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• सुनील उवाच- मराठा मानुष से बंगाली क्या कम है? बंगाल में रहना है तो बांग्ला सीखना अनिवार्य। मराठा मानुष के हक हकूक के लिए महाराष्ट्र में जारी शिव सेना के आन्दोलन के तर्ज पर पश्चिम बंगाल में भी कोई आंदोलन शुरू किया जाये? हिंदीभाषियों और तमाम गैर बांग्ला भाषियों के खिलाफ?

गोरखालैण्ड आन्दोलन के तेजी पकड़ने की पृष्ठभूमि में सवर्ण पश्चिम बंगीय बांग्ला राष्ट्रीयता के तेवर उग्र होने लगे। सत्तारूढ़ वाममोर्चा इसी सवर्ण वर्चस्व वाली बांग्ला साम्पेरदायिकता के दम पर राज कर रहा है तीन दशक से। कोलकाता नाइट राइडर और सौरभ गांगुली एक तरफ तो दूसरी ओर ब्राण्ड बुद्ध के जरिए सार्वभौम बाजार और अंधाधुंध पूंजीवादी विकास का वामपंथ। इसके समांतर बुश बुद्ध प्रणव सोमनाथ सुनील का पंचारिष्ट, पश्चिम बंगीय सवर्ण बांगला राष्ट्रीयता के जरिए गोरखालैण्ड और पंचायत चुनाव, सिंगुर और नन्दीग्राम की चुनौतियों का मुकाबला करना चाहता है सत्तावर्ग।

सुनील उवाच- मराठा मानुष से बंगाली क्या कम है? बंगाल में रहना है तो बांग्ला सीखना अनिवार्य। मराठा मानुष के हक हकूक के लिए महाराष्ट्र में जारी शिव सेना के आन्दोलन के तर्ज पर पश्चिम बंगाल में भी कोई आंदोलन शुरू किया जाये? हिंदीभाषियों और तमाम गैर बांग्ला भाषियों के खिलाफ?
गोरखालैण्ड आन्दोलन के तेजी पकड़ने की पृष्ठभूमि में सवर्ण पश्चिम बंगीय बांग्ला राष्ट्रीयता के तेवर उग्र होने लगे। सत्तारूढ़ वाममोर्चा इसी सवर्ण वर्चस्व वाली बांग्ला साम्पेरदायिकता के दम पर राज कर रहा है तीन दशक से। कोलकाता नाइट राइडर और सौरभ गांगुली एक तरफ तो दूसरी ओर ब्राण्ड बुद्ध के जरिए सार्वभौम बाजार और अंधाधुंध पूंजीवादी विकास का वामपंथ। इसके समांतर बुश बुद्ध प्रणव सोमनाथ सुनील का पंचारिष्ट, पश्चिम बंगीय सवर्ण बांगला राष्ट्रीयता के जरिए गोरखालैण्ड और पंचायत चुनाव, सिंगुर और नन्दीग्राम की चुनौतियों का मुकाबला करना चाहता है सत्तावर्ग।



पलाश विश्वास

गोरखालैण्ड आन्दोलन के तेजी पकड़ने की पृष्ठभूमि में सवर्ण पश्चिम बंगीय बांग्ला राष्ट्रीयता के तेवर उग्र होने लगे। सत्तारूढ़ वाममोर्चा इसी सवर्ण वर्चस्व वाली बांग्ला साम्पेरदायिकता के दम पर राज कर रहा है तीन दशक से। कोलकाता नाइट राइडर और सौरभ गांगुली एक तरफ तो दूसरी ओर ब्राण्ड बुद्ध के जरिए सार्वभौम बाजार और अंधाधुंध पूंजीवादी विकास का वामपंथ। इसके समांतर बुश बुद्ध प्रणव सोमनाथ सुनील का पंचारिष्ट, पश्चिम बंगीय सवर्ण बांगला राष्ट्रीयता के जरिए गोरखालैण्ड और पंचायत चुनाव, सिंगुर और नन्दीग्राम की चुनौतियों का मुकाबला करना चाहता है सत्तावर्ग।पश्चिम बंगाल के हिंसा प्रभावित नंदीग्राम में सोमवार को भूमि उच्छेद समिति के समर्थकों तथा सत्तारूढ़ सीपीएम वर्कर्स के बीच फिर हिंसा भड़क गई। भूमि उच्छेद समिति इंडस्ट्रीलाइजेशन के लिए जमीन के अधिग्रहण का विरोध कर रही है। सूत्रों ने बताया कि नंदीग्राम के एक नए इलाके में दोनों पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ गोलीबारी की और बम फेंके। इससे बीयूपीसी के दो सदस्य घायल हो गए। भारत में अमेरिका के राजदूत डेविड मल्फोर्ड ने राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के विवादास्पद बयान पर सोमवार को सफाई देते हुए कहा कि बुश ने विकासशील देशों में खाद्यान्न उत्पादन और बेहतर पोषण के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया था।

प्रकाश तामांग को इण्डियन आइडल बनाने की मुहिम की आड़ में विमल गुरुंग ने सुभाष घीसिंग को किनारे कर दिया तामांग फैन क्लबों के जरिए। माकपा ने सुभाष के बजाय विमल को आगे लाने का खल करके पहाड़ में खेल बिगाड़ दिया और नतीजा फिर गोरखालैंड आन्दोलन।

प. बंगाल में सत्तारुढ़ सी.पी.एम. का रवैया एक ओर इस आन्दोलन का दमन करना तथा दूसरी ओर बांग्ला भाषियों व गोरखाओं के बीच विभाजन को गहरा करना है। शासक पार्टी के रूप में पतित हो चुकी सी.पी.एम. का रवैया इस जनवादी मांग के प्रति वैसा ही है जैसा शासक वर्गों की अन्य पार्टियां अपने द्वारा शासित प्रान्तों में सामान्यत: अपनाती रही हैं।

आज बंगला, तमिल, तेलगू व समृद्ध क्षेत्रीय भाषाओं में संघ की राजभाषा हिन्दी का विरोध किया जा रहा है। राष्ट्रभाषा हिन्दी अपने ही घर में पराई हो चुकी है। हर कोई संविधान का अपमान करता आ रहा है।



गोरखालैण्ड अलग प्रान्त की मांग को लेकर प. बंगाल के पर्वतीय क्षेत्रो का राजनैतिक माहौल फिर गरमा गया है। 10 मार्च, ‘08 को दार्जीलिंग हिल डवलपमैंट काउंसिल के प्रशासक सुभाष घीसिंग ने इस्तीफा दे दिया जिस मांग को लेकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चे ने घीसिंग के पर्वतीय क्षेत्रो में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा था। गोरखालैण्ड नेशनल लिबरेशन फ़्रन्ट के नेताओं तथा कार्यकर्ताओं का जनमुक्ति मोर्चे में जाने का प्रवाह जारी है। पर्वतीय क्षेत्रो में अलग प्रांत की मांग को लेकर संघर्ष फिर तेज हो रहा है।
प. बंगाल के नेपाली भाषी गोरखा बहुल पर्वतीय तथा दुआर क्षेत्रो में अलग प्रांत की मांग काफी पुरानी है। 1814–’15 के अंग्रेज–नेपाल युद्ध के बाद हुई सुगौली सं‌धि के तहत दार्जीलिंग क्षेत्रा को नेपाल से लेकर सिक्किम को दिया गया तथा 1835 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने इस क्षेत्रा को अपने शासन में शामिल किया। 1864 में अंग्रेज–भूटान युद्ध के बाद अंग्रेज शासकों द्वारा कालिपपांग तथा दुआर क्षेत्र को हथियाने के बाद 1866 में पर्वतीय तथा दुआर क्षेत्रो का मौजूदा रूप अस्तित्व में आया। 1907 में दार्जीलिंग के पर्वतीय क्षेत्रो व दुआर के नेपाली भाषी क्षेत्रो की अलग प्रशासनिक इकाई की मांग उठायी गयी। 1943 में आल–इण्डिया गोरखा लीग का गठन किया गया जिसने 1947 में उत्तराखण्ड के नाम से अलग प्रांत की मांग उठायी। अप्रैल 1947 में सी.पी.आई. के स्थानीय नेताओं ने `गोरखास्तान‘ की मांग उठायी।

बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में राज्यों के पुनर्गठन के समय भी यह क्षेत्र चर्चा में रहा। चाय बागानों के मजदूरो के बीच काम कर रही सी.पी.आई. ने राज्य पुनर्गठन आयोग को क्षेत्रीय स्वायत्तता के लिए ज्ञापन दिया तथा आल–इण्डिया गोरखा लीग ने नेपाली भाषी पर्वतीय क्षेत्रो व दुआर को केन्द्र शासित संघीय क्षेत्रा (यूनियन टेरीटरी) का दर्जा देने की मांग उठायी। परन्तु शासक कांग्रेस ने इन मांगों को अनदेखा किया। बीसवीं सदी के नौवें दशक में अलग प्रांत के लिए जी.एन.एल.एफ. के नेतृत्व में आन्दोलन ने जोर पकड़ा। आन्दोलन में क्षेत्र की जनता ने व्यापक पैमाने पर हिस्सेदारी की तथा चाय बागानों, लकड़ी व पर्यटन (टी, टिम्बर, टूरिज्म) बुरी तरह प्रभावित हुआ। परन्तु, सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में जी.एन.एल.एफ. ने अलग प्रांत के लिए आन्दोलन को छोड़कर 1988 में पर्वतीय परिषद (डी.जी.एच.सी.) पर समझौता कर लिया। सुभाष घीसिंग परिषद के अयक्ष बन गये।

गोरखालैण्ड आन्दोलन के प्रति शासक `वाम‘ मोर्चे की नेतृत्वकारी पार्टी सी.पी.एम. ने जहां एक ओर आन्दोलन का क्रूर दमन किया, वहीं बांग्ला भाषी तथा नेपाली भाषी जनता को बांटने की साजिशें कीं। गोरखालैण्ड के प्रति शासक सी.पी.एम. के रवैये से असंतुष्ट सी.पी.एम. के स्थानीय नेताओं ने सी.पी.एम. छोड़कर अलग संगठन सी.पी.आर.एम. का गठन किया।

डी.जी.एच.सी. के गठन के बाद सुभाष घीसिंग व उनके सहयोगियों ने क्षेत्रा की जनता की आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ किया तथा इन क्षेत्रो में पीने के पानी तक की समस्या विकराल रूप धारण करती गयी। सी.पी.एम. की राज्य सरकार के साथ मिलकर सुभाष घीसिंग ग्रुप सत्ता के टुकड़ों पर संतुष्ट हो गया। चाय बागानों के मजदूरों व पर्वतीय क्षेत्रा के किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया।

दरअसल, डी.जी.एच.सी. के बहुत सीमित अ‌धिकार हैं तथा यह केन्द्र की सत्तारुढ़ सरकार, प. बंगाल की सी.पी.एम. सरकार तथा सुभाष घीसिंग की जी.एन.एल.एफ. के बीच प्रशासनिक प्रबंध है जिसका संविधान की योजना में कोई स्थान नहीं है। जनता की बढ़ती समस्याओं तथा डी.जी.एच.सी. की अक्षमता के चलते नेपाली भाषी पर्वतीय क्षेत्रो व दुआर में अलग प्रांत गोरखालैण्ड की मांग फिर जोर पकड़ने लगी। पर्वतीय परिषद के चुनाव न होने पर 2005 से सुभाष घीसिंग परिषद के अयक्ष के स्थान पर राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासक के रूप में कुर्सी पर जमे रहे।

दूसरी ओर, गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के नेतृत्व में अलग प्रान्त की मांग जोर पकड़ने लगी तथा घीसिंग के पूर्व सहयोगी बिमल गुरंग के नेतृत्व में मोर्चे में घीसिंग–विरोधी तेवर बढ़ते गये। जी.एन.एल.एफ. के कार्यकर्ता मोर्चे में शामिल होने लगे। अलग प्रांत की मांग को कुंद करने के लिए सुभाष घीसिंग ने सी.पी.एम. व कांग्रेस के साथ मिलकर डी.जी.एच.एस. को संविधान के छठे श्येडूल में शामिल करने की बात उठायी। यह पश्चिम बंगाल पर लागू नहीं है तथा इसके लिए संविधान में संशोधन आवश्यक है। सुभाष घीसिंग द्वारा यह मांग उठाया जाना तथा इसको सी.पी.एम. व कांग्रेस का समर्थन अलग प्रांत की मांग के लिए आन्दोलन के खिलाफ साजिश है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चे ने इस मांग को अस्वीकार करते हुए इन क्षेत्रो में सुभाष घीसिंग के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।

गोरखालैण्ड अलग प्रान्त की मांग इन क्षेत्रो की जनता की जनवादी मांग है। 9वें दशक के गोरखालैण्ड आन्दोलन के दौरान सी.पी.आई. (एम–एल)–न्यू डेमोक्रेसी ने इस जनवादी मांग का समर्थन किया था। पार्टी की तत्कालीन केन्द्रीय कमेटी के सदस्य का. साधन सरकार द्वारा गोरखालैण्ड की मांग का समर्थन करते हुए लिखित एक पुस्तिका प्रकाशित की गयी थी तथा पार्टी ने आन्दोलन के समर्थन में कार्यक्रम लिये थे। सी.पी.आई. (एम–एल)–न्यू डेमोक्रेसी अभी भी इस जनवादी मांग का समर्थन करती है।




आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स, राजस्थान रायल्स, चेन्न्ई सुपर किंग्स, डेक्कन चार्जर्स, मुंबई इंडियन, बेंगलूर चैलेंजर, दिल्ली डेयर डेविल और पंजाब किंग्स के क्रिकेट कार्निवाल के जरिए मीडिया और बाजार ने सत्तावर्ग के लिए जो मनोरंजन और मुनाफा कमाने का रास्ता तैयार किया है, वह राष्ट्रीयताओं की अस्मिता को गुदगुदाने का काम किस खतरनाक तरीके से कर रहा है और इस खतरनाक खेल की आखिरी मंजिल क्या होगी, ताजा गोरखालैंड आन्दोलन और दिनोंदिन सुनील प्रणव, बुद्ध बुश, सोमनाथ की उग्र होती जा रही पश्चिम बंगीय बांग्ला राष्रीयता और अमेरिकी साम्राज्यवादी मनुस्मृति रंगभेदी मूलनिवासी सफाया मुहिम से साफ जाहिर है।









शोएब अख्तर को भले ही इंडियन प्रीमियर लीग में खेलने की अनुमति मिल गई है लेकिन पूर्व खिलाड़ियों का मानना है कि कई महीने क्रिकेट से दूर रहे इस तेज गेंदबाज को मैच फिटनेस के अभाव में अब इस ट्वेंटी-20 लीग में काफी मुश्किलात पेश आएँगी। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के एक अपीली पंचाट ने शोएब पर लगाया गया पाँच साल का प्रतिबंध एक महीने के लिए रोक दिया। पिछले साल दिसंबर से अब तक शोएब ने सिर्फ एक प्रतिस्पर्धी मैच खेला और 18 ओवर ही फेंके हैं।

