यह महादेश अब एक अनन्त शवगृह है। शीत ताप नियन्त्रित। कहीं जान नहीं है। जिन्दगी की कोई हरकत बाकी नहीं है। कहीं नहीं है, कहीं नहीं है लहू का सुराग। कातिल का नामोनिशान।
पलाश विश्वास
आपने देश की स्वतन्त्रता, सम्प्रभुता, लोकतन्त्र को दांव पर लगाकर नवउदारवादी नई विश्व व्यवस्था के नाम पर देश की अर्थ व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। जीवन और आजीविका के नैसर्गिक संसाधनों से लैस कृषि की हत्या कर दी। प्राकृतिक संसाधनों को अमेरिकी श्वेत यहूदी आकाओं के हवाल करते हुए देशभर में मूलनिवासी अछूतों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के कत्लेआम का बंदोबस्त चाकचौबन्द कर दिया। मलाईदार तबके के ग्लोबल सत्तावर्ग के साझेदार और पराजीवी नौकरशाहों, काले कारोबारियों, बिल्डरों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, बाहुबलियों और माफिया से गढजोड़ करके रंग बिरंगे झण्डों और विचारधाराओं के तहत खले बाजार से श्रमजीवी आम जनता को बेदखल कर दिया। आजीविका और जीवन से विस्थापन का कारोबार शुरूकिया। गली गली में नीली क्रान्ति के दरवाजे खोल दिये। कम्प्यूटर, टीवी, मीडिया के जरिए जनता को अफीम का आदी बनाकर प्रतिरोध की सारी दीवारें ध्वस्त कर दी। नई पीढ़ी को शिक्षा और रोजगार के अवसरों से वंचित करते हुए लाचार अपाहिज बना दिया। बार, रेस्तरां, साइबर रियेलिटी, शापिंग माल, अटो मोबाइल, शराब, फैशन, क्रिकेट कार्निवाल, फैशन, ब्राण्ड, स्टाइल और भोग के जरिये सम्भोग से समाधि का राजमार्ग तैयार कर दिये महानगरों से राजपथ तक।
हम ऐसे शव गृह में हैं , जहां कबन्धों का राज है। जीवित हैं महज जैविक मशीनें। यहां न कोई उत्पादन है, न उत्पादन प्रणाली। बाकी जो कुछ बचा मंहगाई मार गयी।
लोक लुभावन चुनावी बजट से मंहगाई पर अंकुश नहीं लगना था। नहीं लागा।
आसमान छूने लगी मंहगाई।
अर्थ व्यवस्था को अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील कर देने का नतीजा यह निकला कि शाइनिंग इण्डिय. सुपर पावर हिन्दू राष्ट्र का इकलौता पैमाना शयर सूचकांक चारों खाने चित्त हो गया। महाविनाश के मारण उद्योग पर आधारित अमेरिकी यहूदी नियन्त्रित श्वेत अर्थव्यवस्था को उत्तर आधुनिक आकाश गंगा मनुस्मृति रंगभेदी साम्राज्यवाद को लागू करने के एकमात्र उपाय बतौर अपनाकर भारतीय सवर्ण सत्तावर्ग हजारों साल से जारी अस्पृश्यता तन्त्र को जारी रखना चाहती है हर कीमत पर। कदम कदम पर संविधान की हत्या होती है। लोकतन्त्र, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, मानवता, मूल्यबोध,मातृभाषा, राष्ट्रीयता, समाज ,संस्कृति सबपर हावी हो गया बाजार, जिसमे प्रवेश के लिए आम आदमी की क्रयशक्ति भी उससे छीन ली गयी है।
