भारतीय विदेश नीति को नेपाल में बदलाव की भनक तक नहीं लगी। राजतन्त्र को बचाने के मुहिम में हिन्दुत्व फेल। नारायणहिति राजप्रासाद पर अब काबिज है लोकशाही।नेपाल में 240 वर्ष पुरानी हिंदू राजशाही धराशायी होती नजर आ रही है। माओवादी यहां तकरीबन सौ सीटों पर या तो जीत चुके हैं या जीत की ओर अग्रसर हैं। देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली नेपाली कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को उन्होंने धूल चटा दी है।
पलाश विश्वास
नेपाल में राजतन्त्र के अवसान के साथ सशस्त्र क्रान्ति के जरिए सत्तादखल के रास्ते से हटकर चुनावी रास्ता अख्तयार करके माओवादियों ने इस महादेश की राजनीति में नया अध्याय लिख डाला है।नेपाल में संविधान सभा के गठन के लिए हुए चुनावों में बहुमत मिलने की संभावनाओं के बीच माओवादी नेता पुष्पकमल दहल यानी प्रचंड ने कहा है कि वह भारत और चीन के साथ मिलकर काम करेंगे।
भारत सरकार ने नतीजों पर अपनी टिप्पणी में कहा कि आपसी संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, बल्कि सहयोग बढ़ना चाहिए। चीन की समाचार एजेंसी 'सिनहुआ' ने बिना किसी टिप्पणी के बस नतीजों के रुझान और माधव कुमार नेपाल के इस्तीफे की खबर दी।
भारत के तीन राज्यों में ब्राह्यणवादी वर्चस्व और वोटबैंक समायोजन के साथ ससत्तारुढ़ वामपंथी मु्क में मुश्किल में। क्योंकि देशभर में नक्सलबाड़ी में वसन्त के वज्र निनाद के तीस साल बाद माओवाद का असर भारी है। आन्ध्र, ओड़ीशा, बिहार, बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र समेत अनेक राज्यों में जनता माओवाद को विकल्प बतौर सोचने लगी है। लोकतान्तरिक रास्ता अख्तियार करके नेपाली माओवादियों ने सत्ता से जुड़े कम्य्युनिस्टों का नेपाल में सफाया ही नहीं कर दिया , बल्कि भारतीय पाखण्डी कोमरेडों के होश भी उड़ा दिये हैं। इस चुनाव का ऐतिहासिक महत्व यह है कि 240 साल पुरानी राजशाही खत्म हो जाएगी। दिसंबर 2007 में अंतरिम संविधान में तीसरे संशोधन के जरिए राजशाही खत्म कर दी गई थी। लेकिन संविधान सभा की मुहर लगने के बाद ही यह फैसला औपचारिक रूप से लागू होगा। दूसरा सबसे बड़ा परिवर्तन यह होगा कि नेपाल में संघीय व्यवस्था लागू हो जाएगी। इसका फायदा करीब 48-50 फीसदी मधेसी जनता को मिलेगा। उन्हें संघीय व्यवस्था के तहत काफी हद तक स्वायत्तता मिल जाएगी।
बंगाल के नक्सलबाड़ी जिले में वसंत के वज्रनाद के चालीस साल होने जा रहे हैं। तब से इस धारा ने अनेक मोड़ लिये हैं और आज भी एक नये रूप में यह समग्र राजनीति को प्रभावित कर रहा है। बगल के देश नेपाल में माओवादियों का क्रूर दमन किया गया परंतु आखिर में वहां की राणाशाही ही पराजित हुई। अभी भी बिहार सहित देश के कई हिस्सों में नक्सलवादी राजनीति के आधार क्षेत्र बने हुए हैं। सरकार इसे विधि-व्यवस्था की बड़ी समस्या मानती है और इसे उग्रवाद बतला कर बलपूर्वक कुचलना चाहती है।विनोद मिश्र के नेतृत्व वाले लिबरेशन पर माओवाद का प्रभाव न के बराबर था, लेकिन यह गुट अब लगभग पूरी तरह प्रभावहीन हो गया है। माओवादी ताकतें ही ज्यादा प्रभावशाली हैं। माओ का प्रसिद्ध नारा था राजसत्ता बंदूक की नली से निकलती है।
प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल माओवादियों से बहुत पीछे चल रहे हैं। नेपाली कांग्रेस के कई शीर्ष नेताओं को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। इनमें कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष सुशील कोइराला और प्रधानमंत्री की पुत्री सुजाता कोइराला भी शामिल हैं। यूएमएल महासचिव माधव कुमार नेपाल भी काठमांडू सीट से हार गए हैं। