं से कहा अगर संसद महसूस करती है कि सरकार ने कुछ गलत किया है तो इसे 'तय' करने दिया जाना चाहिए।
करार पर चिंताओं के बारे में उन्होंने कहा, 'करार को क्रियान्वित किए जाने से पहले मैं इसे संसद में लाने के लिए राजी हूं। इससे अधिक तार्किक क्या हो सकता है।' सिंह ने कहा, 'मैंने पहले भी कहा है। मैं इसे फिर दोहराऊंगा कि मैंने वाम दलों को बताया है कि आप प्रक्रिया को पूरी होने दीजिए। जब प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, मैं इसे संसद के सामने लाऊंगा और सदन के मुताबिक चलूंगा।'
परमाणु करार पर वाम दलों से बढ़े गतिरोध के एक पखवाड़े बाद सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि सरकार को आईएईए और एनएसजी से वार्ता प्रक्रिया को पूरा करने की अनुमति दी जाए।
उन्होंने विश्वास जताया कि अमेरिका के साथ परमाणु सहयोग के संबंध में उनकी सरकार वाम दलों सहित सभी पक्षों की चिंताओं का निराकरण करने में सफल होगी।
समझौते पर एक कदम भी आगे बढ़ने की स्थिति में सरकार से समर्थन वापस लेने की माकपा महासचिव प्रकाश करात की धमकी के बारे में प्रधानमंत्री ने कहा ऐसी स्थिति आने पर हम उसका सामना करेंगे।
उन्होंने कहा कि मुझे उम्मीद है कि हम रास्ता निकाल सकते हैं। हम अभी भी ऐसे निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं, जो सभी दलों को संतुष्ट कर सके।
मूलनिवासी सर्वहारा समुदाय असहाय है तो भारतीय वामपंथियों, समाजवादियों और दलितनेताओं के विश्वासघात से। जो ईमानदार है वे मूलनिवासियों का साम्राज्यवाद विरोधी सामंतवाद विरोधी मनुस्मृतिविरोधी विरासत से अनजान हैं। जो बैईमान हैं वे खुल्लमखुल्ला आम जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। वामपंथी इतिहास नहीं जानते, ऐसा हो नहीं सकता। अप
ढ़ या अधपढ़ भी नहीं है कारत वाहिनी। सत्तावर्ग तो आदिमकाल से शस्त्र और शस्त्र के विशेषज्ञ हैं। विचारधारा और इतिहासबोध के हिसाब से तो वामपंथियों को ग्लोबल यहूदी श्वेत हिंदू साम्राज्यवादी फासीवादी, नाजीवादी सामंती मनुस्मृतिपरस्त रंगभेदी सत्तावर्ग के खिलाफ मूलनिवासियों और सर्वहारा का साझा विश्वव्यापी मोर्चा का नेतृत्व करना चाहिए था। समाजवादी अगर भारतीय वर्ण व्यवस्था के खिलाफ लड़ रहे होते तो संघ परिवार को कोई मौका देने की नौबत ही कहां आती? दलित नेता मूलनिवासी साम्राज्यवाद विरोधी विरासत से कोई सरोकार रखते तो ग्लोबीकरण, अंग्रेजी, शहरीकरण और औद्योगीकरण के जरिए मूलनिवासियों के सफाये हेतु जारी नरमेधयरज्ञ के खिलाफ मोर्चाबंदी करते। रंगभेद विरोधी मनुस्मृति विरोधी साम्राज्यवाद विरोधी अंतरराष्ट्रीय मोर्चाबंदी की अगुवाई करते।
ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।
१९७७ और १९८९ में संघियों के साथ केंद्र में सरकार चलाने के अनुभव से धनी वामपंथी केरल, बंगाल और त्रिपुरा के गढ़ सुरक्षित कककरने में लगे हैं। बाकी देश पर संघ परिवार का राज हो तो क्या?