भारत विभाजन के जरिये विभाजन पीड़ित विस्थापित करोड़ों मूलनिवासियों के बलिदान की कीमत पर अर्जित स्वतन्त्रता अब बरतानिया हुकूमत और उससे भी पहले मुगलिया सल्तनत की चाकरी बजाते सामन्तों की जागीर बन गयी है। कोलकाता, पूना, मिथिला और कान्यकूब्ज के ब्राह्मण वर्चस्व में कोई कमी न हो , इसका इन्तजाम वाम, दक्षिण विचारधाराओं के साथ कांग्रेस, गैरकांग्रेस पार्टियों , गांधीवाद, लोहियावाद, समाजवाद इत्यादि फर्जीवाड़े और व्यक्ति करिश्मा और हितों, महत्वाकांक्षाओं से जुड़ी बहुमत आधारित संयुक्त चुनाव प्रणाली के जरिये कर दी गयी। जिससे दलाल तबके को खुला खेलने की छूट मिल गयी।
राष्ट्र व्यवस्था या तो कत्लेआम करती फौजी पुलिसिया इंतजाम है, या सीमित असीमित विशेष सैन्य अधिकार या वोट बैंक और मनचाहा जनसंख्या समायोजन है या फिर सत्ता के लिए अल्पमत समूह कुछ जातियों का क्लब, हजारों दूसरी जातियों , समुदायों. भाषाओं, राष्ट्रीयताओं, समाजों, संस्कृतियों, मातृभाषाओं, आस्थाओं को कुचलने का पर्याय है यह या फिर सेज के बहाने जैविकी रसायनिक प्रयोगशालाएं जैसे भोपाल गैसत्रासदी या फिर न्राम कलिंगनगर, सिंगुर, नोएडा, बरनाला, नन्दीग्राम, नवी मुम्बई, गुजरात, अयोध्या, आपरेशन ब्लू स्टार, नक्सलवाद माओवाद दमन के नाम मूलनिवासियों का कत्लेआंम है यह या फिर तेलंगना, श्रीकाकुलम, ढिमरी ब्लाक , मरीचझांपी के विश्वासघात और कत्लेआम का अनन्त सिलसिला है यह।
अमेरिका हथियार उद्योग की कमीशनखोरी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एजंसी, पेंटागन, ओवल हाउस, विश्व बैंक, मुद्राकोष के दिशा निर्देशों से नत्थी अर्थ व्यवस्था डालर की टूटन और उससे चस्पां तेल कीमतों में बढोतरी से उत्पन्न रोजमर्रे के संकट से आयात नियमों में ढिलाई के जरिये काबू पायेगी, यह सत्तावर्ग का सामूहिक सर्कस, नूरा कुश्ती के सिवाय क्या है। विदेशी पूंजी निवेश पर जोर, देशी उद्योग धंधे तबाह। कृषि चौपट। केन्द्र और राज्य सरकारों की तमाम योजनाएं पार्टी कैडरो और मतदान मशीनरी को पोषित करने के सर्वोत्तम उपाय। निजी और विदेशी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की छूट और उसमें सत्तावर्ग को बेपनाह मुनाफा। बहुमंजिल आवासन, फ्लाई ओवर, चकाचक सड़कें, स्वर्णिम चतुर्भुज, कुछ लाख केंद्रसरकार अधीन कर्मचारियों, सांसदों, विधायकों, मंत्रियों को मनचाहा वेतन, भत्ते और ऊपरी कमाई का पूरा बंदोबस्त।
भाजपा और माकपा परमाणु समझौते और भारत अमेरिकी सैन्. गठबंधन के सबसे बड़े विरोधी। पर अमेरिकी आकाओं से इनके कर्णधारों के मधुर रिश्ते। इतना विरोध पर जनविरोधी सरकार को बिना अड़चन पूरा पांच साल। परमाणु ऊर्जी की वकालत और अमेरिका का विरोध। अमेरिका का विरोध और इराक, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, ईरान और पाकिस्तान में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप पर खामोशी। आतंक वाद विरोधी युद्ध को समर्थन और निशाने पर मुस्लम समुदाय को वोटों के लिए तसलिमा विताड़न का उपहार। सच्चर कमेटची की रपट और मुसलमानों क ताजा हाल, बाबरी विध्वंस और गुजरात के दंगों से क्या साबित होता है?
