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लाक्षागृह भूमंडलीय बाजार में मनुष्य की नियति। विनाश और सर्वनाश का चौतरफा इंतजाम। कारपोरेट वातानुकूलित जीवनशैली का अत्मघाती जाल में फंसा राष्ट्र।

विनाश का एक पहलू भोपाल गैस त्रासदी है तो दूसरा पहलू सोदपुर अग्निकांड, जहां चाल दुकान के विस्तार के दौरम्यान आग लगने से चौदह लोग एअर कंडीशनर के कार्बन मोनोक्साइड से मिनटों में लाश में तब्दील हो गए। बाकी देश भी या तो गैस चैंबर बाजार या फिर जीवन और आजीविका से मूलनिवासियों की बेदखली का सेज।


लाक्षागृह भूमंडलीय बाजार में मनुष्य की नियति। विनाश और सर्वनाश का चौतरफा इंतजाम। कारपोरेट वातानुकूलित जीवनशैली का अत्मघाती जाल में फंसा राष्ट्र।



पलाश विश्वास



विनाश का एक पहलू भोपाल गैस त्रासदी है तो दूसरा पहलू सोदपुर अग्निकांड, जहां चाल दुकान के विस्तार के दौरम्यान आग लगने से चौदह लोग एअर कंडीशनर के कार्बन मोनोक्साइड से मिनटों में लाश में तब्दील हो गए। इस शो-रूम में लगभग एक हजार ग्राहक प्रतिदिन आते हैं। घटना के समय भी 30 से 35 ग्राहक शो-रूम में मौजूद थे। पूरा शो-रूम एयरकंडिशन है। मृतकों में 12 ग्राहक थे। इनमें एक गोविन्द तालपात्रा और उनकी पत्नी रेखा थी जो जमाई षष्ठी पर अपनी बेटी और दामाद के लिए उपहार खरीदने आए थे। शो-रूम के मालिक नारायण साहा की भतीजी रंजना भी इस हादसे का शिकार हुई है।



शापिंग मॉल की दूसरी मंजिल पर एक रेडीमेड सेंटर में दोपहर बारह बजे के करीब उस समय आग लगी जब पास ही एक दुकान में वेल्डिंग का काम चल रहा था। अचानक एक चिंगारी रेडीमेड सेंटर में रखे कपड़े पर जा गिरी जिससे आग लग गई। देखते ही देखते पूरा शापिंग मॉल धू-धू कर जलने लगा। दमकल के आने के पूर्व ही दुकानदार और ग्राहक समेत 32 लोग दम घुटने से बेहोश हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां एक महिला समेत 14 लोगों की मौत की पुष्टि की गई। शेष की हालत गंभीर बनी हुई है। आग बुझाने के लिए सात दमकल घटनास्थल पर पहुंचे लेकिन शापिंग मॉल को खाक होने से बचाने में कामयाब नहीं हुए। शाम तक आग पर काबू पाया जा सका।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक आग लगने के बाद डर से दुकानदारों ने दुकान का शटर गिरा दिया। लेकिन वातानुकूलित मशीन की लाइन से दुकान के भीतर भी आग लग गई। मॉल के भीतर धुंआ भर जाने से लोगों का दम घुटने लगा और 32 लोग बेहोश हो गए। घटना की जांच के आदेश दे दिए गए हैं।



बाकी देश भी या तो गैस चैंबर बाजार या फिर जीवन और आजीविका से मूलनिवासियों की बेदखली का सेज। अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र के ऐसे उत्पादों को मूलत: कमोडिटीज (वस्तु) कहते हैं जिनका वाणिज्यिक मूल्य हो। इसमें कृषि उत्पाद जैसे खाद्यान्न, दलहन, तिलहन व धातुएं आदि शामिल हैं। वैसे व्यापक तौर पर द्वितीयक क्षेत्र के उत्पाद भी कमोडिटी में शामिल हैं जैसे खाद्य तेल, पॉवीमर्स आदि।



कमोडिटी मार्केट के तीन प्रकारों में सबसे उन्नत चरण या प्रकार फ्यूचर्स मार्केट है। इस क्रम में पहला चरण स्पॉट मार्केट या हाजिर बाजार है। ऐसे परंपरागत बाजारों से सभी परिचित हैं। इसमें कमोडिटी का सीधा नकद क्रय-विक्रय होता है। अगला प्रकार फारवर्ड मार्केट है। इसमें क्रेता-विक्रेता के बीच तुरंत भुगतान व भविष्य में कमोडिटी की डिलेवरी का अनुबंध होता है। इससे कीमतों में भविष्य में होने वाले उतार चढ़ावों से बचने का प्रयास किया जाता है। इसमें क्रेता या विक्रेता के डिफाल्टर होने का भय रहता है। इसकी कमियों को फ्यूचर्स मार्केट में दूर किया गया। इसमें कमोडिटी एक्सचेंज क्रेता-विक्रेता को ट्रेडिंग के लिए प्लेटफार्म उपलब्ध करवाता है। अर्थात निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाता है, जिसमें मांग-पूर्ति के आधार पर स्टेंडडीइन्ज कांट्रेक्ट के तहत कीमतें तय की जाती हैं।