नवउदारवाद, ग्लोबीकरण, निजीकरण, विनिवेश और विदेशी पूंजी का विरोध करना तो दूर, वामपंथियों के सौजन्य से अब जार्ज बुश और बुद्धदेव भट्टाचार्य का गठबंधन है। हेनरी कीसिंजर विदेशी पूंजी के आयात के लिए वामपंथियों के सबसे बड़े मददगार हैं। सेज और कैमिकल सेज के लिए वाम शासित बंगाल में नंदीग्राम और सिंगुर में जनविद्रोह कुचलने के लिए मार्क्सवादी कांग्रेसी ब्राह्मणों ने जो साझा दमन कार्यक्रम चलाया, उसकी सानी है? गुजरात नरसंहार के खिलाफ खूब चिल्लाने वाले वामपंथियों के राज में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के क्या हाल है?
आडवाणी के गृहमंत्रित्व में लोकसभा में पेश दलित बंगाली शरणार्थियों के देश निकाला नागरिकता संशोधन विधायक पास कराने में संघ परिवार, कांग्रेस और वामपंथियों की सहमति के बाद भी इनमें भद करने की कोशिश आत्मघाती है।
अपना अपना वोटबैंक सुरक्षित करने के लिए भोली भाली हिंदुस्तानी मूलनिवासी जनता को बेवकूफ बनाने के लिए चुनावों में अलग अलग पार्टियों के झंडेवरदार ब्राह्मण वर्चस्व बनाये रखने के लिए और ग्लोबल सत्तावर्ग के हित साधने के लिए संसद और विधान सभायों में एकजुट है। संवैधानिक आरक्षण बेमतलब है, क्योंकि इस ग्लोबीकरण के कारपोरेट अमेरिकी उपनिवेश बने शाइनिंग इंडिया और सेनसेक्स इंडिया ने अप्रासिंक हो गया है। आरक्षण युद्ध अब वोट बैंक हासिल करने का सबसे बढिया जरिया है, मीना गुर्जर विवाद के अवसान के बाद सबरंग आररक्षण के महारानी वसुंधरा के फार्मूले से यह साबित हो चुका है। आरक्षण से कारपोरेट राज में नौकरियां नहीं मिल सकती। सरकारी राजकाज में बड़ा पद चाहे आरक्षण से मिल जाये, पर नीति निर्धारण अल्पसंख्यक तीन प्रतिशत ब्राह्मण ही करेंगे। प्रधानमंत्री चाहे सिख अर्थशास्त्री अमेरिकी गुलाम मनमोहन सिंह बन जायें, पर तमाम फैसले करेंगे उनसे बड़े गुलाम बंगाली कुलीन ब्राह्मण प्रणव मुखर्जी। जो एक नहीं, दो नहीं, उनचालीस संसदीय समितियों के चेयरमैन हैं और सबसे मजे की बात बंगाल में कांग्रेस वाममोर्चा तलमेल से परिवर्तन की हर संभावन की हवा निकालने में माहिर सोवियत माडल से अमेरिकी नैनो में तब्दील प्रणव मुखर्जी ही भारत अमेरिकी सैन्य संबंधों और परमाणु समझौते का मुख्य सूत्रधार है। वामपंथी बंदरघुड़किय से निपटने में उनकी दक्षता देखते ही बनती है।
सिर पर मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन के लाख दावों के बावजूद हालत यह है कि देश के कई राज्यों में यह प्रथा मौजूद है।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग ने अपने अध्ययन में पश्चिम बंगाल के सफाई कर्मचारियों की हालत को देश में सबसे बदतर बताते हुए कहा है कि वहाँ स्थायी सफाई कर्मचारी मैला ढोने को मजबूर हैं और उन्हें न्यूनतम वेतन तक नहीं दिया जाता। आयोग की अध्यक्ष सुश्री संतोष चौधरी ने बताया कि इस संबंध में केंद्र द्वारा राज्यों को अरबों रुपए दिए जा चुके हैं, लेकिन समस्या समाप्त नहीं हो पाई है।
बंगाल बेहाल : पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हुए सुश्री चौधरी ने कहा कि लाखों लोगों का मैला साफ करने वाले राज्य के सफाई कर्मचारियों के साथ पूरा न्याय नहीं किया जा रहा है। वहाँ अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी सफाई कर्मचारी तक मैला ढो रहे हैं और उन्हें न्यूनतम वेतन तक नहीं दिया जाता।