बुश बुद्ध, आडवाणी बुद्ध, प्रणव बुद्ध, मोदी बुद्ध, कामरेड बुद्ध और ब्रांड बुद्ध में माक्र्सवाद का कौन सा डायलेक्टिक्स है?
महंगाई की मार, पिटाई से जागी सरकार
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रविवार को अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार और फेरबदल की प्रक्रिया में एम एस गिल, वी नारायण स्वामी, संतोष बगरोदिया, रघुनाथ झा, रामेश्वर उरांव तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया को मंत्रिमंडल में शामिल किया।
पूर्व चुनाव आयुक्त एम एस गिल को राज्यमंत्री [स्वतंत्र प्रभार] बनाया गया है जबकि वी नारायाण सामी, संतोष बगरोदिया, रघुनाथ झा, रामेश्वर उरांव, युवा कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्या सिंधिया तथा जतिन प्रसाद को राज्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई।
नकारात्मक खबरों के बीच देश के शेयर बाजारों में आगामी सप्ताह उठापटक जारी रहने की अधिक संभावना है। बीते सप्ताह चौतरफा बिकवाली के दबाव में बंबई शेयर बाजार [बीएसई] का सेंसेक्स 1028.17 तथा नेशनल स्टाक एक्सचेंज का निफ्टी 295 अंक नीचे आया। बाजार सूत्रों का कहना है कि फिलहाल जो भी समाचार हैं, वह कमोबेश शेयर बाजारों के प्रतिकूल हैं। देश के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में 26.68 प्रतिशत का योगदान रखने वाले छह बुनियादी सुविधा क्षेत्र की रफ्तार इस वर्ष जनवरी के 3.1 प्रतिशत की तुलना में कोयला, सीमेंट और बिजली क्षेत्र के अच्छे प्रदर्शन के बूते 8.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। पिछले साल फरवरी में इसकी वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रही थी।
सरकार की तरफ से गुरुवार को यहाँ जारी आँकड़ों के अनुसार सीमेंट, कोयला और बिजली क्षेत्र में आए सुधार के परिणामस्वरूप अच्छी वृद्धि हासिल करने में सफलता मिली।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो) वर्ष 2014-15 तक एक मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान की प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर ली है। इसरो के अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने कहा, "रिपोर्ट सरकार को मंजूरी और बजट उपलब्धता हेतु प्रस्तुत की जा रही है। अंतरिक्ष कमीशन, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं, अगले सप्ताह या उसके बाद रिपोर्ट को देखकर फैसला करेंगे।
ओएनजीसी लेटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में अगले 3 साल में करीब 2000 करोड़ रु. (45 करोड़ डॉलर) का निवेश करेगी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में सचिव एमएस श्रीनिवासन ने यहाँ एक सम्मेलन के बाद संवाददाताओं के साथ बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इसी सप्ताह सरकारी और ओएनजीसी के अधिकारियों का एक दल वेनेजुएला के लिए रवाना हो रहा है जिसमें दोनों देशों के बीच तेल क्षेत्रों में निवेश के बारे में समझौते ...