कोलकाता के उपनगर सोदपुर की ख्याति इन दिनों उच्च मध्यवर्गीय आवासीय कालोनियों और रेडीमेड सेंटर, श्रीनिकेतन जैसे शापिंग माल समृद्ध बाजार की वजह से हैं। यहां संपन्न खरीददार मोलभाव नहीं करता। फुटपाथिया दुकानों से खरीददारी नही करता और आम जीवन शैली महानगरीय और वातानूकुलित है। दो किलोमीटर के मध्य विशाल, रिलायंसफ्रेश , मोरे, खादिम खजाना, श्रीनिकेतन और रेडीमेड सेंटर जैसे शापिंग माल है। विशाल बगल के कमारहाटी में है तो श्रीनिकेतन और रेडीमेड सेंटर व्यस्त स्चेशन रोड पर। अमरावती में चालू बिड़ला का मोरे स्थानीय व्यापारियों के प्रतिरोध के कारण बंद हो गया तो रिलांयस फ्रेश चालू ही नहीं होपाया। खादिम खजानानिर्माणाधीन है।



माकपा के सत्तारूढ़ होने से पहले तक बीटी रोड के आर पार और हुगली के आरपार तमाम इलाका औद्योगिक इलाका हुआ करता था। सोदपुर में बंगलक्ष्मी काटन मिल, सुलेखा और बेलघरिया में मोहिनी मिल का बाजार देशभर में था। सबकुठ अब बंद है। बंगलक्ष्मी मिल की जमीन पर पीयरलेस कालोनी है। तो बरानगर, बेलघरिया, आगरपाड़ा, सोदपुर, खड़दह, टीटीगढ़, बैरकपुर, पलता, इछापुर, श्यामनगर, कांकीनाड़ा, नैदाटी के तमाम कलकारखाने बंद हो गये। जूटपट्टी श्मशान में तब्दील हो गयी। सूती मिलों का नामोनिशान नहीं है। इन कारखानों से बेरोजगार हुए लोग इन बाजारों में छोटे मोटे कामकाज और कारोबार चलाकर पेट पालते थे। पर देखते गेखते हालात बदल गया। रिहायशी बस्तियों में सुपर मार्केट और शापिंग माल, बार और रेस्तरा, बहुमंजिली महंगी आवासीय कालोनियां बन जाने से यह तमाम इलाका अब मेहनतकश जनता के लिए चकाचौंध वाला मरघट बन गया है। १९७७ में कांग्रेस के पतन के बाद समान विचारधारा वाले वामपंथी दलों माकपा, आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक ने सरकार बनायी और निर्बाध रूप से सत्ता में हैं। बाद में इसमें भाकपा भी शामिल हो गई है। रिकार्ड समय २५ साल तक सत्ता संभाले माकपा के पुरोधा ज्योति बसु ने घटक दलों के साथ तब ऐसी तालमेल बैठाई कि कभी कोई उपेक्षा का सवाल तक नहीं खड़ा कर पाया। लालदुर्ग की कमान अब कामरेड बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों में है। और शायद दुःसमय झेल रहा है। यह शायद उनके कट्टर कामरेड होने की बजाए उदारवादी होने का नतीजा है। कभी सोवियत संघ के मजबूत कम्युनिष्ट गढ़ को भी इसी उदारवाद ने बिखराव पर ला खड़ा किया। ग्लास्नोस्त और पेरोत्रोइका ने वहां वही काम किया जो आज के लालदुर्ग बंगाल में पूंजी के प्रति उदार हुई वाममोर्चा सरकार के लिए सेज और कृषि जमीन अधिग्रहण शायद कर दे। वाममोर्चा के अध्यक्ष व माकपा राज्य सचिव विमान बोस ने स्वीकार किया कि पंचायत चुनाव के लिए आपसी तालमेल से प्रत्याशी खड़े करने के मामले में मोर्चा के घटक दलों में आम सहमति नहीं बन पाई। बोस सोमवार को कोलकाता प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के दौरान पूछे गए सवालों का जवाब दे रहे थे। उन्होंने बताया कि इस बार ग्राम पंचायत की सीटों की संख्या घटी है। पंचायत चुनाव में विजयी होने के लिए आधुनिक और उग्र चुनाव प्रचार के बाद भी माकपा को कोई विशेष लाभ होता नहीं दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में चल रहे पंचायत चुनाव में माकपा को पहले की अपेक्षा कोई विशेष सफलता मिलने की संभावना कम ही दिख रही है। हाल की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य और ढांचागत संरचना के क्षेत्र में भी बंगाल पहले की अपेक्षा पिछड़ा है।



पश्चिम बंगाल में जारी पंचायत चुनावों के लिए वोटिंग के आखिरी दौर में हुई हिंसक झड़पों में रविवार को 7 लोगों के मारे जाने की खबर है। पुलिस के मुताबिक इन मौतों के अलावा 13 अन्य लोग जख्मी भी हुए हैं। सत्ताधारी लेफ्ट पार्टियों के समर्थकों और उनके विरोधियों में पिस्तौल और देसी बमों से घमासान हुआ।