भारत-अमेरिका परमाणु करार पर अपने रुख के बारे में समाजवादी पार्टी ने अपने पत्ते अभी तक छिपाए रखे हैं जबकि सरकार ने उम्मीद जताई है कि इस मुद्दे पर कायम गतिरोध का कोई स्वीकार्य समाधान ढूँढ़ लिया जाएगा। हालाँकि अभी यह साफ नहीं हुआ है कि सरकार करार पर आगे बढ़ेगी या नहीं।
लोकसभा में 59 सांसदों की ताकत वाले वाम मोर्चे का नेतृत्व कर रही माकपा ने करार का विरोध जारी रखते हुए प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया है कि उन्होंने ही इस मुद्दे पर देश को राजनीतिक संकट में धकेल दिया है।
आईएईए में भारत केन्द्रित सुरक्षा समझौते पर आगे बढ़ने या नहीं बढ़ने का फैसला करने से पहले सरकार और कांग्रेस सभी विकल्पों को पूरी तरह से तौल लेना चाहते हैं क्योंकि वाम दल आगाह कर चुके हैं कि परमाणु करार पर सरकार अगर आगे बढ़ी तो वह समर्थन वापस ले लेंगे।
उधर समर्थन वापस लेने की स्थिति में लोकसभा में होने वाले शक्ति परीक्षण में अहम भूमिका निभा सकने की ताकत रखने वाली 39 सांसदों की सपा ने अभी तक अपने पत्ते छिपाए रखकर सरकार के भविष्य पर संशय को बनाए रखा है।
मुलायमसिंह ने लखनऊ में कहा कि तीन जुलाई को यूएनपीए की बैठक के बाद पार्टी इस बारे में अपने रुख को स्पष्ट करेगी। उन्होंने कहा कि परमाणु करार के मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से अभी तक उनसे किसी ने संपर्क नहीं किया है।
हालाँकि कांग्रेस के प्रति नरम रुख अपनाने संबंधी सभी सवालों को जवाब में उन्होंने उत्तरप्रदेश की मायावती सरकार को निशाना बनाकर संकेत दिया कि उनकी पार्टी कांग्रेस के साथ रिश्तों में गरमाहट लाने के विचार के खिलाफ नहीं है।
कहा जाता है कि सपा इस प्रयास में पिछले दरवाजे से कांग्रेस के साथ वार्ता का सिलसिला चला भी रही है। खासकर मायावती की बसपा द्वारा संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लेने के फैसले के बाद दोनों दलों के बीच रिश्तों में गरमाहट लाने की सरगर्मियाँ बढ़ गई हैं।
सपा के अन्य वरिष्ठ नेता अमर सिंह इन दिनों विदेश यात्रा पर हैं। उम्मीद है कि कुछ दिन बाद उनकी स्वदेश वापसी पर इस संदर्भ में पार्टी की स्थिति में और स्पष्टता आएगी।
आयोग के अनुसार प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह ने अब 31 मार्च 2009 तक देश से इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। पहले इसके लिए 31 दिसंबर 2007 तक का समय निर्धारित था।
भारत-अमेरिका परमाणु करार पर ताजा संकट के लिए मार्क्सवादी नेता प्रकाश करात द्वारा सीधे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह पर निशाना साधे जाने के बाद प्रमुख वाम दलों ने उन्हें या तो करार को आगे बढ़ाने का बालहठ या प्रधानमंत्री पद छोड़ देने की सलाह दी।