सरकार आज महंगाई से लड़ने के लिए जूझ रही है। इस लिहाज से इस तरह के कदम से कमोबेश मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने में मदद मिल सकती है। गैर-बासमती चावल के न्यूनतम निर्यात मूल्य को भी 900 डॉलर से बढ़ाकर 1100 डॉलर कर दिया गया है। चावल की उपलब्धता और महंगाई पर नियंत्रण के लिए सरकार ने इसके आयात पर कर को भी शून्य करने का निर्णय लिया है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण 22 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में मुद्रास्फीति की दर बढ़कर सात फीसदी हो गई। यह दर पिछले तीन वर्षो में सर्वाधिक है। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित यह दर इससे पहले के सप्ताह में 6.68 फीसदी थी।पिछले माह की 15 तारीख को समाप्त हुए सप्ताह की तुलना में 22 तारीख को समाप्त हुए सप्ताह के बीच खनिज पदार्थो की कीमतों में 38 फीसदी और सब्जियों की कीमतों में 4.9 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। इस दौरान दाल की कीमतों में 1.4 फीसदी और खाद्य तेलों की कीमतों में 1.6 फीसदी की तेजी आई।ये सभी आंकड़े उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी किए गए हैं। महंगाई को काबू में करने के लिए सरकार द्वारा सोमवार को विभिन्न वस्तुओं पर आयात शुल्क कम किए जाने का असर अभी नहीं इन आकड़ों पर नहीं पड़ा है। सरकार ने आज कहा है कि बढ़ती कीमतों में कमी लाना उसकी पहली प्राथमिकता है।इससे पहले वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने आज सिंगापुर में कहा, "हम जमा खोरों के खिलाफ कड़ा से कड़ा कदम उठाने से नहीं हिचकिचाएंगे।"
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और घरेलू बाजार में चढ़ती महँगाई ने सरकार के समक्ष नई चुनौती खड़ी कर दी है।
महँगे होते खाद्यान्नों के दाम पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने खाद्य तेलों पर आयात शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया है तो गेहूँ और दाल दलहन के शुल्क मुक्त आयात की अवधि एक साल और बढ़ा दी है लेकिन कच्चे तेल के चढ़ते दाम से जहाँ एक तरफ तेल कंपनियों का नुकसान बढ़ता जा रहा है वहीं दूसरी तरफ महँगाई का बोझ कम करने के लिए इस पर शुल्क घटाने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है।
पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिहं से कच्चे तेल के आयात पर सीमा शुल्क पूरी तरह समाप्त करने की माँग की। कच्चे तेल के आयात पर इस समय 5 प्रतिशत सीमा शुल्क लागू है लेकिन जानकारों का कहना है कि पहले से ही भारी घाटे में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बिक्री कर रही तेल कंपनियाँ क्या इस कमी का लाभ उपभोक्ता तक पहुँचा पाएँगी। घरेलू उपयोग के लिए रसोई गैस और राशन में बिक्री के लिए मिट्टी तेल का आयात पहले ही पूरी तरह शुल्क मुक्त है।
आर्थिक विश्लेषकों का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है।एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने बुधवार को जारी एक बयान में बताया कि औद्योगिक क्षेत्रों में तमाम उठापटक के बावजूद एशिया के विकासशील देश इस वर्ष 7.6 फीसदी की विकास दर हासिल करेंगे।एडीबी ने एशियन डेवलपमेंट आउटलुक 2008 (एडीओ) में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया कि वर्ष 2009 के दौरान एशियाई देश 7.8 फीसदी की विकास दर हासिल करेंगे।एडीबी के वरिष्ठ अर्थशास्त्री इफजाल अली ने कहा, " वैश्विक मंदी से एशिया नहीं बच सकेगा। "
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 मार्च, 2008 को लिए गए फ़ैसले में खाने के कच्चे तेलों पर से आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिया है और खाने के रिफ़ाइंड तेलों के आयात पर शुल्क को घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया है.