डेकन चार्जर्स के खिलाफ इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) ट्वेंटी-20 क्रिकेट टूर्नामेंट में अपनी जीत से उत्साहित बेंगलुरू रॉयल चैलेंजर्स जब सोमवार को यहां किंग्स इलेवन, पंजाब के खिलाफ खेलने उतरेगी तो उसके सामने किंग्स इलेवन के विजयरथ को रोकने की बड़ी चुनौती होगी। राहुल द्रविड़ की अगुआई वाली रॉयल चैलेंजर्स की टीम ने शनिवार को डेकन चार्जर्स को रोमांचक मुकाबले में तीन रन से शिकस्त दी थी।





मराठी वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने के लिए राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने नया शगूफा छोड़ा है। पार्टी ने मांग की है कि राज्य में सभी प्राइवेट कंपनियों में 80 फीसदी नौकरियां मराठीभाषी लोगों के लिए आरक्षित की जाएं। पार्टी के कोऑर्डिनेटर मनोज चव्हाण ने कहा कि , ' महाराष्ट्र नवनिर्माण कामगार सेना , जो एमएनएस की कामगारों की यूनियन है , महाराष्ट्र में 45 हजार उद्योगों को चिट्ठी लिखकर यह सुनिश्चित करने को कह रही है कि उनमें 80 फीसदी नौकरियां मराठियों के लिए रिजर्व की जाएं। ' महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने भड़काऊ बयान न देने की पुलिस की चेतावनी के बावजूद फिर से उत्तर भारतीयों पर निशाना साधा। उन्होंने एमएनएस के गठन के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित रैली में कहा कि उनका संगठन उत्तर भारतीयों को स्थानीय संस्कृति से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं देगा।

राज ठाकरे ने चुनौती देते हुए कहा , ‘ अगर सरकार में हिम्मत हो तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाए। मैंने अपना रुख साफ कर दिया है कि राज्य में सिर्फ महाराष्ट्र दिवस ही बनाया जाना चाहिए। ’

राज ने 2 महीने की चुप्पी तोड़ी तो बिग बी अमिताभ के बारे में पहले जो भी कहा था उसे सही ठहराया। उन्होंने बिग बी की पत्नी जया बच्चन के इस बयान पर उनको आड़े हाथों लिया कि वह राज को नहीं जानतीं। भाषा के मुताबिक , राज ने अपने पहले के भाषणों को तिल का ताड़ बनाने के लिए हिंदी टीवी चैनलों पर भी निशाना साधा।



सव्र वर्चस्व के सर्वोत्तम मंच आनन्द बादार पत्रिका के चार मई अंक में छपे सुनील गंगोपाध्याय के ताजा लेख बांगालिरा कि माराठिदेर चेये मातृभाषाके कम भालोबासे, में सुनील ने अपनी भाषा पुलिस और बांग्ला न बोलने वालों, खासकर हिंदीभाषियों क चुटिया पकड़कर बंगाल से बाहर खदेड़ने वाली दलीलों की यादें फिर ताजा कर दीं।अनेकता में एकता की मिसाल 'भारत', आज उग्र राजनीतिक दलबंदी व बहुदलीय व्यवस्था के कारण टूटने के कगार पर है। पिछले दिनों परप्रान्तियों को केवल इसलिए मारा जा रहा था, क्योंकि वे हिन्दी बोल रहे थे। सर्वप्रथम तो यह जानने की ज़रूरत है कि संविधान की धारा 343 के अनुसार हिंदी राष्ट्रभाषा है। हिंदी का बहिष्कार करना राष्ट्रद्रोह है। यहां यह जानना ज़रूरी है कि हिन्दी भाषा किसी एक धर्म या जाति की नहीं है, बल्कि वह सबकी भाषा है। दरअसल हिन्दी सीखने के लिए सबको आगे आना चाहिए।


इसी दिन नंदीग्राम सिंगुर किसान आंदोलन के झंडेवरदार, महाश्वेता देवी और मरीचझांपी नरसंहार के जल्लाद अमिय सान्याल को नियमित छापने वाले बांग्ला अखबार बांग्ला स्टेट्समैन ने दलित बंगाली शरणार्थियों के खिलाफ जारी प्रणव मुखर्जी के देशनिकाला अभियान के सर्थन में बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानने और नागरिकता संशोधन कानून के तहत राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने पर जोर देते हुए पहले पेज पर बाटम लेख ठापा है। जाहिर है कि सत्तावर्ग का आनन्दबाजार और प्रतिरोध का परचम लहराने वाले ममता समर्थको के अखबार स्टेट्समैन का इस देश के मुलनिवासियों के प्रति नजरिया एक ओवम् अदै्वत है।

हिन्दी भाषियों के खिलाफ मराठा मानुष के हक हकूक के बहाने मुम्बई में जो घृणा अभियान चालू है , बंगाल के सत्तावर्ग और पश्चिम बंगीय बांग्ला राष्ट्रीयता के झंडेवरदार उसके खलाफ खामोश हैं। किसी लेखक कलाकार ने निंद नहीं की। किसी राजनेता ने विरोध नहीं जताया।

इसपर तुर्रा यह कि महाश्वेता देवी और वासुदेवन नायर से दगा करके गोपीचंद नारंग की मदद से साहित्य अकादमी पद हथियाने वाले सत्तारूठ वाममोज्ञचा के सांस्कृतिक सलाहकार सुनील गंगोपाध्याय ने हिन्दीभाषियों के खिलाफ घृणा अभियान की निन्दा करने के बजाय इसको महिमा मंडित करते हुए बंगालियों को चुनौती दे डाली है कि क्या बंगाली मराठियों की तुलना में अपनी मातृभाषा से कम प्यार करते हैं?

इससे संदेश क्या जाता है?
मराठा मानुष के हक हकूक के लिए महाराष्ट्र में जारी शिव सेना के आन्दोलन के तर्ज पर पश्टिम बंगाल में भी कोई आंदोलन शुरू किया जाये? हिंदीभाषियों और तमाम गैर बांग्ला भाषियों के खिलाफ?



यूपी, बिहार वालों की भाषा भोजपुरी व बिहारी है। मराठियों की मराठी, गुजरातियों की गुजराती, मारवाड़ियों की मारवाड़ी, मुस्लिमों की उर्दू, पारसियों की पारसी, पंजाबियों की पंजाबी है तो हिन्दी किसकी भाषा है? हिन्दी अपने ही घर में बेगानी क्यों हो गई है? यह न भूलें कि हम हिन्दुस्तान में रह रहे हैं। हिंदी हमारी मातृभाषा है। आज राजनीतिक स्तर इतना गिर चुका है कि पहले जातिवाद, प्रान्तवाद अब भाषा कार्ड के आधार पर लोगों को बांटा जा रहा है। आज हम भीतराघात से आहत हैं, वहीं हमारे वीर सैनिक राष्ट्र की सुरक्षा के लिए देश की सीमा पर तैनात हैं, जो विभिन्न समुदायों से ताल्लुक रखते हैं। यदि हम भाषा के आधार पर बंट जाते हैं तो हर सैनिक अपने - अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए आ खड़ा होगा। देश टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा। तब क्या हम बाहरी ताकत से स्वयं को बचा पाएंगे?