5 लोग तो केवल बांगलादेश की सीमा से लगे जिले मुर्शिदाबाद में मारे गए। पुलिस के मुताबिक यहां के एक गांव में लेफ्ट और कांग्रेस समर्थकों में हुए झगड़े में एक महिला समेत 3 लोग मारे गए। मुर्शिदाबाद के रानी नगर में एक कांग्रेस कार्यकर्ता मारा गया जबकि गांव मधु में एक लेफ्टिस्ट कार्यकर्ता मारा गया।

एक लेफ्टिस्ट समर्थक की लाश पुलिस ने उत्तरी जलपाईगुड़ी जिले के मदारीहाट से बरामद की। जबकि बीरभूम जिले के नान्नुर गांव में तृणमूल कांग्रेस का एक समर्थक मारा गया।

गौरतलब है कि इससे पहले पंचायत चुनावों के दूसरे दौर में गुरुवार को भी 6 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। जबकि 11 मई को इन चुनावों के पहले दौर में भी 3 लोगों की मौत हो गई थी।



रेडीमेड सेंटर का विस्तार एक बंद कारखाना विद्यासागर काटन मिल की जमील के अंतर्गत तालाब में पिलर खड़ा करके किया जा रहा था, जबकि अभीतक जमीन का हस्तांतरण ही नहीं हुआ। रेडीमेड सेंटर का बड़ा हिस्सा तालाब पर खड़ा है।

दुकान बंद किये बगैर दोमंजिले पर गैसकटरों की मदद से निर्माणकार्य जारी था। हादसे के वक्त दोमंजिले में करीब पचास कर्मचारी और दर्जनों आम खरीदार मौजूद थे। कई दिनों से .ह काम चल रहा था। हम लोग ऊपर से गिरती चिनगारियों और सीमेंट, पत्थर, लोहे के टुकड़ों से बचने के लिए बेहद चाल सोदपुर बारासात रोड के बीचोंबीच चलने को मजबूर थे। पर किसी को चूं तक करने की हिम्मत नहीं थी, क्योंकि पार्टी की इजाजत मिलने के बाद कानून, पुलिस प्रशासनकोई कुछ नहीं कर सकता। माकपाई विधायक गोपाल भट्टाचार्य का घर मौके से बमुश्किल पांच मिनट की दूरी पर। सड़क के उसपार। तो नगरपालिका भी इतनी ही दूरी पर। पूर्व विधायक तृणमुल कांग्रेस के निर्मल बाबू का घर भी बगल में। सबके सामने यह गैरकानूनी कारोबार चल रहा था। आग गैस कटर से निकली चिनगारियों से कार्पेट में लगी और गैस करचों के लिए अनेक गैस सिलिंडर मौजूद थे। आग लगने के बाद अफरा तफरी में दुकान में लूटपाट न हो जाये, इसके मद्देनजर मालिकान के निर्देश पर दोमंजिला का शटर गिरा दिया गया। घनी बस्ती और घने बाजार, बगल में दूसरा शापिंग माल श्रीनिकेतन। छोटे दुकानदारों, आटो चालकों और स्थानीय लोगों ने दमकल की मदद से आग तो आधा घंटे में बुझा दी, पर दोमंजिले में फंसे लोगों की लाशें ही निकाली जा सकी। इनमें रेडीमेड सेंटर के मालिक की सगी भतीजी भी शामिल है।

सेंट्रलाइज्ड एअर कंडीशनर से कार्बन मोनोआक्साइड लीक होने से सभी चौदह लोगों की दम घुटने सौत हो गयी। आग से झुलसे लोग तो फिर भी बच गये। दो मिनट में ही रक्तप्रणाली को विषैली बना देने वाली कार्बन मोनोक्साइड के शिकार लोगों को बचाने का कोई मौका नहीं था।



रेडीमेड सेंटर में कोई आपात कालीन दरवाजा नहीं था


आग बुझाने का कोई इंतजाम नहीं था।


कार्पेट अत्यन्त ज्वलनशील थी।


न बाल था न जल।



प्रत्याक्षदर्शी के अनुसार आग लगने की सूचना पाने के बाद नारायण साहा अपने भाई जीवन और शंकर के साथ बाहर की ओर भागे। जल्दीबाजी में वे 33 वर्षीय रंजना को साथ ले जाना भूल गये। पीछे पीछे रंजना भी भागी पर दरवाजे तक पहुंच कर गिर गई। तब तक नारायण ने शटर गिरा दिया था। भीतर से रंजना कहती रही - काका मुझे साथ ले चलो, मैं फंस गई हूं। पर नारायण भागने की इतनी जल्दी में थे कि उन्हें भतीजी का वह करुण आवाज नहीं सुनाई पढ़ी।