सरकार ने गैर बासमती चावल का न्यूनतम निर्यात मूल्य बढ़ाकर 1000 डॉलर प्रति टन कर दिया है। पहले यह 650 डालर प्रति टन था। घरेलू बाजार में अनाज की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने यह पहल की है। विदेश व्यापार महानिदेशालय की अधिसूचना के मुताबिक गैर बासमती चावल का निर्यात तभी हो सकेगा जब न्यूनतम निर्यात मूल्य 1000 डॉलर होगा। गैर-बासमती चावल के दामों में पिछले साल की तुलना में वृद्धि हुई है। पिछले साल इसकी कीमत 13-14 रुपये प्रति किलो थी जबकि अब इसकी कीमत 18 रुपये प्रति किलो हो गई है। भारत ने 31.87 लाख टन गैर-बासमती का निर्यात किया है जिसकी कीमत 3,759.84 करोड़ रुपये थी। ये सारे आंकड़े चालू वित्तीय वर्ष के हैं।बासमती चावल का निर्यात इस वित्तीय वर्ष में 5,67,000 करोड़ रुपये का रहा। पिछले साल यह निर्यात 2,792.81 करोड़ रुपये का था।
देश के शेयर बाजारों को शुक्रवार को मँहगाई के सात प्रतिशत से ऊपर निकल जाने के समाचारों का तगड़ा झटका लगा। बम्बई शेयर बाजार (बीएसई) सेंसेक्स 489 अंक तथा नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के निफ्टी ने 125 अंक की डुबकी लगाई।
कारोबार की शुरुआत में मामूली मजबूत खुलने के बावजूद बाजार दोपहर में मँहगाई की दर का आँकड़ा आने पर पूरी तरह से मंदे की गिरफ्त में आ गया। सरकार की मँहगाई रोकने की सभी कवायदों के बीच यह 22 मार्च को तीन वर्ष के अंतराल के बाद फिर सात प्रतिशत पर पहुँच गई। मँहगाई का वर्तमान स्तर चार दिसम्बर 2004 के 7.07 के बाद का सर्वाधिक है।
सेंसेक्स सत्र के शुरुआत में कल के 15832.55 अंक की तुलना में 15896.09 अंक पर कुछ मजबूत खुला और इससे ऊपर नहीं उठ सका। इसकी तुलना में सेंसेक्स करीब छह सौ अंक टूटकर 15303.04 अंक तक गिरने के बाद सत्र की समाप्ति पर कुल 489.43 अंक अर्थात 3.09 प्रतिशत की गिरावट से 15343.12 अक पर बंद हुआ। एनएसई का निफ्टी 124.60 अंक अर्थात 2.61 प्रतिशत की डुबकी लगाकर 4647 अंक रह गया।
मँहगाई का खौफ शेयर बाजारों पर इतना अधिक था कि बीएसई का कोई भी सूचकांक बिकवाली की मार से नहीं बच सका। मिडकैप और स्मालकैप में क्रमश: 124.38 तथा 125.30 अंक का नुकसान हुआ। पूँजीगत सामान के सूचकांक ने 594.38 अंक का झटका खाया तो आयल एंड गैस 249.24 अंक टूटा। पिछले दो दिन से जोरदार बढ़त में चल रहे आईटी सूचकांक में 77.51 अंक निकल गए। रियलटी 176.36 अंक टूटा। धातु सूचकांक 148.41 अंक गिरा।
मिडकैप और स्मालकैप में बिकवाली का असर यह हुआ कि बीएसई का रुख नकारात्मक रहा। सत्र में कुल 2695 कंपनियों के शेयरों में कामकाज हुआ और इसमें से दो तिहाई 67.64 प्रतिशत अर्थात 1823 कंपनियों को मंदे का झटका लगा, जबकि 30.02 प्रतिशत अथवा 809 के शेयर बढ़े और 63 में स्थिरता थी। सेंसेक्स की तीस कंपनियों में 28 के शेयरों ने गोता लगाया और दो में बढ़त रही।