उत्तर भारतीयों के खिलाफ हाल में दिए गए भड़काऊ बयान के लिए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना [मनसे] के प्रमुख राज ठाकरे मुसीबत में फंस सकते हैं। मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने चेतावनी दी है कि अगर राज ने कोई आपत्तिाजनक बात कही है तो उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने शनिवार को उत्तर भारतीयों के खिलाफ फिर से आग उगली। लेकिन राज्य सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने के बारे में असमंजस में है। कांग्रेस-एनसीपी की सरकार की समझ में नहीं आ रहा है कि ठाकरे पर क्या एक्शन लें।

सत्ताधारी गठबंधन के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अगर हम ठाकरे के खिलाफ क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हैं तो हमारे सामने मराठी वोटों के खफा होने का खतरा पैदा हो जाएगा। चुनाव आने वाले हैं और यह कदम हमारे लिए खतरनाक होगा। ठाकरे के विचारों से कोई सहमत हो या नहीं, लेकिन यह साफ है कि उन्होंने उत्तर भारतीयों की खिलाफत करके बहुत से मराठियों का रुख बदल दिया है। इन लोगों को अब यह यकीन होने लगा है कि उनकी बेरोजगारी की बड़ी वजह उत्तर भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे वक्त में हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा। अगर ठाकरे को गिरफ्तार किया जाता है तो इन लोगों के बीच उनकी इमेज हीरो की तरह बनने का खतरा है।

फरवरी में भी राज ठाकरे की उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयानबाजी के बाद हिंसा भड़क उठी थी। तब भी राज्य प्रशासन पर ठाकरे की गिरफ्तारी में हीलाहवाली करने का आरोप लगा था। उधर, समाजवादी पार्टी के सांसद अमर सिंह द्वारा ठाकरे की आलोचना पर एमएनएस ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। अमर सिंह ने राज ठाकरे को पागल करार देते हुए कहा था कि उन्हें इलाज की सख्त जरूरत है। एमएनएस के नेता ने कहा कि इलाज की जरूरत ठाकरे को नहीं, अमर सिंह को है।




महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना [मनसे] के प्रमुख राज ठाकरे पर कार्रवाई को लेकर प्रदेश सरकार पर दबाव बढ़ गया है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगलने के लिए राज की गिरफ्तारी की मांग की है।

समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने मनसे प्रमुख राज ठाकरे को गिरफ्तार करने और उन पर मकोका लगाने की मांग की है। सपा के मुंबई अध्यक्ष अबु आजमी ने कहा है कि इस तरह के व्यक्ति को खुले घूमने देना सामाजिक और धार्मिक सद्भाव के लिए खतरा है। राष्ट्रीय जनता दल के नेता मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को पत्र लिखकर राज की गिरफ्तारी की मांग करेंगे।

अमर सिंह ने कहा कि राज, विलासराव व राकांपा प्रमुख शरद पवार के बीच साठगांठ है। इसीलिए पुलिस उनपर कार्रवाई नहीं कर रही है। सपा नेता ने आरोप लगाया कि पवार के रिश्तेदार और पूर्व आईपीएस अफसर विक्रम बोकई मनसे के मुख्य वित्तपोषक हैं।

महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता संजय निरुपम ने कहा कि जितनी जल्दी हो सके राज के भाषण की जांच की जानी चाहिए। यदि किसी कानून के उल्लंघन का मामला बनता है तो उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।

राज द्वारा मुंबई में अपराधों के लिए उत्तर भारतीयों को जिम्मेदार ठहराने पर संजय ने कहा कि सभी समुदायों में अच्छे और बुरे लोग हैं। दाउद इब्राहिम, टाइगर मेनन, छोटा राजन, अरुण गवली, रामा नाईक, अमर नाईक, वर्धा राजन, हाजी मस्तान और करीम लाला यूपी-बिहार से नहीं हैं।

राज ठाकरे द्वारा अपने भाषणों में डा. अंबेडकर को शामिल करने पर निरुपम ने कहा कि राज को इस मामले में डा. अंबेडकर को नहीं घसीटना चाहिए।

इस बीच पुलिस ने मनसे नेता के भाषण के मुख्य अंशों का विश्लेषण किया। राज द्वारा शनिवार को मुंबई में एक रैली के दौरान दिए गए भड़काऊ बयान की चौतरफा निंदा हो रही है। भाजपा ने कहा है कि वह विभाजनकारी एजेंडा पर आगे बढ़ रहे हैं। बिहार में सत्तांरूढ़ राजग और विपक्षी राजद ने राज को भड़काऊ भाषण देने से बचने की नसीहत दी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने राज से कहा जबान संभालकर बात करें। दुनिया की कोई भी ताकत उत्तर भारतीयों को महाराष्ट्र में छठ पूजा करने से नहीं रोक सकती। समाजवादी पार्टी ने मांग की है कि मनसे प्रमुख को गिरफ्तार किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ मकोका के तहत आरोप लगाए जाने चाहिए।

देशमुख ने कहा कि सरकार उनकी योजनाओं को विफल कर देगी। गौरतलब है कि राज ने प्रदेश सरकार को उन्हें गिरफ्तार करने की चुनौती दी थी। सांप्रदायिक और क्षेत्रीय घृणा का माहौल पैदा करने के लिए राज की निंदा करते हुए देशमुख ने कहा कि महाराष्ट्र की मिश्रित संस्कृति है और विभिन्न प्रांतों के लोग यहां सामंजस्य से रहते हैं और उन्होंने राज्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

देशमुख ने कहा कि जो लोग अन्य प्रांतों से आकर महाराष्ट्र में रह रहे हैं, उन्हें असहाय नहीं महसूस करना चाहिए। राज्य सरकार घृणा फैलाने वाले व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने से नहीं हिचकिचाएगी। उपमुख्यमंत्री एवं राकांपा नेता आरआर पाटिल ने कहा कि हम किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने नहीं देंगे। इस बार पुलिस बेहतर तरीके से तैयार है। पाटिल ने कहा कि राज और आजमी दोनों के बयान का सरकार विश्लेषण करेगी। आजमी ने कहा था कि वह आत्मरक्षा के लिए उत्तर भारतीयों को लाठी का इस्तेमाल करना सिखाएंगे।

आजमी ने संवाददाता सम्मेलन में आरोप लगाया कि मुझे संदेह है कि शिवसेना के वोटबैंक में सेंध लगाने की मंशा से कांग्रेस और राकांपा ने राज ठाकरे के साथ गुप्त गठबंधन कर रखा है। इसी कारण वे भड़काऊ बयान देने के बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

आजमी ने कहा कि राज की शनिवार की रैली के बाद टैक्सी चालक भयभीत महसूस कर रहे हैं। आजमी ने उनके लिए टेलीफोन हेल्पलाइन स्थापित करने की घोषणा की है। आजमी ने कहा कि राज को निश्चित तौर पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण कानून [मकोका] के तहत नामजद किया जाना चाहिए। मुझे राज्य सरकार पर दया आती है जो ऐसे समय में मूकदर्शक बनी हुई है, जब राज द्वारा संविधान को चुनौती दी जा रही है। रैली के दौरान राज ने उत्तर भारतीयों पर आरोप लगाया था कि वे स्थानीय लोगों को डरा धमकाकर महाराष्ट्र की संस्कृति पर हमला करने का प्रयास कर रहे हैं।



महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे के आक्रामक रुख को देखते हुए समाजवादी पार्टी मुंबई में उत्तर भारतीयों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग देगी। यह जानकारी सोमवार को सपा के महाराष्ट्र अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य अबू आसिम आजमी ने दी।

आजमी पूछते हैं कि यदि वे [राज ठाकरे] हमें मारने और भगाने की बात करेंगे तो हम और कर भी क्या सकते हैं? इसीलिए उत्तर भारतीयों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग देने का फैसला किया है। आजमी आत्मरक्षा को मौलिक अधिकार मानते हुए तर्क देते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी तो अपने कार्यकर्ताओं को लाठी और राइफल चलाने की ट्रेनिंग देता है। वह कहते हैं कि जब पुलिस हमारी सुरक्षा के लिए कुछ नहीं कर सकती, तो हमें स्वयं कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। हम अपनी तरफ से किसी पर आक्रमण करने नहीं जा रहे हैं। यह योजना सिर्फ आत्मरक्षा के लिए बनाई जा रही है। वह पत्रकारों से दो स्थानीय टेलीफोन नंबर [022-22831766 एवं 022-22856672] छापने का अनुरोध करते हुए कहते हैं कि यदि किसी उत्तर भारतीय या टैक्सी ड्राइवर पर हमला होता है, तो वह इन नंबरों पर संपर्क करे। उसे तुरंत मदद पहुंचाई जाएगी।