इस घटना में बचे अमित घोष के अनुसार अपने रंजना को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखा है। रंजना अपने चाचा से नये फ्लैट में जाने की योजना पर विचार करने के लिए आई थी। रंजना के आलावा मालिक का एक और रिश्तेदार विमलेन्दु राय भी हादसे का शिकार हुआ है। एयरकंडीशन शो-रूमों के मशीन में आग लगने के बाद पूरा क्षेत्र किस तरह लाक्षागृह बनता है उसका जीता-जागता उदाहरण है सोदपुर का रेडीमेड सेंटर। महानगर में सैकड़ों ऐसे एयर कंडीशन शो-रूम, शॉपिंग मॉल, शॉपिंग सेंटर हैं। लगभग तीन साल पहले सत्यनारायण पार्क के एसी मार्केट के भी एयरकंडीशन डक्žट में आग लग गई थी। उस समय भी पूरे बाजार में धुआं और गैस भर गया था। पर संयोग से यह घटना रात में हुई थी। इसलिए उसमें लोग ड्डंञ्से नहीं। आग लगने के बाद इस तरह के शो-रूम और मॉल में सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।

दमकल मंत्री का कहना है कि निर्माण के समय सुरक्षा नियमों को अनदेखी की जाती है। पर सवाल यह उठता है कि प्रशासन घटना के बाद जांच का शोर तो मचाता है, पर पहले इस पर कार्रवाई क्žयों नहीं करता। सोदपुर रेडीमेड सेंटर में भी घटना का कारण वेल्डिंग को बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों का अभियोग है कि अवैध रुप से मालिक निर्माण कार्य कर रहे थे। यह शो-रूम तो दोमंजिला था जबकि बड़े-बड़े मॉल बहुमंजिला होते हैं। उनमें सैकड़ों दुकानें होती हैं। हजारों की संख्žया में ग्राहक हर समय मौजूद रहते हैं। ऐसे में इस तरह का हादसा ही तो भगदड़ में ही कई लोग कूचले जा सकते हैं। निकासीद्वार की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से इसी तरह दमघोंटू वातावरण में बड़ी घटना की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।





बगल के श्रीनिकेतन में भी यही हाल है। पांच मंजिले इस शापिंग माल की सीढी से दो से ज्यादा लोग एक साथ चढ उतर नहीं सकते। आग बुझाने का वहां भी कोई इंतजाम नहीं है।



अग्निकांड की वजह से रेडीमेड सेंटर की अनियमितताओं की तो जांच हो रही है, पर महानगर कोलकात और उपनगरों में तमाम शापिंग माल, मल्टीप्लेक्स, प्लाजा, सिनेमाघरो और दूसरे सार्वजनिक स्थलों पर आपातकालीन इंतजाम, जनसुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। पर्यावरण की पूरी तरह अनदेखी की जात है। श्रम कानून कहीं भी लागू नहीं है।



ब्रांड बुद्ध के नेतृत्व में मार्क्सवादी पूंजीवादी विकास की अंधी दौड़ में अंधाधुंध शहरीकरण और औद्योगीकरण में परंपरागत बाजार, आजीविका और उत्पादन प्रणाली से आम लोगों को, मूलनिवासियों को बेदखल करके बेहतचर वामपंथ का जो नजारा पेश है, उसमें शापिंग माल, बहुमंजिली आवासीय कालोनी, सुपर मार्केट. प्लाजा, रिसार्ट, पांच सितारा होटल, बार, रेस्तरां, डिस्कोथेक, मल्टीप्लेक्स की बाढ़ आगयी है। नंदीग्राम और सिंगुर जैसे जनविद्रोह के दमन के जरिए विपर् और तथाकथित सिविल सोसाइटी, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों की वैज्ञानिक मिलीभगत से अंधाधंध जमीन अधिग्रहण हो रहा है तो राज्य में बंद करीब छप्पन हजार कलकारखानों को प्रोमोटरों, बिल्डरों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर दिया गया है पानी के मोल। जूट मिलों और कपड़ा कारखाना के अलावा दमदम कैंट के जेसाप कारखाना इसके ज्वलन्त नमूने हैं। जो कारखाने हजारों लाखों लोगों के भरण पोषण में मददगार थे, आज शाइनिंग इंडिया सेनसेक्स इंडिया के सत्तावर्ग की मौज मस्ती का जरिया बन गये हैं। पंचायत प्रधान, विधायक, माकपा लोकल कमिटी के नेता, पार्टी होलटाइमर, सांसद, मंत्री, विपक्ष और सिविल सोसाइट इस खतरनाक खेल के दक्ष खिलाड़ी हैं।



नंदीग्राम विवाद अब राजनीतिक रंग ले रहा है। मामला पश्चिम बंगाल सरकार और गृह मंत्रालय के बीच का नहीं रहा। सीआरपीएफ बनाम सीपीएम होते जा रहे इस संग्राम की पंचायत प्रधानमंत्री कार्यालय जा पहुंची है। सरकार के सामने चुनौती बेहद जटिल है। एक तरफ सरकार की बैसाखी बने वामपंथियों के आगबबूला होने का डर है तो दूसरी तरफ सुरक्षा बलों का मनोबल टूटने का खतरा।