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राजशाही समर्थक प्रत्याशी अपना खाता भी नहीं खोल पाए हैं जबकि राजतंत्र समाप्त करने की मांग कर रहे माओवादियों का राजधानी काठमांडू में जश्न जारी है। नेपाल में हुए संवैधानिक सभा के चुनाव के घोषित 73 परिणामों में से 43 अपने कब्जे में कर माओवादियों ने अपनी बढ़त जारी रखी है जबकि कई कद्दावर राजनीतिक नेता हार का मुंह देख चुके हैं। अभी तक आये नतीजों में सीपीएन-माओवादी को 43, सीपीएन-यूएमएल को 12, प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की नेपाली कांग्रेस को 10, मधेसी पीपुल्स राइट्स फोरम को पांच, नेपाल वर्कर्स एण्ड पीजेन्ट्स पार्टी को दो तथा तराई मधेसी डेमोक्रेटिक पार्टी को एक सीट मिली हैं। चुनाव में हारने वाली प्रमुख हस्तियों में सीपीएन-यूएमएल के महासचिव माधव कुमार नेपाल [काठमांडो निर्वाचन क्षेत्र], नेपाली कांग्रेस [एनसी] के कार्यवाहक अध्यक्ष सुशील कोइराला [बांके], वरिष्ठ एनसी नेता और प्रधानमंत्री कोइराला की बेटी सुजाता कोईराला [सुनसारी], पूर्व प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष सूर्य बहादुर थापा [धनकुटा] तथा सीपीएन-यूएमएल के वरिष्ठ नेता बामदेव गौतम [बारदिया] शामिल हैं। सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार की जीत के सिद्धांत के आधार पर 240 सीटों के चुनाव हुए। शनिवार रात तक 120 सीटों के रुझान मिले, जिनमें 61 माओवादी, 24 नेपाली कांग्रेस और 19 एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी जीत रहे हैं। 335 सीटों के लिए समानुपातिक प्रणाली के तहत चुनाव हुआ। 26 सदस्य मनोनीत किए जाने हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक मतगणना में कम से कम 2 हफ्ते लगेंगे। 335 सीटों के नतीजे घोषित करने में सबसे ज्यादा वक्त लगेगा, क्योंकि यह प्रक्रिया कुछ जटिल है। आयोग ने कहा कि समानुपातिक प्रणाली न होती, तब भी 3 दिन का समय लग जाता। हिंसा की आशंकाओं के बावजूद चुनाव कुल मिला कर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष रहा। 148 घरेलू संगठनों से जुड़े 63,000 पर्यवेक्षकों ने निगरानी रखी। 23 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से सम्बद्ध 856 पर्यवेक्षक नेपाल में डेरा डाले रहे। इनमें पूर्व अमेरिकी प्रेजिडेंट कार्टर भी थे।
काठमांडू से जीत हासिल करने के बाद प्रचंड ने एक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि चुनाव के बाद संविधान बनाने के लिए नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी न सिर्फ पुरानी पार्टियों बल्कि चुनाव के समय गठित की गई नई पार्टियों के साथ पूरी तरह मिलकर काम करेगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को आगे बढ़ाने की वकालत करते हुए उन्होंने कहा, 'हमारी पार्टी सभी देशों खासकर पड़ोसी देशों भारत और चीन के साथ करीबी सहयोग बढ़ाने की पक्षधर है जिससे कि विकास, आपसी सहयोग और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके।'
उधर, नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र वीर विक्रम शाह ने संविधान सभा के चुनावों में जनता की उत्साहजनक भागीदारी पर संतोष व्यक्त किया है। ज्ञानेंद्र ने कहा कि चुनावों में नेपाली जनता ने अपनी उत्साहजनक भागीदारी से स्पष्ट कर दिया है कि वह देश के अस्तित्व, स्वतंत्रता और अखंडता पर किसी भी सूरत में कोई समझौता नहीं करेगी।
सीपीएन-माओवादी के प्रमुख विजयी प्रत्याशियों में पार्टी अध्यक्ष पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड, पार्टी के दूसरे शीर्ष नेता बाबूराम भट्टाराई, वरिष्ठ नेता रामबहादुर थापा, पार्टी प्रवक्ता कृष्ण बहादुर महारा, केंद्रीय सदस्य देव गुरुंग, बर्षा मान पुन, हिसिला यामी और पम्भा भूषाल शामिल हैं। प्रचंड ने रोल्पा और काठमांडू दोनों ही सीटों पर जीत दर्ज की है। नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र के प्रबल समर्थक और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी-नेपाल के नेता कमल थापा चुनाव हार गए हैं। राजशाही समर्थक अन्य दल जैसे सूर्य बहादुर थापा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी और पशुपति शमशेर राणा की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है। नेपाल में तराई के इलाकों में अधिक स्वायत्तता की मांग करने वाला मधेशी जनाधिकार मंच कुछ सीटों पर विजय हासिल करने में कामयाब रहा है। तराई मधेशी लोकतांत्रिक पार्टी और सद्भावना पार्टी ने भी खाता खोल लिया है। मधेशी जनाधिकार मंच के अध्यक्ष उपेंद्र यादव जीत गए हैं। तराई क्षेत्र में बीते साल मधेशी समूहों के हिंसक प्रदर्शन में 150 से अधिक लोग मारे गए थे। करारी शिकस्त का सामना करने वाले प्रमुख नेताओं में यूएमएल के वरिष्ठ नेता बामदेव गौतम, के पी ओली और नेपाली कांग्रेस के नेता खम बहादुर खड़का शामिल हैं।
नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) संविधान सभा के चुनाव में भारी बढ़त लिए हुए है। सभी 601 सीटों के नतीजे आने में करीब 2 हफ्ते लगेंगे, लेकिन यह स्पष्ट है कि माओवादी सबसे बड़ी पार्टी होंगे। माओवादी नेता प्रचंड ने काठमांडू की एक सीट जीतने के बाद ऐलान किया कि मौजूदा 7 दलीय मोर्चा बना रहेगा और मिली-जुली सरकार का ही गठन होगा। दूसरे सबसे बड़े माओवादी नेता बाबूराम भट्टराई ने कहा कि उनकी पार्टी को बहुमत मिलने जा रहा है। लेकिन माओवादियों की शुरुआती जीत ने अभी तक नेपाल की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत, नेपाली कांग्रेस में डर पैदा कर दिया है। नेपाली कांग्रेस के महासचिव राम बरन यादव ने कहा कि हिंसा की संस्कृति खत्म करने की लोगों की इच्छा को झटका लग सकता है, जो चिंताजनक है। सरकार में शामिल तीसरी सबसे बड़ी पार्टी, नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के नेता माधव कुमार नेपाल ने पद छोड़ दिया है।
संविधान बनाने का काम आसान नहीं होगा। माओवादी अपनी जीत के बावजूद मनमानी नहीं कर पाएंगे। उन्हें बाकी दलों को अपने साथ रखना ही होगा। माओवादी जानते हैं कि सेना उनके साथ नहीं है। सेना का अधिकारी वर्ग रूढ़िवादी है और राजशाही से हमदर्दी रखता है। संविधान को अंतिम रूप देने के लिए 3 साल का समय रखा गया है, लेकिन पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे ज्यादा वक्त लगेगा। संविधान सभा की कार्यवाही के दौरान कोई भी पार्टी दाएं-बाएं नहीं जाना चाहेगी।
नेपाल के मजदूर, किसान व आम जन माओवाद के पक्ष में हैं। पोखरा स्थित पंचतारा होटल के कर्मचारी राजू नेगारी ने बताया कि यहां के मजदूर, किसान व आम लोगों का कहना है कि नेपाल लम्बे समय तक राजशाही के अधीन रहा। राजशाही के बाद यहां के प्रमुख राजनीतिक दल नेपाल कांग्रेस समेत अन्य दलों ने भी लम्बे समय तक शासन किया, लेकिन इस दौरान न तो राजशाही व न ही नेपाल कांग्रेस ने नेपाल के आम लोगों की तकलीफों को समझा और उन्हें दूर करने का प्रयास किया।
मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने कहा कि उत्तराखंड पुलिस के सामने आतंकवाद, माओवाद, संगठित अपराध और साइबर क्राइम जैसी कई जटिल चुनौतियां हैं। इनसे निपटने के लिए पुलिस की कार्यप्रणाली, प्रशिक्षण और मनोबल में सुधार लाना निहायत जरूरी है। पुलिस के नए निशान अलंकरण की रैतिक परेड के मौके पर आयोजित एक समारोह में श्री खंडूड़ी ने कहा कि उत्तराखंड पुलिस के इतिहास में यह महत्वपूर्ण दिन है। वामपंथियों की अराजकता के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आज से प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करेगा। केरल के कन्नूर जिले में वामपंथियों द्वारा संघ के कार्यकर्ताओं पर लगातार हमले से संघ चिंतित है। इस बाबत सर कार्यवाह मोहन राव भागवत ने संघ के सदस्यों को वामपंथियों की इस अराजकता के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन करने को कहा है।
छत्तीसगढ राज्य शासन द्वारा माओवाद प्रभावित बस्तर अंचल के सभी पांच राजस्व जिलों में दस नये पुलिस थाने खोले जाने, सरगुजा जिले के मुख्यालय अम्बिकापुर में महिला पुलिस थाने की स्वीकृति और 715 नये पदों की भी स्वीकृति दी है।
इन सभी ग्यारह नये पुलिस थानों के लिए राय शासन द्वारा चालू वर्ष 2007-08 के प्रथम अनुपूरक बजट में 715 नये पदों की भी स्वीकृति दी गयी है। इनमें ग्यारह निरीक्षकों, बाईस उप-निरीक्षकों और 44 सहायक उप निरीक्षकों समेत 110 प्रधान आरक्षकों और 528 आरक्षकों के पद शामिल हैं।
बस्तर अंचल में नये पुलिस थाने-ग्राम धौड़ाई, फरसगांव, ओरछा और धनोरा जिला-नारायणपुर, मोदकपाल और तायनार ,जिला-बीजापुर, पोलमपल्ली और अरनपुर जिला-दक्षिण बस्तर, बड़ांजी (जिला-बस्तर) और ग्राम ताड़ोकी जिला-उत्तर बस्तर में खोले जाएंगे। इन पुलिस थानों के लिए दो करोड़ 45 लाख रूपए की अनुमानित लागत से भवन निर्माण भी किया जाएगा। अनुपूरक बजट में इसके लिए तात्कालिक रूप से एक करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है।
माओवाद, हिंसा की राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के सवाल