राज ठाकरे वाली ही आक्रामकता के साथ उन्हें जवाब देने के लिए मशहूर आजमी कहते हैं कि शनिवार की रैली में दिया गया राज का भाषण उन पर महाराष्ट्र संगठित अपराध निरोधक अधिनियम [मकोका] के तहत मामला दर्ज करने के लिए पर्याप्त है। इसलिए उनपर आईपीसी की धारा 120बी [आपराधिक साजिश] के बजाय मकोका के तहत ही मामला दर्ज किया जाना चाहिए।

आजमी राज द्वारा स्वयं पर लगाए गए आरोपों के बाद उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने की तैयारी कर रहे हैं। राज ने आजमी को 1993 के बमकांड का आरोपी बताते हुए उनके बेटे का भी आपराधिक रिकार्ड होने की बात कही थी। इसका स्पष्टीकरण देते हुए आजमी ने कहा कि 1993 के बमकांड मामले की सुनवाई शुरू होने के पहले ही उन्हें सुप्रीमकोर्ट ने इस मामले से बाइज्जत बरी कर दिया था। इसके अलावा मेरे बेटे को नशीले पदार्थ के एक मामले में दुबई पुलिस ने हिरासत में अवश्य लिया था, लेकिन उसे गिरफ्तार नहीं किया गया था।

आजमी कहते हैं कि वह सलाह ले रहे हैं कि इस प्रकार के निराधार आरोप के मामले में राज पर क्या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। आजमी ने कहा कि महात्मा गांधी ने मुंबई के जिस अगस्त क्रांति मैदान से अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया था, उसी मैदान से सपा राज ठाकरे की इस समाज बांटने वाली राजनीति के विरुद्ध आंदोलन शुरू करेगी। जिसका नारा होगा 'राज ठाकरे गुंडागर्दी छोड़ दो, मराठी-उत्तर भारतीय को जोड़ दो'।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भाषा और क्षेत्र के आधार पर उत्तर भारतीय लोगों के विरोध में बयानबाजी कर महाराष्ट्र में अशांति फैलाने की कोशिश किए जाने की स्पष्ट शब्दों में निंदा की है। आरएसएस ने राज ठाकरे का नाम लिए बिना कुछ पार्टियों और नेताओं द्वारा अल्पकालीन राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाए जाने के खिलाफ सचेत किया। आशंका है कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के अध्यक्ष राज ठाकरे 3 मई को मुंबई के शिवाजी पार्क में होने वाली पार्टी की आमसभा में एक बार फिर उत्तर भारतीयों के खिलाफ प्रचार को हवा दे सकते हैं।



महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के नेता राज ठाकरे के उत्तर भारतीयों के खिलाफ चलाए गए अभियान की आलोचना करते हुए बीजेपी ने कहा है कि देश में जातिवाद और संप्रदाय की राजनीति करने वालों के लिए कोई स्थान नहीं है।

मुंबई में शनिवार को राज ठाकरे की उत्तर भारतीयों के विरोध में आयोजित रैली के बारे में बीजेपी प्रेजिडेंट राजनाथ सिंह ने कहा कि देश की राजनीति में उनके लिए कोई स्थान नहीं है जो जातिवाद और संप्रदायवाद की राजनीति करते हैं। मुंबई को भगवान गणेश की भूमि और काशी को शिव की भूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति मुंबई अथवा काशी में से कहीं भी निवास कर सकता है।

सिंह ने कहा कि शिव, पार्वती और गणेश सभी एक ही परिवार के सदस्य हैं। किसी को भी परिवार तोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती।




आरएसएस की पश्चिमी क्षेत्र की यूनिट के प्रमुख अशोक ककड़े ने बुधवार रात एक आधिकारिक बयान में कहा कि संघ सभी नागरिकों को देश के सभी हिस्सों में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करने के संवैधानिक अधिकार का समर्थन करता है। आरएसएस ने यह भी कहा कि प्रवासियों को स्थानीय आबादी की मुख्यधारा में शामिल होना चाहिए। आरएसएस ने मीडिया से अपील की कि वह राजनेताओं और राजनीतिक दलों के सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाने और तनाव पैदा करने वाले बयानों को तूल न दे।



राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पिछले साल नवम्बर की छह तारीख को पश्चिम बंगाल के नन्दीग्राम में हुई मौतों के लिए राज्य की बुद्धदेव सरकार की ढील को जिम्मेदार ठहराया है। इस सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए एनएचआरसी ने कहा है कि राज्य सरकार को खुद उस हिंसा की जिम्मेदरी लेनी चाहिए और यदि वह ऐसा नहीं करती तो उसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
नन्दीग्राम में नवम्बर की बहुचर्चित हिंसा के दौरान लोगों के मारे जाने तथा सम्पत्ति के नुकसान को दुर्भाज्ञपूर्ण करार देते हुए एनएचआरसी ने माकपा की अगुआई वाली प्रदेश की वामपंथी सरकार को ही समग्र रूप से इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि नंदीग्राम में माकपा कार्यकर्ताओं ने हमला किया। उसके बाद हिंसा में कई जानें गयीं और सम्पत्ति का नुकसान हुआ। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है ‘‘ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल सरकार माकपा कार्यकर्ताओं के हमले को रोकने में नाकाम रही है और इस तरह अपने दायित्व के निर्वाह में विफल रही है।’’ रिपोर्ट में कहा गया है ‘‘हमले के बाद भड़की हिंसा और उसमें लोगों के मारे जाने तथा उनकी सम्पत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी वाम मोर्चा सरकार को लेनी चाहिए।’’
आयोग ने कहा कि मरने वाले लोगों के निकटतम सम्बन्धियों को मुआवजा दिया जाना चहिए। इस घटना के पीड़ितों को भी कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार ही मुआवजा राशि दी जानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि पिछले साल 14 मार्च को नन्दीग्राम में मारे गये लोगों के निकटतम परिजनों को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पांच-पांच लाख रूपये मुआवजा दिये जाने का आदेश दिया था। न्यायालय ने घटना में घायल होने वाले लोगों को एक एक लाख रूपये तथा बलात्कार पीड़ितों को दो-दो लाख रूपये मुआवजा देने के आदेश दिये थे।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है ‘‘हमले के दौरान पूर्ण रूप से तथा आंशिक रूप से मकानों की क्षति के लिए जो मुआवजा तय किया है वह अपर्याप्त है और मुआवजे की राशि और बढ़ायी जानी चहिए।’’ आयोग ने संजय पारिख नामक व्यक्ति की शिकायत के बाद प्रदेश सरकार से 6 नवम्बर 2007 की घटना पर जवाब तलब किया था।
राज्य के मुख्य सचिव ने आयोग को दिये अपने जवाब में कहा था कि इसमें 560 घर पूर्ण रूप से तथा 399 घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए हैं। पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के लिए 10 हजार रूपये तथा आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त मकानों के लिए पांच हजार रूपये मुआवजा देने का प्रस्ताव है। प्रत्येक प्रभावित परिवार को बर्तन तथा घरेलू सामान खरीदने के लिए भी एक हजार रूपये मुआवजा दिये जाने का प्रस्ताव है।
आयोग के जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 6 नवम्बर की घटना के बाद माकपा कार्यकर्ताओं ने भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (बीयूपीसी) के समर्थकों के मकानों पर कब्जा कर लिया है और वे इन घरों के मालिक होने का दावा कर मुआवजे की मांग कर रहे हैं। आयोग ने ‘‘क्षति के लिए मुआवजा तय करने के वास्ते एक समिति का गठन करने को आवश्यक बताया है। इससे सुनिश्चित किया जा सकेगा कि मुआवजे की राशि सही लोगों को मिले।’’
मीडिया में आयी इन खबरों पर आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया। पुलिसिया कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने भी जांच केन्द्रीय जांच ब्यूरो से कराने का आदेश दिया था। ( आयोग के ८ फरवरी, २००८ के आदेश के आधार पर )