नंदीग्राम जाते बुद्धिजीवियों को हावड़ा के बागनान में रोक दिया गया। राज्य के गृह सचिव अशोक मोहन चक्रवर्ती ने बताया कि राज्य सरकार को बुद्धिजीवियों के नंदीग्राम जाने पर आपत्ति नहीं है, लेकिन सुरक्षा कारणों से इन्हें रोक दिया गया। उनके नंदीग्राम मेंं रहने से तनाव फैल सकता है। रवीन्द्र सदन से फिल्म निदेशक अपर्णा सेन, नाट्य कलाकार साबली मित्र, फिल्म अभिनेता कौशिक सेन सहित विभिन्न बुद्धिजीवी नंदीग्राम के लिए रवाना हुए।



माकपा के सांसद लक्ष्मण सेठ और सीआरपीएफ के डीआईजी आलोक राज के बीच रविवार को नंदीग्राम में टेलीफोन पर गर्मा-गर्म बहस हुई। दोनों एक-दूसरे की सीमा और औकात बताने में लगे रहे। डीआईजी को सांसद ने कहा कि वे अपनी सीमा में रहते हुए ही काम करें। इसके जवाब में डीआईजी ने सांसद को भी उनकी औकात बताते हुए कहा कि उन्हें पता है कि उन्हें क्या करना है। किसी की सलाह की जरूरत नहीं है। उनके कार्य में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जाए।



पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। नंदीग्राम के शिमुलकुंडू गांव की तीन महिलाओं ने मंगलवार को आरोप लगाया कि माकपा कैडरों ने सोमवार को उन्हें निर्वस्त्र कर दौड़ाया। मालती जाना, कृष्णा दास और तुलसी दास ने मंगलवार को बताया कि सोमवार को माकपा के 50 कैडर ममता दास के नेतृत्व में शिमुलकुंडू आए और उनसे माकपा का प्रचार करने को क हा, किंतु उन्होंने एेसा करने से मना कर दिया।



'नंदीग्राम' एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही औरों के भीतर भले ही कोई प्रतिक्रिया न देखने को मिले लेकिन बेलदा में आश्रय लेने वाली करीब 72 वर्षीय कनकलता की रूह कांप जाती है। उसके दिलो-दिमाग पर 'नंदीग्राम' शब्द का आतंक ऐसा छा गया है कि भले ही आप उसकी ओर मुखातिब हुए बिना ही इस शब्द का उच्चारण करते हुए पास से गुजर रहे हो, तो कनकलता अपनी रक्षा के लिए इधर-उधर पागलों की भांति भागने लगती है।



कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान, उनकी पत्नी गौरी, साझीदार जूही चावला और अभिनेत्री कैटरीना कैफ को नंदीग्राम में हिंसा के विरोध में तृणमूल कांग्रेस के सड़क मार्ग अवरुद्ध करने के कारण ट्रैफिक जाम में फँसना पड़ा। यह सभी बेंगलोर रॉयल चैलेंजर्स के खिलाफ ईडन गार्डन्स में होने वाले कोलकाता नाइट राइडर्स के मुकाबले के लिए मेजबान टीम की हौसलाअफजाई के लिए जा रहे थे, लेकिन होटल से निकलने के बाद बाईपास पर जाम में फँस गए। ...



कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव से पहले नंदीग्राम का मुद्दा उठाते हुए स्थिति से सही ढंग से निपटने में नाकाम रहने पर मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार की तीखी आलोचना की। गांधी ने बहरामपुर और माल्दा में जनसभाओं को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति शोचनीय है। उन्होंने नन्दीग्राम के पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और