http://janvikalp.blogspot.com/2007/12/blog-post_5439.html
संपादकीय
बंगाल के नक्सलबाड़ी जिले में वसंत के वज्रनाद के चालीस साल होने जा रहे हैं। तब से इस धारा ने अनेक मोड़ लिये हैं और आज भी एक नये रूप में यह समग्र राजनीति को प्रभावित कर रहा है। बगल के देश नेपाल में माओवादियों का क्रूर दमन किया गया परंतु आखिर में वहां की राणाशाही ही पराजित हुई। अभी भी बिहार सहित देश के कई हिस्सों में नक्सलवादी राजनीति के आधार क्षेत्र बने हुए हैं। सरकार इसे विधि-व्यवस्था की बड़ी समस्या मानती है और इसे उग्रवाद बतला कर बलपूर्वक कुचलना चाहती है।
नक्सलवाद मार्क्सवाद की वह पाठशाला है जहां मार्क्स और लेनिन के अलावे माओ के विचारों का प्रभाव है। इससे जुड़े राजनैतिक कार्यकर्त्ता तो माओवाद को ही सब कुछ मानते हैं। विनोद मिश्र के नेतृत्व वाले लिबरेशन पर माओवाद का प्रभाव न के बराबर था, लेकिन यह गुट अब लगभग पूरी तरह प्रभावहीन हो गया है। माओवादी ताकतें ही ज्यादा प्रभावशाली हैं। माओ का प्रसिद्ध नारा था राजसत्ता बंदूक की नली से निकलती है।
माओ च तुंग (२६,दिसंबर १८९३-९,सितंबर १९७६) के करिश्माई व्यक्तित्व से मैं आज भी प्रभावित हूं। जिन लोगों ने एडगर स्नो की किताब 'रेड स्टार ओवर चाइना` पढ़ी है, वे उसके व्यक्तित्व के प्रति उदासीन नहीं रह सकते। चुडण् वनश्येन द्वारा लिखित माओ के जीवन चरित से मैं जब गुजर रहा था तब एक जगह आकर ठहर गया। चुड. वनश्येन ने समापन के पहले लिखा है-'माओ चतुड. ने अपनी जीवनसंध्या में अनेक गलतियां कीं, लेकिन चीनी क्रांति के लिए उन्होंने जो अमिट महान योगदान किए, उनके लिए चीनी जनता माओ चतुंड. का अब भी हृदय से सम्मान करती है और उनको दिल से याद करती है।` वनश्येन का यह जीवन चरित किसी अमेरिकी प्रकाशन गृह ने नहीं, चीन के सरकारी प्रकाशन गृह ने प्रकाशित किया है। इसलिए इसे पढ़कर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ कि क्यों माओ को आज अपने ही देश में भुला दिया गया है। उनकी स्थिति चीन में लगभग वैसी ही है जैसी अपने देश में गांधी की। वे आदरणीय हैं, अनुकरणीय नहीं। यही कारण है कि चीन माओ के चित्र और सितारेदार लाल झंडे के नेतृत्व में अमेरिकी पूंजीवाद को टक्कर दे रहा है। चीन ने 'समाजवादी` छतरी के नीचे अपना ही पूंजीवाद विकसित किया है। लेकिन माओ और गांधी की इज्जत बनी रहेगी, रहनी चाहिए। माओ की मुश्किलें गांधी से कहीं ज्यादा इसलिए थीं कि उन्होंने आरंभ से ही मार्क्सवादी विज्ञान का सहारा लिया। गांधी की तरह रामनामी ओढ़ कर उनका काम आसान हो सकता था। माओ का राष्ट्रीय आंदोलन साम्राज्यवाद के उतना खिलाफ नहीं था, जितना गांधी का आंदोलन। इसलिए माओ ने गरीब-गुरबों, किसानों और मजदूरों को इकट्ठा किया। गांधी की तरह वह बुर्जुआ तबके के उदार नेता नहीं, बल्कि पिछड़े किसानों के क्रांतिकारी नेता थे। गांधी की तरह वह पंचमेल की राजनीति नहीं कर रहे थे, जहां परस्पर विरोधी विचार शक्तियाने और व्यक्तियों का जमावड़ा हो। शायद यही कारण था कि गांधी की अपेक्षा उनके अंतरविरोध कम थे।
माओ ने साठ के दशक में सांस्कृतिक क्रांति का नेतृत्व किया था। संस्कृति को शायद वह अविच्छिन्न प्रवाह नहीं समझते थे। चीन में बौद्ध मत प्रभावशाली है और लगभग अस्सी फीसदी चीनियों का संस्कार बौद्ध है। बुद्ध मत का मूल प्रतीत्यसमुत्पाद है जो जीवन और जगत के अविच्छिन्न प्रवाह को मानता है,यह परिवर्तनवाद है। माओ ने संस्कृति में क्रांति करनी चाही-आमूल परिवर्तन। पुराने का संपूर्ण निषेध और बिल्कुल नये की स्थापना। माओ इसमें विफल हुए, बदनाम भी। तब से वे लगातार अप्रासंगिक होते गये, अपने ही समाज और देश में।
लेकिन उनकी जो छवि बीसवीं सदी के तीस, चालीस और पचास के दशक में थी, वह हमारे देश के कुछ समर्पित और ईमानदार युवा मित्रों को प्रभावित कर रहा है। और इसका कारण शायद यह है कि हमारे देश के देहाती इलाकों में आज भी स्थिति वैसी ही है जैसी बीसवीं सदी के मध्य में चीन के देहाती इलाकों की थी।
हममें से हर कोई यह स्वीकारेगा कि देश की मुख्यधारा में गांव के लोग नहीं आये हैं। गांव और शहर की दूरी बढ़ रही है। भूमि सुधारों और हरित क्रांति के अभाव ने गांवों को गलीज बना दिया है। कृषि पर इतना जन भार उठाने की क्षमता नहीं है। चालीस प्रतिशत अतिरिक्त आबादी का बोझ यह सेक्टर उठाये हुए है। सामंतवाद-ब्राह्मणवाद का खाज अलग से है।