करार पर सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की मुखिया कांग्रेस तथा वाम दलों की आर-पार की मुद्रा के बीच राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा तथा अगले कदम पर विचार के लिए माकपा की प्रस्तावित पोलित ब्यूरो की बैठक से पहले माकपा नेताओं ने डॉ. सिंह पर गलत प्राथमिकताएँ तय करने का भी आरोप लगाया और कहा कि उन्हें करार पर अमल की जिद छोड़कर बेतहाशा मूल्य वृद्धि तथा रिकॉर्ड मुद्रास्फीति से निबटने पर ध्यान देना चाहिए।
लोकसभा में माकपा के उपनेता मोहम्मद सलीम तथा भाकपा के राष्ट्रीय सचिव शमीम फैजी ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से किए गए अपने वादे पर अमल को 'राष्ट्रहित' नहीं बताना चाहिए।
फैजी ने तो यहाँ तक कहा कि अगर उन्हें जापान में विकसित देशों के समूह जी-8 की शिखर बैठक मे इस बारे में बुश को अंतिम फैसला बताने की इतनी परवाह है तो उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत का प्रधानमंत्री अमेरिका का सेवक नहीं हो सकता।
रेलमंत्री और राजद के प्रमुख लालू प्रसाद ने रविवार को कहा कि संप्रग सरकार नहीं गिरेगी और अमेरिका के साथ किया गया परमाणु करार अंतिम परिणति तक पहुँचेगा।
लालू प्रसाद का यह बयान ऐसे समय आया है, जब वामपंथी दल भारत के सुरक्षा मानक समझौते के लिए आईएईए के पास जाने की स्थिति में मनमोहनसिंह सरकार से समर्थन वापसी की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने एक समाचार चैनल से कहा कि चुनाव समय पर होंगे। सरकार नहीं गिरेगी और परमाणु करार भी पारित होगा। समय से पहले चुनाव की संभावना से जुड़े एक सवाल के जवाब में प्रसाद ने कहा कि मैं फिर दोहराता हूँ कि चुनाव तय समय पर होंगे।
भारत-अमेरिकी परमाणु करार पर राजनीतिक संकट के लिए प्रधानमंत्री के जिम्मेदार होने के माकपा के आरोप को खारिज करते हुए विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी ने शनिवार को कहा कि प्रधानमंत्री जो कुछ भी कर रहे हैं, वह देश के व्यापक हित में है।
डेरा बाबा नानक की यात्रा के दौरान मुखर्जी ने कहा प्रधानमंत्री के लिए राष्ट्रीय हित सर्वोच्च है और वे संकट के कारण नहीं हैं, जो कुछ भी वे कर रहे हैं वह देश के व्यापक हित में है।
माकपा महासचिव प्रकाश करात ने इस सप्ताह के शुरू में आरोप लगाया था कि परमाणु करार और मूल्य वृद्धि जैसे अन्य मुद्दों पर संप्रग सरकार और वाम के बीच गतिरोध के लिए सिर्फ प्रधानमंत्री जिम्मेदार हैं।
मुखर्जी ने कहा कि परमाणु करार गतिरोध को लेकर संप्रग सरकार को कोई खतरा नहीं है और यह अपना कार्यकाल पूरा करेगी। उन्होंने कहा सरकार परमाणु करार पर हस्ताक्षर करने की जल्दी में नहीं है।
यह पूछे जाने पर कि सरकार से वाम दलों के समर्थन वापस लेने की स्थिति में क्या सपा गठबंधन में शामिल होगी, उन्होंने कहा हम निगाह रख रहे हैं क्योंकि वे अपनी पार्टी की तीन जुलाई को बैठक कर रहे हैं। उनके रुख को पहले देखते है।
परमाणु करार की पैरवी करते हुए मुखर्जी ने कहा कि बिजली आपूर्ति में चार गुना बढ़ोतरी जो 2030 तक लगभग आठ लाख मेगावाट होगी। बिजली उत्पादन का सर्वश्रेष्ठ और पर्यावरण मित्र तरीका परमाणु स्रोतों से है।
इसपर भी आप शक करेंगे कि संघ पिरवार के पुनरूत्थान में प्रणव बुद्धदेव की निर्णायक भूमिका है। जब भी समर्थन वापसी की नौबत आयी है, इस जोड़ी ने रस्सी पर चलने का करतब कर दिखाया है। संसदीय नौटंकी के सूत्रधार बंगा के एक और कुलीन ब्राहमण सोमनाथ चटर्जी हैं तो साहित्य अकादमी का अध्यक्ष ब्राह्णण देवता सुनील गंगोपाध्याय हैं।