नंदीग्राम में भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के जुलूस पर गोलियां बरसाकर माकपा ने अपना क्रूञ्र चेहरा ही नहीं दिखाया है, बल्कि अब भीतरी आलोचना से वाममोर्चे में दरार भी पड़ गई है। करीब दस महीने बाद नंदीग्राम में फिर हुई हिंसा से साफ है कि माकपा नेतृत्व इस मसले को हल करने में विफल रहा है। यह शुरू से स्पष्ट है कि नंदीग्राम की लड़ाई दरअसल स्थानीय माकपा नेतृत्व की मूंछ की लड़ाई है। पिछली बार जब वहां खून-खराबा हुआ था, तो माकपा नेतृत्व ने जताया था कि परिस्थिति के आकलन में उससे चूक हुई है। सवाल यह है कि लगभग दस महीने बाद भी नंदीग्राम के हालात जस के तस क्‍यों हैं। शनिवार को निहत्थे लोगों पर गोलियां क्‍यों चलीं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं। या तो माकपा नेतृत्व ने इस मसले का हल निकालने की गंभीरता से कोशिश नहीं की। या वह खुद भी किसानों को निशाना बनाने की इस खूनी हिंसा में शरीक है। माकपा कार्यकर्ताओं की हिंसा के परिप्रेक्ष्य में पुलिस प्रशासन के चुपचाप बैठे रहने से भी इस आशंका को बल मिलता है। माकपा वह पार्टी है, जो दूसरे राजनीतिक दलों को न्याय, इंसाफ और पारदर्शिता का पाठ पढ़ाती रहती है। लेकिन नंदीग्राम में उसका रवैया देखिए। शनिवार की हिंसा में अनेक लोग मारे गए हैं। इसके ब्‍योरे हैं कि माकपा कार्यकर्ता लाशों को उठा-उठाकर कहीं और ले गए हैं, ताकि इनकी गिनती उनकी पोल न खोल दे। राज्यपाल ने नंदीग्राम को युद्धभूमि की संज्ञा दी है। लेकिन इस पर शर्मसार होने के बजाय माकपा राज्यपाल को सांविधानिक तौर-तरीके की सीख दे रही है! नंदीग्राम को गुजरात बताने वाली कोई और नहीं, माकपा की सहयोगी पार्टी आरएसपी है, जिसके एक मंत्री इस हत्याकांड के विरोध में इस्तीफा देने की बात कर रहे हैं। वाममोचां सरकार के तीन दशक के शासनकाल में कदाचित यह पहला मौका है, जब इसका एक सहयोगी सरकार से अलग होने की बात कर रहा है। ममता बनर्जी के अभियान और लोकसभा से इस्तीफे को विरोध की राजनीति का हिस्सा मान सकते हैं। लेकिन सैकड़ों बुद्धिजीवियों के अनशन पर बैठने और कोलकाता फिल्म महोत्सव पर इसकी काली छाया पडऩे के गंभीर निहितार्थ हैं। महाश्वेता देवी तो सिंगुर में हुई हिंसा के समय से ही वाममोर्चे का विरोध कर रही हैं। शनिवार को नंदीग्राम में दूसरी बार की हिंसा ने चिदानंद दासगुप्ता, अपर्णा सेन और रितुपर्णों घोष जैसे फिल्मकारों को भी सरकार के विरोध में ला खड़ा कर दिया है। माकपा कार्यकर्ताओं ने मेधा पाटकर के साथ जिस तरह बदसुलूकी की और ममता बनर्जी के काफिले को जगह-जगह रोककर जिस तरह परेशान किया, उससे भी देश भर में प्रतिकूल संदेश गया है। केंद्र भले ही यूपीए को एकजुट रखने के लिए माकपा के प्रति सख्‍त न हो रहा हो, लेकिन बुद्धदेव सरकार को संयम बरतने का निर्देश तो दिया ही जा सकता है। इसके अलावा पीडितों को न्याय दिलाने और दोषी कार्यकर्ताओं को दंडित करने के लिए भी राज्य सरकार पर दबाव बनाना होगा। राज्य सरकार विशेषकर माकपा को नन्दीग्राम की ओर विशेष ध्यान देना होगा, क्‍योंकि वहां की भयावह स्थिति की लपट राज्य के अन्य क्षेत्रों को अपने आगोश में ले सकती है। इसलिए सरकार को अविलम्‍ब नन्दीग्राम में बर्चस्व की लड़ाई को खत्म करनी चाहिए, ताकि वहां शांति की स्थापना हो सके। नन्दीग्राम में हो रही हिंसा को देखते हुए आज विपक्षी दलों द्वारा पश्चिम बंगाल बंद का आह्वान किया गया, जिसने सम्‍पूर्ण राज्य को अचल कर दिया । इससे केञ्वल सरकार को तो नुकसान हुआ ही है, आमलोगों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है।

http://dinpratidin.blogspot.com/2007/11/blog-post_1422.html



Friday, November 23, 2007
नन्दीग्राम और मुसलमान


कोलकाता में दो दिन पहले हुए प्रदर्शन से कई लोगों की पेशानी पर चिंता की लकीर खिंच गई है। जिस तरह से वह प्रदर्शन होने दिया गया। पहले से पता होने के बाद सुरक्षा बलों का एहतियाती इंतजाम नहीं किया गया और उसके बाद सेना बुला ली गई... पहले सच्चर कमेटी और उसके बाद नन्दीग्राम ने पश्चिम बंगाल के मुसलमानों की बदतर हालत और सरकार का उनके प्रति नजरिया, उजागर कर दिया है। ऐसे में संगठित होते मुसलमान स‍रकार के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं... इसलिए नौजवान पत्रकार और www.twocircles.net के सम्पादक काशिफ उल हुदा की सलाह है कि भावनात्‍मक मुद्दों के बजाय मुसलमान अपने को सामाजिक आर्थिक मुद्दों की लड़ाई पर ही केन्द्रित रखें तो अच्‍छा है। ढाई आखर की गुजारिश पर उन्होंने हिन्दी में यह टिप्पणी भेजी है। हिन्दी में यह उनकी पहली औपचारिक टिप्पणी है।
मुसलामानों की तरक्की के लिए जरूरी है शांतिपूर्ण समाजी और सियासी तहरीक
काशिफ उल हुदा
1977 से वाम मोर्चा पश्विम बंगाम की सत्ता पर काबिज़ है. चुनाव के जरिये सत्‍ता में रहने वाली ये दुनिया की सबसे लंबी कम्युनिस्ट सरकार है. वाम मोर्चे के 30 साल तक सत्ता पर बरक़रार रखने का कुछ सेहरा पश्चिम बंगाल के मुसलामानों को भी जाता है. 1977 से हर चुनाव में राज्य के मुसलमान वाम मोर्चे को वोट देते आये हैं.

मुसलामानों एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित माहौल मिला. शायद उनके लिए काफी दिनों तक यही बहुत कुछ था। इसलिए उन्होंने तकरीबन 30 साल अपनी ज़िंदगी को बाद से बदतर होते देखा, लेकिन वाम मोर्चे का साथ नहीं छोड़ा. सच्‍चर कमेटी कि रिपोर्ट ने मुसलमानो के पढ़े-लिखे तबके को ज़ोर से झिंझोड़ा. मुसलमान जागे और तंजीमें हरकत में आयीं. सच्‍चर कमेटी ने जो बयान किया, उससे पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की बदतर हालत दुनिया के सामने आ गई. सिर्फ मुसलमान ही क्‍यों, दलितों की हालत भी वहां अच्‍छी नहीं.