ऐसे में यह समझाना मुश्किल है कि हिंसा समस्या का समाधान नहीं है। संसदीय राजनीति में जो लक्षण उभरे हैं वे इतने गैर जिम्मेदार हैं कि इससे गांवों में रह रहे निष्ठावान नौजवानों को बस कोफ्त होती है। शासक दल एक तरफ सवर्ण गंुडों व चापलूसों को राजनीतिक ओहदों का तगमा पहना कर लाल बत्ती वाली गाड़ियों पर घुमायेगा और दूसरी तरफ इज्जत व रोटी की लड़ाई लड़ने वाले नौजवानों को यातनायें देगा, तो आक्रोश फूटेगा ही।
पिछले दिनों मैं गया के पास एक गांव में था तो ग्रामीणों ने मिलकर बतलाया कि जब पुलिस को हम गरीबों को सताना होता है तब हम पर माओवादी होने का आरोप लगाती है। जिन पुस्तकों, परचों और असलहों को हमलोगों ने कभी नहीं देखा, उन्हें हमारे घर से बरामद बता कर हमारे घर के नौजवानों को सीखचों के भीतर करती है। हमारी बहू-बेटियों के साथ अभद्र व्यवहार और कभी-कभी बलात्कार तक करती है। हम जब इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं तब नक्सलवादी-माओवादी बतला कर हम पर गोली बरसाती है। सरकारी और सामंती हिंसा का मुकाबला हम कैसे करें, यह उनका आखिरी सवाल होता है। थोड़ी आत्मीयता दिखलाने पर वे और खुलते हैं। निर्गुण की जगह सगुण भाषा में बतियाने लगते हैं। उनका कहना होता है कि वे पिछड़ी व दलित जातियों से आते हैं, जबकि पुलिस और उसके अधिकारी ज्यादातर ऊंची जातियों से ताल्लुक रखते हैं।
अन्य राज्यों की पुलिस को मैं उतना नहीं जानता, लेकिन बिहार पुलिस पर सवर्ण वर्चस्व बहुत साफ दिखता है। विधि-व्यवस्था को ठीक करने के नाम पर हर बार कुछ पिछडे-दलित नौजवानों की बलि दी जाती है। अपराधी कोई खास जाति समूह में ही नहीं होते, लगभग हर में होते हैं, लेकिन बिहार के जेलों का सर्वेक्षण करके कोई देख ले, वहां पिछड़ी दलित जातियों के कैदी नब्बे फीसदी मिलेंगे। इसका कारण यह नहीं है कि वे अपराध ही इस मात्रा में करते हैं। दरअसल वे जटिल और खर्चीली न्यायिक व्यवस्था के चक्रव्यूह से बाहर नहीं आते। ऊंची जातियों के लोग जिन मामलों में आसानी से अग्रिम जमानत पा जाते हैं, उन्हीं मामलों में पिछड़ी जातियों के लोग बरसों की 'सजा` भुगतते हैं।
पिछले महीने बिहार पुलिस की बांछें अचानक खिल गयीं। उसने माओवादी नेता अजय को गिरफ्तार कर लिया। अजय पर १३ नवंबर २००५ के जेल ब्रेक का भी आरोप है। इस प्रकरण में पुलिस का सवर्णवादी रूख इतना साफ आया, लेकिन मीडिया ने भी इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। पुलिस ने अजय का नाम बतलाया अजय कानू। मीडिया ने भी इसे ही प्रकाशित किया। 'कानू` बिहारी समाज की एक अति पिछड़ी जाति है जिससे अजय आते होंगे। निश्चित रूप से उनका यह सरनेम नहीं होगा। उनके नाम के साथ जुड़ा होगा कुमार या प्रसाद। लेकिन पुलिस को दिखाना होता है उसकी जाति-कि देखो ये नीच-पतित लोग क्या-क्या करते रहते हैं। बिहार पुलिस तथाकथित निम्नजाति के अपराधियों के नाम के साथ उनका जातिनाम जोड़ना कभी नहीं भूलती, लेकिन ऐसा ही ऊंची जाति के अपराधियों के साथ नहीं करती। मीडिया भी उसका अनुसरण करता है।
अजय (कानू) मामले में मैंने एक बड़े अधिकारी से जब पूछा कि उस पर मामला क्या है कि उसे इतनी कठोर यातना दी जा रही है तब उसने बतलाया कि अन्य अपराधों के साथ उस पर जेल ब्रेक का अपराध है। मेरे यह कहने पर कि वही अपराध न जिसे जयप्रकाश नारायण ने ८ नवंबर १९४२ को किया था, वह अधिकारी बगलें झांकने लगा। यह हमारे व्यक्तित्व का एक अजीब विरोधाभास है जिस पर हम गौर नहीं करना चाहते। हम नारों, आप्तवाक्यों और सुभाषितों में जिस तरह खुद को व्यक्त करते हैं, उस तरह बनना नहीं चाहते। वर्तमान बिहार के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों जयप्रकाश आंदोलन की राजनीतिक कोख से निकले हैं। इस आंदोलन का एक प्रभावशाली नारा था- 'जेल का फाटक टूटेगा, भाई हमारा छूटेगा`। जैसा कि मैंने ऊपर बतलाया कि जे.पी के जीवन का भी सबसे बहादुर कारनामा जेल से भागना ही था। जे.पी या भगत सिंह की राजनीति थी, तो अजय की भी राजनीति है। एक सभ्य समाज के नागरिक के नाते हम इस विषय पर विवेक और संवेदना के साथ विचार क्यों नहीं करते?