हर सरकार के साथ रंग बिरंगी विचाधाराओं और अपने अपने पार्टी एजंडे के मुताबिक केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियां बदलती रही हैं। पर १९९० में डा मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के बाद से अब तक भारत सरकार और तमाम राज्य सरकारों की आर्थिक नीतियों में गजब की निरंतरता बनी हुई है। डा अशोक मित्र ने अपनी जीवनी में इसका खुलासा कर दिय है कि किस तरह अमेरिका ने डा मनमोहन सिंह को पहले वित्तमंत्री , फिर प्रधानमंत्री बनाकर भारतराष्ट्र की स्वतंत्रता और संप्रभुता को गिरवी पर रख लिया। भारत की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले चारों लोग डा णनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, चिदम्बरम और आहलूवालिया विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और अमेरिकी आर्थक संस्थानों के चाकर रहे हैं। दूसरी ओर, वियतनाम के कसाई हेनरी कीसिंजर से वामपंथी बुद्धदेव का गठबंधन है। बुद्ध, मोदी, देशमुख, मायावती,नवीन पटनायक, वसुंधरा और करुणानिधि शाइनिंग इंडिया का ब्राण्ड हैं। एक फिल्म बनी थी शापिंग माल के विरोध में नृत्य के जरिए जनप्रतिरोध पर। माधुरी दीक्षित के उस फिल्म पर विवाद खड़ा कर दिया गया। ग्लोबीकरण के झंडावरदार हैं दलित चिंतक और आइकन। चंद्रभान प्रसाद अंग्रेजी और ग्लोबीकरण को दलित मुक्ति की राह बताने से अघाते नहीं। भारतीय लोकतंत्र के पैरोकार एनडीटीवी. टाइम्स आफ इंडिया. हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, स्टार टीवी, आईबीएन टीवी, आनन्दबाजार प्रकाशन समूह की अगुवाई मे मीडिया सार्वभौम बाजार की वकालत कर रहा है। पक्ष विपक्ष की राजनीति एक हो गयी है। किसान आत्म हत्या कर रहे हैं। सेज बनाकर देश के कोने कोने में मूलनिवासियों का आखेटगाह बनाया जा रहा है। थोक कारोबार पर भी कारपोरेट कब्जा। राजनीति भी अब कारपोरेट। सत्तापक्ष के कब्जे में हैं तमाम विचारधाराएं। सूचनाएं प्रायोजित। ज्ञान पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व कायम। ई पीढ़ी मोबाइल, टीवी और नेट की नीली संस्कृति में निष्णात। क्रकेट कार्निवाल के सिवाय अब कोई भविष्य नहीं है। सेल और मार्केटिंग के अलावा कोई काम धंधा नहीं है।
फिर भी आम आदमी की चर्चा?
कारें अब टाप प्रायोरिटी पर हैं। प्राकृतिक संसाधन, जल, जंगल, जमीन और आसमान कारपोरेट के हवाले। भोपाल गैस त्रासदी को दोहराने के लिए कैमिकल हब। डाउज और सलेम को न्यौता। रसायन उद्योग के लिए पश्चिम में शून्य प्रदूषण की अनिवार्य शर्त। हमारे कानून में सिर्फ रियायतें हैं। सेज एरिया में तो भारत का कोई कानून लागू ही नहीं होगाष सेज से जुड़ी कंपनियों के सशस्त्र जवानों की सेनी भारतीय सेना से ज्यादा। आखिर राट्रद्रोही हैं कौन? स्विस बैंक भारत में चुनाव संचालित करते हें। साझेदार सीआईए। फिर भी आप को बदलाव की उम्मीद? आरक्षण निजीकरण और विनिवेश के चलते अप्रासंगिक। आरक्षण से छह हजार जातियों में बंटे मूलनिवासियों को लड़कर वोट बैंक साधे जा सकते हैं। नौकरियां हरगिज नहीं मिल सकती। नौकरियां हैं कहां? कल कारखाने बंद हो गये। खेती, काम धंधे चौपट। देसी उत्पादन प्रणाली ध्वस्त। मेट्रो, राजमार्ग,फ्लाई ओवर, इंफ्रास्ट्रक्चर, सेतु, उड़न पुल, स्सती वायुसेवा, कारपोरेट रेलवे, शापिंग माल, इंटरनेट, आउटसोर्सिंग, सूचना प्राद्योगिकी, शेयर बाजार, वेतनमान, आयकर, सीमाशुल्क में छूट किसके लिए?
मूलनिवासी जीवन और आजीविका से बेदखल। मातृभाषा से वंचित। भूमिपुत्रों को वंचित करके, संविधान और जनपद, लोक, राष्ट्रीयताओं और भाषाओं की हत्या करके क्या हम राट्र को एकताबद्ध और अखंड रख पायेंगे?
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का अड्डा बन गया यह महादेश। संघपरिवार की सुतीव्र मुस्लिम घृणा वोट बैंक के सबसे फायदेमंद समाकरण में तब्दील। मोदी और वामपंथी जिसका समान इस्तेमाल करते हैं। सुनीता विलियम्स हमारी आइकन। बाजार के तमाम ब्रांड और ऐंबेसेडर हमारे आइकन। राजनेता हमारे आइकन। और आर्थिक विकास दर , शेयर सूचकांक पर देश की सेहत तय होती हैं। चायबागानों में मृत्यु जुलूस, किसानों की आत्म हत्या, बेरोजगारी, भुखमरी, अस्पृश्यता, औरतों और बच्चों का हालत, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार और लोकतंत्र, कपास, कपड़ा और जूट की बदहाली पर किसी की नजर नहीं। जासूसी उपग्रह नष्ट करने के बहाने अमेरिका ने अंतरिक्ष युद्ध शुरु कर दिया। हथियार उद्योग पर टिकी अमेरिकी यहूदी अर्थव्वस्था का रंगभेद अब भारतीय ब्राह्मणवादी व्यवस्था की मनुस्मृति से जुड़कर ब्रह्मांड की उत्तर आधुनिक सत्ता में तब्दील। राजनीतिक भूगोल बेमायने। ग्लोबल ससत्तावर्ग के सिपाहसालार सर्वत्र राजपाट सम्हाले। मेधा दलाली का पर्याय। सिविल सोसाइटी ग्लोबल सिस्टम का कारगर हथियार। नैनो की लांचिंग देखी नहीं?
अमेरिकी अर्थ व्यवस्था,राजनीति, सैन्यतंत्र और कारपोरेट संकुल का पिछलग्गू बनाकर भारतीय लोकतंत्र का खेल सारी मूलनिवासी आबादी के सफाए के बगैर चरमोत्कर्ष पर नहीं पहुंचनी वाली है।