खैर, पता ये चला कि मुसलमान यहां हर पायदान पर पिछड़े हैं. पश्चिम बंगाल में ही नहीं बल्कि भारत के दूसरे राज्यों में भी मीटिंग, धरना और कई पहल होने लगी ताकि मुसलमानों की बदतर हालत पर सरकारों का ध्‍यान जाए.पश्चिम बंगाल में कई संगठन पिछले चंद महीनों से काफी सक्रिय हुए. यही नहीं कई बार अपनी मांगें मनवाने के लिए सड़क पर भी उतरे. नंदीग्राम के हादसे ने इन्हें और झिंझोड़ दिया. जो सुरक्षा मिलने का दावा अब तक सरकार करती रही थी, उसकी भी गारंटी नंदीग्राम ने खत्‍म कर दी. अगर मुसलमानो का हाल एक वामपंथी-सेक्‍यूलर हुकूमत में ये हो सकता है तो फिर हिंदुत्व और सॉफ्ट-हिंदुत्व पार्टियों वाली सरकारों से क्या उम्मीद कि जा सकती है?

इन सब वजहों से ही मुस्लिम संगठनों ने मिल्ली इत्तेहाद परिषद बनाने का ऐलान किया और पिछले शुक्रवार को एक ज़बरदस्त शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जिसमें तकरीबन एक लाख लोग शामिल हुए. इस पर्दर्शन कि अगली कड़ी 24 नवम्‍बर को नंदीग्राम मार्च है. पश्चिम बंगाल और उसके बाहर के लोगों ने महसूस किया कि भारतीयों मुसलामानों के बीच एक मूवमेंट शुरू हो रहा है. ...और नंदीग्राम से उठा या मूवमेंट मुसलमानों के बेहतर सामाजिक और आर्थिक न्याय कि लड़ाई लड़ेगा. सियासत में मुसलमानों को सही मुकाम दिलवाएगा.ये मूवमेंट हिंदुस्तान के लिए भी अच्छा साबित होगा क्योंकि इस देश का सबसे पिछड़ा समाज अपने बलबूते पे खड़ा हो तो यही देश के लिए भी बेहतर है.

नन्‍दीग्राम एक समाजी और आर्थिक मुद्दा है. इससे तसलीमा के मुद्दे जो कि मुसलमानों कि नज़र में एक धार्मिक मुद्दा है, जोड़ना नहीं चाहिए था. ये ग़लती मुसलमान बार-बार करते आये हैं. एक भावानात्‍मक और सांकेतिक मुद्दे पर ज्यादा ज़ोर देते हैं और सरकार पर दबाव डालते हैं. एक बार फिर सरकार ने तसलीमा को बंगाल से बाहर करने की भावनात्‍मक मांग को मान लिया है... इस तरह मुसलमान तंजीमें अपनी जीत का ऐलान कर देंगी... लोग 'मुस्लिम तुष्टिकरण' का इल्जाम लगायेंगे. नंदीग्राम जो कि समाजी-आर्थिक मुद्दे के रूप में एक तहरीक की शक्ल ले रह था, दम तोड़ देगा.

मुसलमान तंजीम और लीडरों को बेहतर रणनीति बनाकर मुसलमानों को संगठित करना होगा और शांतिपूर्ण आंदोलन चलाना होगा. यही नहीं, जिंदगी के मसायल और उनसे जुड़े मुद्दों पर अन्य सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक संगठनों के साथ मिल कर काम करमा होगा. मुसलमान भारत कि आबादी के 15 % हैं और कोई भी देश एक बड़ी आबादी को पिछड़ा रख कर विकास नहीं कर सकता.http://dhaiakhar.blogspot.com/2007/11/blog-post_6182.html



सत्ता की खातिर राष्ट्रीयता का सत्यानाश
http://merichaupal.wordpress.com


क्या मुंबई में अब सिर्फ मराठी, कोलकाता में बंगाली, केरल में मलयाली, आंध्र प्रदेश में तेलगू, तमिलनाडु में तमिल, असम में असमिया, पंजाब, हरियाणा में पंजाबी व जाट और राजस्थान में मारवाड़ी या दूसरे राज्यों उसके बहुसंख्यक रहेंगे ? सत्ता के लिए देश का यह बंटवारा राजनीति की दुकान खोलकर बैठे जो लोग कर रहे हैं क्या उन्हें पता है कि अगर देश ही नहीं रहेगा तो वे खुद कैसे बंचेंगे। क्या देश की जातिवादी राजनीति कर रहे राजनेताओं को अपनी जाति का देश बनाना है ? बालठाकरे और राजठाकरे को देखकर तो ऐसा ही लगता है। सांप्रदायिक बयानों से राज ठाकरे को जो राजनैतिक फायदा मिलने वाला है उससे डरकर अब उनके चाचा बाल ठाकरे दो कदम आगे बढ़कर हिंदी भाषियों को गाली दे डाली। शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय में छिनाल औरतों की तरह बिहारियों को गरियाया है। अगर आप मराठी समझते हैं तो इस लिंक http://www.saamana.com/ पर जाकर उनके दुर्वचन पढ़ सकते हैं।
कुछ हिंदी पोर्टलो ने भी इसका सार छापा है। जो नीचे उनके लिंक के साथ दिया है। मराठी न जानने वाले इस हिंदी तर्जुमा को पढ़कर बाल ठाकरे का वह संपादकीय पढ़ सकते हैं जिस पर खुद ठाकरे को तो फक्र होगा मगर पूरे देश को ऐसे राजनीतिज्ञों पर शर्म आ रही है। जिस औकात की बात कर रहे हैं उस पर अगर देश का सारा हिदी भाषी उतर आए तो बाल ठाकरे को मुंबई में भी मुंह छिपाने की जगह नहीं मिलेगी। यह अलग बात है कि बेशर्म राजनीति कर रहे उनकी तरह के दूसरे दल और नेता ऐसे मौके पर ठाकरे के सहोदर भाई निकल आएँगे। राष्ट्रीय दलों का देश के पैमाने पर क्षेत्रीय दलों के सामने कमजोर पड़ना और बदले में की जा रही ओछी राजनीति ने देश को ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया हैं जहां राष्ट्रीय कानून के होते हुए भी राष्ट्रीयता की धज्जियां उड़ाई जा रही है। अब बालठाकरे जैसे राजनीति के घटिया उत्पाद को नहीं बल्कि मौजूदा दौर की राजनीति के उन दलालों को दोषी मानें जिन्होंने कभी यह सोचा ही नहीं कि हिंदुस्तान की एकता को चुनौती देने के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाने चाहिए जिससे ऐसे तत्व कभी सिर ही नहीं उठा सकें। आखिर इस देश में बार-बार दंगे होते हैं, कभी असम तो कभी पंजाब या दक्षिण भारतीय, पूर्वोत्तर राज्यों में राष्ट्रविरोधी गतिविधियां पनपती हैं मगर इसे रोकने की जगह बड़े या क्षेत्रीय दल सिर्फ राजनीतिक लाभ उठाने की संभावनाएं तलाशते नजर आते हैं।
मलेशिया जैसा देश भी आज भारत के सामने बढ़ी आर्थिक ताकत इस लिए है क्यों कि वहां किसी को राष्ट्रीय अस्मिता के साथ खिलवाड़ की छूट नहीं है। वहां ऐसे कानून हैं जो किसी को भी राष्ट्रविरोधी होने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर कर देते हैं। क्या भारत को ऐसे कानून पर विचार नहीं करना चाहिए। आखिर यहां भी तो ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि इन आंदेलनों ने देश के विकास को प्रभावित किया है।
पश्चिम बंगाल में कभी मारवाड़ियों पर टिप्पणी की जाती है तो असम से बंगालियों को खदेड़ा जाता है। बंगाल में हिंदी माध्यम से पढ़ रहे छात्रों को हिंदी में प्रश्नपत्र सिर्फ इस लिए नहीं दिए जाते हैं कि इससे बंगाली मानसिकता को सरकार भुनाती है। सुनील गंगोपाध्याय जैसे बांग्ला के प्रचंड विद्वान-साहित्यकार हिंदी भाषियों को सरेआम खदेड़ने की बात करते हैं। दक्षिण में हिंदी व हिंदी भाषियों का विरोध जगजाहिर है। पंजाब और असम में सरेआम हिंदी भाषी मजदूरों को वहां के जातीय संगठन मार डालते हैं। लोग भागने और दरबदर होने को मजबूर होते रहते हैं। महाराष्ट्र से बांग्लादेशी के नाम पर बंगालियों को खदेड़ा जाता है और उन पर अत्याचार किया जाता है। यानी किसी जिम्मेदार दल या राजनीतिज्ञ को और कितने उदाहरण चाहिए जिसके आधार राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर अंकुश के कारगर व कड़े नियम बना सके। क्या मानकर चला जाए कि एकछत्र भारत की अब किसी दल को जरूरत नहीं। शायद ऐसा ही लगता है। सभी राजनीतिक अवसरवादिता का रोटी सेंक रहे हैं। आखिर हो क्यों नहीं? यहीं क्षेत्रीय दल तो सरकारें चलवा रहे हैं और सत्ता के भागीदार हैं जो अपने राज्यों में राष्ट्रीयता की जगह क्षेत्रीयता के बल पर खड़े हैं।
एक अंधे मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है आज का क्षेत्रीय व सांप्रदायिक ताकत के आगे बेबश हो चुका भारत। हमारे जैसे नागरिक तो अब इस बात पर अफसोस करने लगे हैं कि इस भारत माता की रक्षा के लिए जो जवान सीमा पर अपना खून बहा रहे हैं उन्हें भी हम शर्मसार कर रहे हैं। इन राजनीतिज्ञों की तरह अगर वह जवान अपने बंगाल, पंजाब या हिंदी क्षेत्र के लड़ने लगे तो आप बेशर्म सत्ता के दलाल किस मुंह से रोकेंगे ? क्या जवाब देंगे ? मराठा जवान जिस देश भक्ति के लिए विख्यात है, उसे भी आप शर्मसार कर रहे हैं ठाकरेजी। गोबर और गोबर के कीड़े वे सभी हैं जो आप जैसी सोच रखते हैं।
रही आपके इन कारनामों के बाद मुंबई के भविष्य की बात तो यह मत भूलिए कि मुंबई अपनी बदौलत कुछ है। दुनिया के लिए बालीवुड को जाना पहचाना नाम आपने नहीं दिया है। यह पूरे भारतीय समाज की समग्र कोशिश का नतीजा है। मत भूलिए कि मुख्यधारा से कटकर आप जैसी क्षेत्रीय राजनीति करने वाले दलों ने कोलकाता जैसे संपन्न और खुशहाल शहर को खंडहर बना दिया है। आज वहां नए सिरे से संवारने की कोशिश की जा रही मगर संशय है कि क्षेत्रीय राजनीति का पिशाच फिर कोलकाता को उद्योग व सामाजिक समरसता का मान हासिल करने देगा। संभव है राज ठाकरे की तरह आप भी हिंदी भाषियों पर हमला करवाएं मगर लाख टके की बात भी सुन लीजिए—- क्या आप भी उजड़ी हुई मुंबई का सपना देख रहे हैं?