एक नजीर पेश है। आडवाणी और बुद्ध बाबू की घनिष्ठता की। आडवाणी के गृहमंत्रित्व के दौरान दोनों की मुलाकातों के विवरणों पर मुलाहिजा फरमाया जाये। सदरसों में आतंकवादी त्तवों का जमावड़ा और बांग्लादेश मेसे घुसपैठ के मुद्दों पर दोनों की जुगलबंदी पर गौर किया जाये। फिलहाल गोरखालैंड आंदोलन पर दोनों का रवैया देखें। मालूम हो कि संसद में वामपंथियों के समर्थन का भरोसा पाने के बाद बुद्धबाबू की सिफारिश पर ही आडवाणी ने नागरिकता संशोधन विधेयक पास कराया और इस कानूनी अंजाम दिया जा रहा है प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में।
राजनैतिक आरक्षण से कोई फायदा नहीं है। जगजीवन राम के उत्थान से मूलनिवासियों का क्या भला हुआ, इतिहास गवाह है। राम विलास पासवान और शरद यादव १९७७ के बाद हर रंग की सत्ता में सिपाहसलार हैं तो लालू और नीतीश का निराला खेल छुपा नहीं है। मायावती ब्राह्मणों के साथ सत्ता शेयर कर रहे हैं। इन दलित नेताओं को ब्राह्मणों के साथ मेलबंधन स्वीकार है , पर राष्ष्ट्रीयताओं के मुद्दे पर कोई जानकारी नहीं है। आदिवासियों के साथ संवाद तक नहीं है। मनुवाद का विरध करते हैं पर द्रविड़ आंदोलन और द्रविड़ सभ्यता से नाता नहीं है। मूलनिवासी हितों की बात करते हैं पर सेज का विरोध नहीं करते। अमेरिकी साम्राज्यवाद या फासीवादी संघपरिवार के खिलाफ इनकी कोई मोर्चाबंदी नहीं है। साम्राज्.ावाद विरोधी फासीवाद विरोधी मूलनिवासी आंदोलन से विश्वास घात करने वाले ब्राह्मण मार्क्सवादी आगे हैं तो दलित नेता कतई पीछे नहीं है।
नतीजतन धूमधड़ाके से भारत की ब्राह्मणवादी संसदीय सत्ता में संघ परिवार की वापसी क तैयारी हो रही है।
मीडिया यह भल गया कि अखबारों और मीडिया में विदेशी पूंजी के जरिए उनकी मेधा और स्वतंत्रता का अपररण करके चंपुओं और दलालों भड़ुवों को मीडिया कर्णधार बनाने की रस्म अदायगी भावी प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने ही की थी। अंग्रेजी पत्रकारिता, भाषा और साहित्य के आगे मातृभाषाओं की हत्या भी संघ परिवार ने नरसिम्हा राव मनमोहन जोड़ी आयातित नवउदारवाद के जरिए किया । जिसके तहत प्राकृतिक आजीविका, भारतीय कृषि, उत्पादन प्रणाली, मूलनिवासी संस्कृति, बोली , राट्रीयताओं का संहार हुआ। अंग्रेजी के बिना, कंप्यूटर ज्ञान के बिना नौकरियों अब असंभव है। भविष्यनिधि और पेंशन को मजाक बना दिया गया। स्थाई नौकरियां अब सपने में भी नहीं मिलती। वीआरएस शुरू हुआ।
इन्हीं संघियों के शासन काल में मणिसाना आयोग के जरिए हर संसकरण के लिए अलग कंपनियां और वेतनमान का निर्माण हुआ। एक ही अखबारसमूह के अंग्रेजी पत्रकारों को न्यूनतम वेतन १५ हजार ौर अधिकतम कुछ भी, तो हिंदीवालों को दशकों से प्रोमोशन नहीं, अधिकतम वेतन १५- १६ हजार। वरिष्ठता और योग्याता ताक पर रखकर अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा का सिद्धंत लागू हुआ देसी भाषाई अखबारों में। जो मलाईदार हैं, वे बखूब समर्थन करें संघी पुनरूत्थान का , पर जो आम मीडियाकर्मी ह , उन्हें थोड़ा लाज शर्म है या नहीं या फिर कूकूर योनि मुबारक?