तथाकथित माओवादी उग्रवाद का इलाज पुलिसिया दमन से होता है तो हम इसका विरोध करना चाहेंगे। माओवादियों की हिंसा का हम समर्थन नहीं करते, लेकिन वे दलित-पिछड़े तबकों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसे हम जानते हैं। भगत सिंह का लाला लाजपत राय की राजनीति से मतलब नहीं था। लाजपत राय हिन्दू सभायी थे, लेकिन उन्होंने लाठियां देश की खातिर खायी थीं, इसलिए उनकी बर्बर पिटायी से भगत सिंह इतने मर्माहत हुए कि उन्होंने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सैण्डर्स की हत्या का फैसला किया। अजय सहित तमाम माओवादी मित्रों को हम इस आशा के साथ सलाम करते हैं कि वे सामाजिक परिवर्तन के लिए हिंसा की राजनीति का परित्याग करेंगे।
प्रेमकुमार मणि
Labels: मार्च 2007
कैबिनेट सचिव ने माओवाद से निपटने
की रणनीति की समीक्षा की
http://samachar.boloji.com/200709/09515.htm
नयी दिल्ली, 24 सितम्बर
कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर, जिन्होंने पिछले सप्ताह झारखंड में माओवाद से निपटने की रणनीति की दो दिनों तक समीक्षा की, वे माओवाद से पूरी तरह प्रभावित दो अन्य राज्यों छत्तीसगढ़, उड़ीसा का शीघ्र दौरा कर एक व्यापक रिपोर्ट देंगे।
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि चंद्रशेखर को माओवाद की समस्या के बारे में विस्तृत जानकारी दी गयी है और वे माओवाद से निपटने के लिए जरूरी रणनीति के बारे में विचार करेंगे। इसमें पुलिस व्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ-साथ सामाजिक आर्थिक कदम उठाने की भी बात कही गयी है, ताकि माओवादियों को मिलने वाले समर्थन को खत्म किया जा सके। यह पहला मौका है जब सबसे वरिष्ठ अधिकारी राज्य प्रशासन के अधिकारियों से इस मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं। कैबिनेट सचिव राज्य प्रशासन द्वारा माओवाद से निपटने के लिए उठाए जा रहे कदमों और इसमें संभावित परिवर्तनों के बारे में विचार करेंगे, जिससे माओवादियों के खिलाफ चल रही लड़ाई को और प्रभावी बनाया जा सके। गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चंद्रशेखर ने अपनी समीक्षा में माओवाद प्रभावित इलाकों में युवा अधिकारियों की कमी और पुलिस आधुनिकीकरण में कोताही पर चिंता व्यक्त की है।
चंद्रशेखर के साथ गृह विभाग में विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा) और अतिरिक्त सचिव (नक्सल क्षेत्र) विनय कुमार ने समीक्षा में भाग लिया। झारखंड के पुलिस महानिदेशक वी.डी. राम ने पहले ही अनुभवी वरिष्ठ अधिकारियों की कमी के बारे में शिकायत की थी। झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा माओवाद से बुरी तरह प्रभावित राज्य हैं।
माओवाद से कैसे बने संवाद?