बाल ठाकरे के अक्षम्य अपराध के ताजा दस्तावेज
एक बिहारी, सौ बीमारी: बाल ठाकरे

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2838853.cms

महाराष्ट्र में क्षेत्रवाद को लेकर बयानबाजी का सिलसिला फिलहाल खत्म होता नहीं दिख रहा। पिछले दिनों महाराष्ट्र में क्षेत्रवाद और भाषावाद की कवायद शुरु की थी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने , अब शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे भी इसी मंत्र का जाप कर रहे हैं। ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र सामना में अपने संपादकीय में बिहार के सांसदों पर हमला बोला है और बिहार के लोगों के बारे में अपशब्द भी कहे हैं।

दरअसल बिहार के एम.पी. ने इस क्षेत्रवाद के विरोध में संसद में काफी हंगामा खड़ा किया , जिसपर बाल ठाकरे ने अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा , ‘ पूरे देश में बिहार के बारे में कैसा बोला जाता है , यह मैं बताता हूं। दरअसल बिहारियों का भेजा ही सड़ा हुआ है। ‘

उन्होंने कहा कि पूरे हिंदीभाषियों को बिहारियों की वजह से तकलीफ होती है। पिछले दिनों मुंबई में बिहारियों के खिलाफ हुई हिंसा के मामलों पर पर्दा डालते हुए उन्होंने कहा , ‘ यहां एक दो लोगों को मारा, तो न्यूज चैनलों ने बेवजह का शोर-शराबा किया। बिहारी तो जिस थाली में खाते हैं , उसी में थूकते हैं। ‘

संसद में हंगामा करने वाले सांसदों पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा , ‘ बुझी हुई आग को फिर से हवा देने की कोशिश कर रहे हैं ये बिहारी सांसद। ‘ ठाकरे ने यह भी कहा कि कुछ दिन पहले बिहारी सांस्कृतिक संगठनों ने लालू छाप नेताओं को पत्र भी लिखा था कि हमें मुंबई में कोई तकलीफ नहीं है और आप यहां शक्ति प्रदर्शन कर के हमारे मामले में टांग न अड़ाएं।

समय-समय पर हिंदुत्व का नारा बुलंद करने वाले बाल ठाकरे ने बिहारियों के विरोध में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने तो यहां तक कह डाला कि , ‘ बिहारी गोबर खाते हैं। आखिर वह गोबर के कीड़े हैं और गोबर में ही खुश रहेंगे। ‘

उन्होंने जेडीयू नेता प्रभुनाथ सिंह के उस बयान पर भी टिप्पणी की जिसमें उन्होंने कहा था कि हम गंगा के किनारे रहते हैं और इसलिए हमारी बोली भी मीठी है। ठाकरे ने इस पर कहा कि , ‘ हमें पता है कि बिहार में भ्रष्टाचार और रक्त की गंगा बहती है। राम तेरी गंगा मैली हो गई है। बिहार नरक पुरी है। वहां के राजनेता पशुओं का चारा भी खा जाते हैं। ‘

शिवसेना सुप्रीमो ने बिहारियों के खिलाफ अपनी बयानबाजी का बचाव भी किया है। उन्होंने कहा कि पंजाब में भी बिहारियों को पसंद नहीं किया जाता और उन्हें लेकर पंजाब में इन दिनों एक एसएमएस भी चला हुआ है कि बिहारी भगाओ , पंजाब बचाओ। संपादकीय में यह एसएमएस भी छपा है -

‘ एक बिहारी , सौ बीमारी
दो बिहारी , लड़ाई की तैयारी
तीन बिहारी , ट्रेन हमारी
पांच बिहारी , सरकार हमारी
चक दे फट्टे
बिहारी भगाओ , पंजाब बचाओ

बिहार के सांसद गोबर के कीड़े: ठाकरे

http://www.bhaskar.com/2008/03/05/0803051340_bal_thakery.html

मुम्बई. शिवसेना सुप्रिमो बाल ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र सामना में छपे संपादकीय में एक बार फिर क्षेत्रवाद की गंदी राजनीति का नमूना पेश किया है। बाल ठाकरे ने अपने लेख मे