सिख विरोधी दंगा, बाबरी विध्वंस, गुजरात नरसंहार की नींव पर खड़े संघ परिवार की आत्मा तीव्र दलित मुसलमान घृणा में ही बसती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में डेमोक्रेटिक दल की ओर से उम्मीदवार बनने जा रहे बराक ओबामा को मिल रहे भारतीय अमेरिकियों के समर्थन में इजाफा हो रहा है। अमेरिका के एक शीर्ष दैनिक ने इसके लिए भगवान हनुमान की भाग्यशाली मूर्ति के प्रति धन्यवाद प्रकट किया है।
यह समर्थन उस तस्वीर के प्रकाशित होने के बाद से बढ़ गया है जिसमें खुलासा हुआ था कि 46 वर्षीय सीनेटर ओबामा अपने साथ तांबे से निर्मित हनुमान की छोटी मूर्ति रखते हैं।
वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक लेख के अनुसार जब बात अमेरिकी राजनेताओं की आती है तो बिल क्लिंटन भारतीयों के सबसे चहेते हैं। अखबार ने लिखा कि डेमोक्रेटिक दल के प्राथमिक चुनावों के दौरान यह प्रेम हिलेरी क्लिंटन के प्रति प्रकट किया गया। यह प्रेम विशेषकर भारतीय अमेरिकियों के बीच व्हाइट हाउस की अपनी दौड़ के लिए कोष जुटाने के दौरान देखा गया। अखबार के अनुसार अब भारतीयों ने ओबामा का समर्थन किया है। इसके लिए धन्यवाद भगवान हनुमान को दिया जाना चाहिए।
भारत-अमेरिका परमाणु करार को लेकर वामपंथी दलों के साथ जारी राजनीतिक गतिरोध के मद्देनजर समाजवादी पार्टी को रिझाने की कांग्रेस की कोशिश के सोमवार से गति पकड़ने की संभावना है। अमरसिंह कल अमेरिका से लौट रहे हैं और इसके साथ इस दिशा में प्रयास तेजे होने की संभावना जताई जा रही है।
प्रमुख वामपंथी पार्टियों ने प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह के इस तर्क को खारिज कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए तथा परमाणु ईंधन आपूर्तिकर्ता देशों के समूह एनएसजी से वार्ताएँ पूरी करने के बाद भी अमेरिका के साथ परमाणु करार पर अमल के लिए देश बाध्य नहीं होगा।
माकपा तथा भाकपा के शीर्ष नेताओं ने दोनों अंतरराष्ट्रीय संगठनों से वार्ता पूरी करने के बाद संसद में उसे रखने के डॉ. सिंह के वक्तव्य को पुराना राग बताते हुए पूछा कि संसद के दोनों सदनों में दो बार बहस हो चुकी है और संसद का बहुमत इस करार के खिलाफ अपनी भावना व्यक्त कर चुका है फिर वे करार पर अमल के बारे में संसद की राय का पालन करने की बात कहकर देश को गुमराह क्यों कर रहे हैं।
भाकपा के महासचिव एबी बर्धन तथा राष्ट्रीय सचिव शमीम फैजी ने कहा कि आईएईए से भारत केन्द्रित परमाणु सुरक्षा उपायों के मसौदे को बोर्ड ऑफ गवर्नर की अंतिम मंजूरी के बाद एनएसजी तथा अमेरिकी कांग्रेस में करार पर अनुमोदन हासिल करने में भारत की कोई भूमिका नहीं बचेगी। इसलिए आईएईए तथा एनएसजी में प्रक्रिया पूरी करने के बाद संसद की राय लेने की बात देश को गुमराह करने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है।
माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने भी बोर्ड ऑफ गवर्नर में अगले कदम के बाद करार के ऑटो पायलट भारत की भूमिका के बिना लागू होने के भाकपा नेताओं की बात दोहराते हुए कहा कि इसके बाद सरकार के लिए कदम वापस खींचना असंभव होगा।
इसलिए वामपंथी पार्टियाँ आईएईए में सुरक्षा उपायों को अंतिम मंजूरी के लिए नहीं जाने देने के अपने रुख पर कायम हैं। पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने भी प्रधानमंत्री के ताजा बयान के बारे में सवाल पर पूछा कि इसमें नया क्या है।