सार्वजनिक उपक्रम भेल का शेयर आज लगातार दूसरे दिन सेंसेक्स की जुड़ी तीस कंपनियों में सर्वाधिक गिरावट वाला रहा। इसमें 1634.10 रुपए पर 6.89 प्रतिशत अर्थात 120.85 रुपए निकल गए। आवास रिण क्षेत्र के एचडीएफसी का शेयर 166.95 रुपए अर्थात 6.83 प्रतिशत के झटके से 2275.95 रुपए रह गया। कारोबार में यह 2251 रुपए तक गिरा।
बहु उपयोगी वाहन वर्ग की अग्रणी महिन्द्रा एंड महिन्द्रा के शेयर को छह प्रतिशत का झटका लगा। इसमें 605.15 रुपए पर 38.60 रुपए निकल गए। इंजीनियरिंग वर्ग की अग्रणी एलएंडटी का शेयर 5.74 प्रतिशत अर्थात 163.70 रुपए के नुकसान से 2686.35 रुपए पर बंद हुआ।
सेंसेक्स के नुकसान वाली कंपनियों में पहले बीस के शेयरों में दो प्रतिशत और इससे अधिक का घाटा हुआ। उपरोक्त के अलावा इसमें जयप्रकाश एसोसिएट्स, विप्रो लिमिटेड, भारती एयर टेल, आईटीसी लिमिटेड, आईसीआईसीआई बैंक, मारुति सुजूकी, रिलायंस इंडस्ट्रीज, सिप्ला, एचडीएफसी बैंक, रिलायंस कम्युनीकेशंस, डीएलएफ, इन्फोसिस टेकनोलोजीस, टाटा मोटर्स, एनटीपीसी, अम्बूजा सीमेंट ओर एसबीआई के शेयर इस सूची में थे।
फायदे वाले दो शेयरों में रैनबैक्सी लैबोरेट्रीज का शेयर 2.55 रुपए अर्थात 11.40 रुपए बढ़कर 458.25 रुपए पर बंद हुआ। टाटा स्टील में 660.70 रुपए पर 1.10 रुपए का फायदा रहा।
महंगाई दर सात प्रतिशत की ओर बढ़ रही है। महंगाई की मार से घबराई सरकार ने एहतियाती उपाय करने शुरू कर दिए हैं।
इस्पात, सीमेंट और गैर बासमती चावल सहित 40 उत्पादों के निर्यात से रियायतें समाप्त कर दी गई हैं। वित्त उपभोक्ता मसले और कृषि मंत्रालय को भरोसे में लेकर कार्रवाई करते हुए वाणिज्य मंत्रालय ने कर रिफंड स्कीम को समाप्त या अस्थाई रूप से रद्द कर दिया है। वाणिज्य सचिव जी के पिल्लै ने आज संवाददाताओं को बताया कि कुल 40 से 50 उत्पादों पर रियायतें समाप्त की गई हैं।
देश सीमेंट का आयात शून्य शुल्क पर कर रहा है जबकि एहतियाती उपाय के तहत निर्यात रियायतें फिलहाल बंद कर दी गई हैं।ये कदम इस्पात मंत्री रामविलास पासवान और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस मुलाकात के लगभग 15 दिनों के बाद उठाया गया जिसमें इन अयस्कों के निर्यात संबंधी डीईपीबी लाभ को अस्वीकृत कर दिया गया था। पासवान ने कहा था कि डीईपीबी के स्थगन से 593 करोड़ रुपये के बचत होने की संभावना है।
इसके स्थगन से निर्यात को थोड़ा झटका लगेगा। इस बीच मुद्रास्फीति की दर 11 महीने के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच कर 5.11 से 5.92 प्रतिशत हो गई है। रिजर्व बैंक महंगाई दर को 5 प्रतिशत तक रखने का लक्ष्य रखा है।
मक्खन और घी पर लगा आयात शुल्क 40 फ़ीसदी से घटाकर तीस फ़ीसदी कर दिया गया है. पर मसला सिर्फ़ मक्खन घी और खाने के तेलों का नहीं है. उदाहरण के तौर पर मसूर की दाल के थोक भाव पिछले साल में 28.46 प्रतिशत बढ़ गए हैं.अरहर की दाल के थोक भाव एक साल में 16.10 प्रतिशत बढ़ गए हैं.