पिछले कुछ दिनों में अमेरिका का हित इस कदर दुनिया के साथ जुड़ गया है कि अमेरिकी हितों को ही व्यापक रूप से वैश्विक हित के रूप में परिभाषित किया जाता है और उसी आधार पर हर देश वहां के सत्ता प्रतिष्ठान के साथ अपने हितों को जोड़ता है। इनमें से कुछ देशों के हित अमेरिका के साथ कुछ ज्यादा जुड़े होते हैं और कुछ देशों के थोड़े कम होते हैं। जहां तक भारत की बात है नई उदारवादी अर्थव्यवस्था अपनाने के बाद अमेरिका के साथ इसके हित कुछ ज्यादा जुड़ गए हैं। बुश प्रशासन ने जिस तरह से विश्व व्यवस्था में हस्तक्षेप किया और दुनिया के शांतिपूर्ण ढंग से विकसित होने की संभावनाओं को जितना नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई मुश्किल है। एक तरह से बुश प्रशासन ने तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और संधियों पर सवालिया निशान लगा दिया है। कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए किए गए क्योटो संधि को बुश ने ठुकरा दिया। ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए की गई इस अंतरराष्ट्रीय संधिा में अमेरिका के नहीं होने से इसका कोई मतलब नहीं रह जाता है क्योंकि वह सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है। इसी तरह से गर्भपात आदि के लिए तीसरी दुनिया को मिलने वाली मदद पर रोक लगा कर बुश प्रशासन ने एक और प्रतिक्रियावादी काम किया। अंतर महाद्वीपीय मिसाइल संधि को एकतरफा ढंग से तोंड कर बुश प्रशासन ने दुनिया के देशों के बीच अविश्वास पैदा किया और हथियारों की रेस शुरू कर दी। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना का प्रयास बुश प्रशासन के सहयोग की वजह से सालों तक लटका रहा और जब दुनिया के देशों ने संयुक्त राष्ट्र संधा के तत्वावधान में इसका गठन कर लिया, तब भी अमेरिका इससे बाहर रहा। अफगानिस्तान पर हुए हमले का तर्क तो एक बार दिया जा सकता है क्योंकि वह अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के ठीक बाद किया गया था, लेकिन इराक वार को न्यायसंगत ठहराने वाले किसी तर्क का कोई आधार नहीं है। अमेरिका के ही जांच दल ने साबित कर दिया है कि इराक में जनसंहार का कोई हथियार नहीं मिला है। अमेरिका के दो पत्राकारों ने हाल ही में एक पत्र प्रकाशित किया है, जिसके मुताबिक जार्ज बुश और उनके प्रशासन ने दूसरा इराक वार शुरू होने के बाद से अब तक इस युद्ध के बारे में कुल 935 झूठ बोले हैं। इन झूठों के आधार पर ही बुश प्रशासन ने युद्ध को न्यायसंगत ठहराया। आतंकवाद के खतरे का हवाला देकर अमेरिका में आंतरिक सुरक्षा के कानून इतने सख्त बना दिए गए हैं कि आम आदमी की दुश्वारियां बढ़ गई हैं। इसका खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को झेलना पड़ रहा है। दो साल पहले तक कहा जाता था कि अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की जीत का स्थायी बंदोबस्त हो गया है। 1960 के दशक में जॉन एफ कैनेडी और बाद में लिंडन बी जॉनसन के समय जो सुधार किए गए और अश्वेतों को मताधिकार दिया गया और उन्हें समान नागरिक अधिकार दिए गए तो एक बड़ा मधयवर्ग डेमोक्रेट पार्टी से नाराज होकर रिपब्लिकन पार्टी के साथ चला गया था। 2001 में अमेरिका पर हुए हमले और उसके बाद छिड़े आतंकवाद विरोधी युद्ध ने रिपब्लिकन पार्टी के आधार को और मजबूत किया। लेकिन पिछले दो साल में यह आधार बुरी तरह खिसका है। कांग्रेस के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा और अभी जो हालात हैं उनमें राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की संभावनाएं कुछ खास अच्छी नहीं दिख रही हैं।