http://left-liberal.blogspot.com/2007/10/blog-post_16.html
सत्येंद्र रंजन
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सत्रहवीं राष्ट्रीय कांग्रेस में एक एजेंडा देश को फिर से माओवादी विचारों के रास्ते पर ले जाने का भी है। पार्टी महासचिव और राष्ट्रपति हू जिन ताओ ने पिछले पांच साल में इस दिशा में कई पहल की है। उनकी कोशिश अपने उत्तराधिकारी के रूप में उन नेताओं को सामने लाने की रही है, जो पार्टी में सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़े हैं और जो विषमता के शिकार तबकों औऱ इलाकों की नुमाइंदगी करते हैं। दरअसल, हू की कोशिश पार्टी और सरकार में आर्थिक विकास और समानता के उद्देश्य के बीच संतुलन बनाने की रही है। माओवादी दौर में समानता का मूल्य और मकसद सर्वोपरि था। इसके लिए उस दौर में जो प्रयास किए गए, उसे जोर-जबर्दस्ती बता कर पूंजीवादी मीडिया में उसकी कड़ी निंदा की जाती रही है। लेकिन हकीकत यही है कि चीन में उस विकास और समृद्धि की बुनियाद उसी दौर में पड़ी, जिस पर आगे चल कर देंग शियाओ फिंग के विचारों के मुताबिक आर्थिक सुधार लागू किए गए। देंग का प्रभाव भी आज चीन पर उतना ही अमिट लगता है, जितना माओ का रहा।
लेकिन देंग के प्रभाव में और जियांग जेमिन के दौर में लागू किए सुधारों से आई समृद्धि की कीमत देश को बढ़ती गैर-बराबरी के रूप में चुकानी पड़ी। हू जिन ताओ ने अपने पांच साल के कार्यकाल में इन दोनों पलड़ों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। बहरहाल, नव-जनवादी क्रांति के बाद से चीन की यात्रा ने यह जरूर साफ किया है कि अगर ठोस हकीकत को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनाई जाए तो परिवर्तन, प्रगति और विकास की वह राह जरूर ढूंढी जा सकती है, जो हर प्रगतिशील क्रांति का उद्देश्य रही है। एक सुखी मानव समाज बनाने के लिए समानता और समृद्धि दोनों जरूरी हैं। क्रांतिकारी शक्तियों के सामने चुनौती इन दोनों को हासिल करने की रणनीति बनाने की है और इस दिशा में चीन के कम्युनिस्ट नेताओं ने अपना खास योगदान दिया है।
चीन का यह अनुभव भारत में परिवर्तन और प्रगति से वास्ता रखने वाले हर समूह के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है। खास उन शक्तियों के लिए जो खुद को माओवादी मानती हैं और जिनका असर आज देश के एक बड़े हिस्से में फैल गया है। यह सच है कि जो भी ताकतें जमीन पर चाहे जिस तरह का संघर्ष कर रही हों, उन्हें बाहर से सलाह की जरूरत नहीं होती। ये ताकतें अपनी समझ, स्थितियों के अपने विश्लेषण और अपनी शक्ति के मूल्यांकन के आधार पर संघर्ष करती हैं। ऐसे में किसी बाहरी टिप्पणी को खारिज कर देने का रुझान अगर उनमें हो, तो उसे स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन जब किसी संगठन का मकसद नई व्यवस्था बनाना हो, तो यह उसके लिए भी जरूरी होता है कि वह लोकतांत्रिक विमर्श और संवाद में शामिल हो।
भारतीय माओवादियों के सामने अपने पड़ोस के दो अनुभव हैं। पहला अनुभव जाहिर तौर पर चीन का है, जहां माओवादी व्यवस्था अब विकासक्रम के एक नए चरण में है। दूसरा अनुभव नेपाल का है, जहां के माओवादियों ने व्यापक मोर्चा बनाकर साथ-साथ संघर्ष एवं सहयोग की रणनीति पर व्यावहारिक ढंग से अमल किया है और तमाम मुश्किलों के बीच देश को विकास के नए स्तर पहुंचाने की कोशिशों में भागीदार बने हैं। इन दोनों अनुभवों या वहां हुए मौजूदा सभी प्रयोगों को संशोधनवादी या भटकाव कह कर खारिज देना संभवतः एक सुविधाजनक राजनीतिक रुख हो सकता है, लेकिन ऐसा सीखने और अपने नजरिए को बड़ा बनाने के लिए उपलब्ध सबक को खो देने की कीमत पर ही किया जा सकता है।
भारत में न्याय की लड़ाई से जुड़े सभी लोगों के लिए इस सबक की खास अहमियत है। ऐसे सभी लोगों के लिए यह भी अहम है कि वे भारत में जारी माओवादी संघर्ष को उसके संपूर्ण संदर्भ में देखें। संभवतः यह माओवादियों के लिए भी जरूरी है कि बड़े परिप्रेक्ष्य को अपनी विचार प्रक्रिया में शामिल करें। बहरहाल, सबसे पहला सवाल यही है कि भारत में आखिर माओवादियों की क्या प्रासंगिकता है और आखिर उनकी ताकत का स्रोत कहा हैं? इस सवाल को समझने के लिए हमें अपनी राज्य-व्यवस्था के स्वरूप और लोकतांत्रिक प्रयोगों की सीमाओं या उनके रास्ते में आड़े आ रही रुकावटों पर गौर करना होगा।