आलू के थोक भाव एक साल में क़रीब 24.48 प्रतिशत बढ़ गए हैं.
एडीबी ने इस वर्ष एशिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति चीन द्वारा 10 फीसदी और भारत द्वारा 8 फीसदी की विकास दर हासिल करने की संभावना जताई है।रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले समय में सर्वाधिक मंहगाई की मार भी मध्य एशिया में देखने को मिलेगी।एडीबी ने मुद्रा स्फीति की बढ़ती दर को कम करने के लिए भी नीति-निर्माताओं को ध्यान देने के लिए कहा है।एडीबी का मानना है कि अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान की आर्थिक मंदी से चीन को काफी नुकसान होगा।
समाचार एजेंसी जिनहुआ ने एडीबी के हवाले से बताया कि बीते कुछ वर्षो की तुलना में इस वर्ष मध्य एशिया के राष्ट्र संभवत: 7.5 फीसदी की विकास दर हासिल करेंगे।
चुनावी बजट, नया पे-कमीशन, महंगाई भत्तों में बढोत्तरी, इन लोकलुभावन घोषणाओं के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार इन दिनों चिंतित हो गई है। कारण साफ है लगातार बढ़ती महंगाई। खासकर के ऐसे समय में जब परमाणु करार को लेकर वामपंथी दलों ने सरकार से अपना नाता तोड़ने की धमकी दे डाली है। जाहिर है आम चुनाव कभी भी हो सकते हैं। दूसरी बड़ी बात यह है कि दिल्ली में भी इसी साल चुनाव होने हैं। सरकार को इस बात की उम्मीद थी कि चुनावी बजट पेश कर व किसानों की ऋण माफी की घोषणा के बाद वे चुनाव मैदान में जा सकते हैं। क्योंकि माहौल उनके अनुकूल होगा। लेकिन महंगाई की दर काबू से बाहर होने के कारण जनता के साथ सरकार भी परेशान नजर आ रही है। खाद्य पदार्थों की कीमत चाहे वह सब्जी हो या फिर अनाज सभी की कीमतों में आग लगी हुई है। महंगाई की दर ने 5.02 पर पहुंच कर पिछले 10 महीने के रिकॉड को तोड़ दिया है। शेयर बाजार और जिंस बाजार रोजाना हिचकोले खा रहे हैं। असल में सरकार चाहे जितने राग अलाप ले महंगाई पर काबू पाना अब आसान नहीं रहा। बजट में भले ही पेट्रोल के दामों में बढोत्तरी नहीं की लेकिन गत 14 फरवरी को ही पेट्रोल के दाम दो रुपये और डीजल के दाम एक रुपये बढ़ा दिए थे। महंगाई अभी और बढ़ेगी क्योंकि कच्चे तेल के दाम 106 डॉलर प्रति बैरल की उंचाई को छू चुके हैं और इसमें और बढोत्तरी की संभावना है। पेट्रोल और डीजल तो छोडि़ए आटा, चावल, खाद्य, तेल सबके भाव आसमान पर हैं। सोना रोज महंगा होता जा रहा है। देखा जाए तो सरकार आर्थिक क्षेत्र के हर सेंटर में नाकाम साबित हो चुकी है।
सरकार के लाख जतन के बाद भी महंगाई घटने का नाम नहीं ले रही है।महंगाई पिछले चालीस सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है।
लोहा, खनिज, अनाज, दाल, सब्जियों जैसी वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं। 22 मार्च 2008 को समाप्त सप्ताह में महंगाई दर नई उंचाइयां छूते हुए 7 प्रतिशत के आंकड़े पर पहुंच गई है। पिछले सप्ताह की तुलना में इसमें 0.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 15 मार्च को समाप्त सप्ताह में महंगाई दर 6.68 प्रतिशत थी। इस साल की समान अवधि में पिछले साल के 23 मार्च 2007 में महंगाई दर 6.54 प्रतिशत थी।
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक प्राथमिक सामानों की महंगाई दर में 1.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सूचकांक पिछले सप्ताह के 230.5 से बढ़कर 234.6 पर पहुंच गया है। प्राथमिक सामानों में आने वाली खाद्य वस्तुओं के समूह में 0.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी चना (3 प्रतिशत), मसूर (2 प्रतिशत), फल और सब्जियों, उड़द और मूंग (प्रत्येक में 1 प्रतिशत) की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