भूमंडलीकरण एक नीति-एक आर्थिक, सामाजिक तथा राजनितिक नीति का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक ऐसी नीति है जिसकी कुछ शक्तिशाली हितों द्वारा आक्रामक रूप से वकालत की जाती है और उन लोगों के गले में जबर्दस्ती उतारने का प्रयास किया जाता है जो असहाय हो कर इसे स्वीकार कर सकते हैं या इसका विरोध करने का प्रयास कर सकते हैं, हालांकि उन्हें अधिक सफलता नहीं मिल सकती हैं। ऐसे भी लोग हैं जो यह कहते हैं कि आप इसे उतना ही पीछे कर सकते हैं जितना आप किसी लहर को पीछे कर सकते हैं। यह देर-सबेर प्रत्येक देश को अपने आगोश में ले लेगा।
भूमंडलीकरण वास्तव में `नव-उदारवादी´ की संतति हो सकता है और अपने अभिभावक की भांति यह भी एक नीति है जिसे साम्राज्यवादी देशों द्वारा आगे बढ़ाया जाता है और वह तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ नििर्दष्ट है जिन्हें वह अपना िशकार बनाता है। तीन बहनें- उदारवाद, निजीकरण और भूमंडलीकरण साथ-साथ चलती हैं।
तीसरी दुनिया के देशों ने पिछली दो या तीन सदियों से साम्राज्यवाद के प्रभुत्व के तहत तकलीफें भोगी हैं। उन्होंने अपने उननिवेशी स्वामियों से पिछड़ेपन की विरासत प्राप्त की है। 20वीं सदी के मध्य या उत्तरार्ध के दौरान स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से वे अपने को कठोर स्थिति में पाते हैं, खासकर पूंजी तथा प्रौद्योगिकी के मामले में जिसकी विकास के लिए जरूरत है। वे हर क्षेत्र में अर्धविकास से पीिड़त हैं। भयंकर गरीबी, उच्च बेकारी, निरक्षरता, स्वास्थ्य-देखभाल का अभाव ही उनकी नियति बन गयी है।
द्वितीय विश्वययुद्ध की समाप्ति के बाद जो इतिहास का सर्वाधिकार विध्वंसकारी युद्ध था- विजेता ब्रेटनवूड्स सम्मेलन में शामिल हुए और उन्होंने पुनिर्नर्माण तथा विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों की स्थापना की। इन संस्थानों पर विकसित पूंजीवादी देशों खासकर अमरीका का प्रभुत्व कायम हो गया । जल्द ही वे यह निर्देश देने के औजार हो गये कि अपनी जरूरतों के लिए इन संस्थाओं से कर्ज लेने वाले ग्राहक देशों की किस तरह की आर्थिक नीतियां अपनानी चाहिए। कर्जों के साथ लगातार `शर्तो´ को भी थोप दिया गया। इसके साथ ही उन्होंने एक पूर्ण संरचनात्मक समायाजोन कार्यक्रम को जोड़ दिया जो सभी विकासशील देशों के लिए एक रामबाण हो गया, चाहे उनकी खास विशेषता जो भी हो।
संयुक्त राष्ट्र ने एक `नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था´ की रूपरेखा तैयार की। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद एक ऐसी व्यवस्था की बातें बंद हो गयीं और उसकी जगह अमरीका निर्देिशत `नयी आर्थिक व्यवस्था´ की बात की जाने लगी। ` नव- उदरतावाद ´ का आर्थिक दशZन इस क्षेत्र में प्रभावी होने लगा। `मुक्त बाजार´ प्रतिस्पर्धा, निजी उद्यम, संरचनात्मक समायोजन आदि की बातों के आवरण में तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों जो अमरीका तथा ग्रुप-8 देशों से काम करती हैं, नवगठित विश्व व्यापार संगठन के औजार साथ जो असमान गैट संधि द्वारा सामने लाया गया, साम्राज्यवादी देशों ने तीसरी दुनिया के देशों की राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर नियंत्रण करने का निष्ठुर अभियान शुरू कर दिया है। यह और कुछ नहीं बल्कि नये रूप में, नये तरीके से समकालीन विश्व स्थिति में नव उपनिवेशी शोषण थोपने का एक तरीका था। उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडीकरण प्रिय मुहावरा हो गये हैं।





एक ऐसे दौर में जब राजनीति बाजार को बढ़ावा दे रही है और न्यायपालिका भी खुद को उसी सांचे में ढाल रही है, ऐसे में गरीबों के लिए तो कोई अवसर हीं नहीं बचा है। राजनीति और न्यायपालिका बाजार अर्थव्यव्यवस्था की जरूरतें पूरी कर रही हैं ताकि अरबपतियों के और ज्यादा अमीर बनने के 'अधिकारों' की रक्षा हो सके तो दूसरी ओर गरीब और ज्यादा गरीब बने रहें। 'बाजार अर्थव्यवस्था में समान भागीदारी और समानता' पर इंडियन लॉ इंस्टीटयूट के गोल्डन जुबली समारोह में उपेंद्र बख्शी का व्याख्यान ................

'बाजार अर्थव्यवस्था' जैसी है, वैसी दिखती नहीं है। इसे पूरी तरह समझने के लिए हमें उत्पादन और प्रलोभन में अंतर समझना होगा। उत्तर आधुनिक काल के फ्रांसीसी विचारक ज्यां ब्रादिया ने अपने एक निबंध 'द मिरर ऑव प्रोडक्शन' में इस अंतर को स्पष्ट किया है : उत्पादन अदृश्य वस्तुओं को दृश्य बनाता है और लालच दृश्य वस्तुओं को अदृश्य कर देता है, हमें निश्चित रूप से यह सवाल उठाना चाहिए कि आज के 'सुधारों के युग' में भारतीय संविधान ने क्या बनाया, जिसे लालच ने बिगाड़ दिया।
संविधान निर्माताओं ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के बीच कई अंतर्विरोधों को पठनीय बना दिया, आंबेडकर ने भी 'विरोधाभासों से भरा जीवन' पर अपने भाषण में सर्वोच्च न्यायालय की भरपूर प्रशंसा की। उपनिवेशी शासन से मुक्त होने के बाद भारत में अन्तर्विरोधों से भरे समान सामाजिक विकास के मूल्यों की ञेषणा के साथ संविधान में अनुच्छेद 31