माओवादी निसंदेह राजनीति में चरमपंथी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
चरमपंथी सोच में यह अंतर्निहित है कि अपनी समझ के अलावा बाकी सभी समझ को सिरे से नकार दिया जाए। बल्कि न सिर्फ दूसरों की समझ को गलत माना जाए, बल्कि उनके इरादे पर भी शक किया जाए या फिर माना जाए कि उनकी असहमति के पीछे दरअसल वर्ग दृष्टि का फर्क है। यह सोच अपने मकसद और कार्यों के लिए गहरी निष्ठा पैदा करती है और अपने उद्देश्य के लिए जूझने का हौसला भरती है। लेकिन इसकी सीमा यह है कि समाज और अर्थव्यवस्था की वस्तुस्थिति और राजनीति के असली स्वरूप की यथार्थ समझ यह नहीं बनने देती। आम इंसान कैसे व्यवहार करता है, उसके बुनियादी रुझान कैसे होते हैं और ये किस बात से प्रभावित या प्रेरित होते हैं, इसकी बिना सही समझ बनाए सामाजिक विश्लेषण की कोशिश एक मनोगत जड़ता पैदा करती है। कुल मिलाकर हालत यह बनती है कि इस सोच से चलने वाला संगठन या व्यक्ति दुनिया जैसी है, उसे उसी रूप में देखने के बजाय वह जैसा सोचता है, उसे उस रूप में देखने लगता है।
इसके बावजूद अगर चरमपंथी राजनीतिक विचारधारा को आज देश में ज्यादा समर्थन मिल रहा है तो इसकी ठोस वजहें हैं। सीधे तौर पर इसके पीछे दो वजहें तलाशी जा सकती हैं। इनमें पहली वजह है, देश के एक बड़े तबके में मौजूदा व्यवस्था के भीतर न्याय की उम्मीद लगातार कम होते जाना। अगर आजादी के साठ साल बाद भी भूमि सुधारों पर अमल नहीं हुआ है या आदिवासियों को जंगल और जमीन पर बुनियादी हक नहीं मिले तो आखिर भूमिहीनों और आदिवासियों में इस व्यवस्था से इंसाफ की उम्मीद क्यों होनी चाहिए? इससे जुड़ी एक दूसरी वजह है, जो पहले से ही मौजूद शिकायत को और गहरा बना रही है। शासक और अभिजात्य समूहों में लोकतंत्र की प्रक्रिया को बाधित करने और कई तरीकों से इसे पलटने की कोशिशों से देश के व्यापक जन समुदाय में नाराजगी बढ़ती जा रही है। न्यायपालिका और कई संवैधानिक संस्थाएं जिस तरह अभिजात्य समूहों के हित और उनके नजरिए को लागू करने में संवैधानिक लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों की अवहेलना कर रही हैं, उससे शासन की मौजूदा व्यवस्था में वंचित तबकों का भरोसा और कमजोर हो रहा है। अगर नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों, रूढिवादी सामाजिक नजरिए और संस्थागत गैर बराबरी को आगे बढ़ाने में संवैधानिक संस्थाएं शामिल नज़र आएंगी तो सदियों से वंचित लेकिन अब जागरूक हो रहे समूहों में व्यवस्था के प्रति विद्रोह की भावना निश्चित रूप से ज्यादा भड़कती जाएगी। कहा जा सकता है कि शासक समूह भी एक तरह के चरमपंथ का सहारा ले रहे हैं, जिससे माओवादी चरमपंथ को तर्क, समर्थक और कार्यकर्ता मिल रहे हैं।
परिणाम यह है कि देश के बड़े हिस्से में आज माओवादी एक बड़ी ताकत बन गए हैं और वे वहां के जन जीवन को अपनी ताकत और मंशा से संचालित करने की हैसियत में पहुंच गए हैं। अब तक के अनुभव से यह साफ है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास इस चरमपंथी राजनीतिक चुनौती से निपटने का कोई असरदार रास्ता नहीं है। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की मजबूती और चुस्ती के साथ-साथ अब विकास और लोगों की शिकायतें दूर करने की बातें भी सरकारी बयानों का हिस्सा बन गई हैं। लेकिन ये सारी बातें खोखली हैं, इसे जानने के लिए किसी गंभीर अध्ययन की जरूरत नहीं है। विकास और लोगों की शिकायतें दूर करने की सरकारों के पास कोई रणनीति नहीं है और ऐसे में सारा जोर सुरक्षा बलों की तैनाती पर आकर खत्म हो जाता है। लेकिन जिस चरमपंथी आंदोलन के पीछे एक राजनीतिक विचारधारा और उद्देश्य हो, उसे इस तरीके से खत्म नहीं किया जा सकता, इस बात की मिसाल १९६७ से आज तक के नक्सलवादी आंदोलन का इतिहास ही है। इस परिस्थिति में यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि माओवादी लंबे समय तक भारतीय राज्य के लिए एक चुनौती बने रहेंगे। बल्कि देश के एक बड़े हिस्से में उनकी तूती बोलती रहेगी।
लेकिन माओवादियों के सामने भी कुछ यक्षप्रश्न हैं। आखिर माओवादियों का क्या उद्देश्य है? जाहिर है, चूंकि वे माओवादी हैं, इसलिए उनका घोषित लक्ष्य राज्य सत्ता पर कब्जा करना है। इसके लिए उनकी रणनीति गांव