उन्होंने पार्टी पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद जारी वक्तव्य दुहराते हुए कहा कि सरकार ने आईएईए के बोर्ड ऑफ गवर्नर के समक्ष अगला कदम उठाया तो चारों वामपंथी पार्टियाँ उससे समर्थन वापस ले लेंगी।
अमरसिंह के कल दोपहर बाद अमेरिका से यहाँ पहुँचने के पश्चात कांग्रेस की ओर से सपा नेता मुलायमसिंह यादव के साथ संपर्क के लिए रास्ते खोले जाने की संभावना है।
परमाणु करार को अमल में लाने के लिए संप्रग सरकार की पहल के बाद अगर वामपंथी दल अपना समर्थन वापस ले लेते हैं तो ऐसे में लोकसभा में 39 सदस्यों वाली सपा सरकार बचाने में अहम भूमिका अदा कर सकती है।
बहरहाल मुलायम इसको लेकर संदेह बनाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि यूएनपीए की तीन जुलाई की होने वाली बैठक के बाद पार्टी का रुख तय होगा।
एक सवाल के जवाब में मुलायम ने कहा कि हमने जब भी किसी चीज का विरोध किया तो इसका कारण होगा कि वह हमारे सिद्धांत के खिलाफ होगा या लोगों के हित में नहीं होगा। हमने हमेशा उन दलों का साथ दिया है, जो लोगों के लिए काम करते हैं।
भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु करार को लेकर संप्रग और माकपा के बीच पैदा हुआ गतिरोध रविवार को उस समय और गहरा गया, जब माकपा ने चेतावनी दी कि अगर केन्द्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार इस नुकसानदेह समझौते के अमल पर आगे बढ़ती है तो वह अन्य वाम दलों के साथ सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेगी।
पार्टी पोलित ब्यूरो की रविवार को हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि प्रधानमंत्री तथा कांग्रेस नेतृत्व द्वारा भारत-अमेरिका परमाणु करार पर आगे बढ़ने की जिद के संदर्भ में पोलित ब्यूरो ने संप्रग में कांग्रेस के सहयोगी दलों से अपील की कि वे यह सुनिश्चित करें कि ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए, जिससे सांप्रदायिक शक्तियों को मदद मिले।
उन्होंने कहा कि पोलित ब्यूरो का मानना है कि सुरक्षा उपाय संबंधी समझौते को आईएईए के संचालक मंडल की मंजूरी के लिए ले जाना परमाणु करार पर वाम-संप्रग समिति की पिछले साल 16 नवंबर को हुई बैठक में बनी समझ का खुला उल्लंघन है।
करात ने पोलित ब्यूरो द्वारा जारी एक बयान पढ़ते हुए कहा कि यदि सरकार ऐसे नुकसानदेह समझौते के अमल पर आगे बढ़ती है, जिसे संसद में बहुमत का समर्थन हासिल नहीं है तो माकपा वामदलों के साथ संप्रग सरकार से समर्थन वापस ले लेगी।
महँगाई के मोर्चे पर सरकार नाकाम : पोलित ब्यूरो ने बढ़ती महँगाई पर भी सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब सरकार को महँगाई से निपटने के लिए हरसंभव कदम उठाने चाहिए प्रधानमंत्री तथा कांग्रेस नेतृत्व परमाणु करार को अमल में लाने संबंधी अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से किए अपने वादे के प्रति ज्यादा चिंतित है।
महँगाई से निपटने में मनमोहन सरकार को बुरी तरह विफल करार देते हुए माकपा ने घोषणा की कि कांग्रेस नेतृत्व की सरकार के परमाणु करार पर राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ाने और महँगाई कम करने में उसकी विफलता का पर्दाफाश करने के लिए वह अन्य वाम दलों के साथ मिलकर पूरे देश में सघन संयुक्त अभियान चलाएगी।
करात ने बताया कि पोलित ब्यूरो ने तेजी से बढ़ रही मुद्रास्फीति पर जो बीते सप्ताह बढ़कर 11.42 तक पहुँच गई भारी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार मुद्रास्फीति से निपटने में बुरी तरह विफल रही है। रोजमर्रा की की चीजों के दाम बढ़ने से जनता की कमर टूट रही है और खाद्य वस्तुओं की आसमा
