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8 जून, 2008


ब्लॉग्स (1)
मनोरंजन अहम है या सूचनाएं? दवाएं चाहिए कि दारू का इन्तजाम? अपनी पहचान, अपनी सांस्कृतिक विरासत चाहिए कि खुला बाजार में निरंकुश क्रयशक्ति? मनुष्य बचाये जायें या क्लोनिंग से बवे नयी सभ्यता? जनपद चाहिए कि महानगर? हरियाली चाहिए कि प्रदूषण? जमीन चाहिए कि सेज? परमाणु बम चाहिए कि विश्वशान्ति? खेल चाहिए कि कारोबार? साहित्य चाहिए कि ब्लू फिल्में? साम्राज्यवाद चाहिए कि मानवतावादी लोकतन्त्र? रंग बिरंगी पार्टियां चाहिए या सामाजिक परिवर्तन? जनपद और लोकजीवन चाहिए कि भोपाल गैसत्रासदी? ज्ञान चाहिए कि तकनीक? संवेदनाएं चाहिए कि रोबोट? अपनी आजीविका चाहिए कि बाजार की दलाली? प्रेम चाहिए कि गर्म बिस्तर? शान्ति चाहिए या फिर युद्ध? हिरोशिमा और नागासाकी चाहिए कि तक्षशिला और नालंदा? पुस्तकें चाहिए या फिर सूचना तकनीक? स्कूल चाहिए कि बार रेस्तरां? ब्राह्मण तंत्र जारी रहे या फिर समता पर आधारित वर्गहीन, वर्णहीन, रंगविहीन वैश्वक समाज? अमरिका की गुलामी चाहिए या फिर स्वतन्त्र और सम्प्रभु भारत? राष्ट्रीय हिंसा चाहिए या सर्वहारा की मुक्ति? मूलनिवासियों की आजादी चाहिए या फिर अन्तरिक्ष में उपनिवेश? हिन्दूराष्ट्र चाहिए या अपनी देशज उत्पादन प्रणाली? आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध जरूरी हैं या राष्ट्रीयताओं की अस्मिता? आगे पढ़ें...