महंगाई की सबसे अधिक मार सब्जियों पर पड़ी है जिसमें 4.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं समुद्री मछलियों के दामों में 4 प्रतिशत की गिरावट, मसालों के दाम में 2 प्रतिशत की गिरावट आई है। अखाद्य वस्तुओं के दामों में 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रेप सीड और सरसो सीड के दामों में 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। खनिज समूह महंगाई के बोझ के नीचे दब ही गया। इस समूह में 38.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
दूसरे समूह में तेल, ऊर्जा, प्रकाश और लुब्रीकेंट्स आते हैं, जिसमें 0.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।विनिर्मित वस्तुओं का प्रभाव महंगाई सूचकांक पर सबसे ज्यादा पड़ता है। इस समूह में 0.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। समूह के अंतर्गत आने वाले खाद्य उत्पादों में 0.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सूरजमुखी के तेल में 9 प्रतिशत, हाइड्रोजनेटेड वनस्पति तेल की कीमतों में 4 प्रतिशत, मक्खन, सरसो तेल, चीनी और मूंगफली तेल के दामों में 1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। समूह में टेक्सटाइल ने राहत दी है, जिसमें 0.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। नान-मेटलिक मिनरल प्रोडक्ट्स समूह में 0.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
आईसीआईसीआई बैंक के प्रबंध निदेशक केवी कामथ ने कहा, 'मुझे विश्वास है कि नीति नियामक मौद्रिक नीति और मंत्रालय के साथ मिलकर कदम उठाएंगे। ये दोनों आपूर्ति की ओर ध्यान देंगे।' क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी का मानना हौ कि इस स्थिति में रिजर्व बैंक कैश रिजर्व रेशियो बढ़ा सकता है।
इससे अतिरिक्त तरलता दूर होगी। वित्त राज्य मंत्री पीके बंसल ने कहा, ' सरकार महंगाई के मामले में सचेत है और मांग के मुताबिक महत्वपूर्ण कदम उठाए जाएंगे।' जोशी ने कहा, 'मौद्रिक नीति के लागू होने में समय लगेगा इसलिए सरकार इस मामले में वित्तीय कदम उठा सकती है जिससे महंगाई पर तत्काल असर पड़े। मूल्यों का दबाव कम समय के लिए है।'
उद्योग जगत ने कहा है कि विदेश व्यापार नीति (एफटीए) की वार्षिक समीक्षा रुपये के भाव में मजबूती और वैश्विक मंदी को ध्यान में रखते हुए निर्यात को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से होनी चाहिए।गौरतलब है कि उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय द्वारा 11 अप्रैल तक नई वार्षिक व्यापार नीति की घोषणा किए जाने की संभावना है। भारतीय उद्योग परिसंघ (फिक्की) ने कहा, "अगली विदेश व्यापार नीति में निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने की जरूरत है।"
फिक्की ने कहा, "भारतीय निर्यातकों की कारोबारी लागत को प्राथमिकता देकर कम करने के उपाए किए जाने चाहिए। यह हमारे प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बहुत ज्यादा है।" फिक्की के मुताबिक वर्ष 2006 में दुनिया के तमाम देशों द्वारा किए जाने वाले निर्यात में भारत की हिस्सेदारी मात्र एक प्रतिशत थी। वर्ष 2007 में भी पहले छह महीने यही स्थिति बरकार रही। इसे बढ़ाये जाने की जरूरत है।
फिक्की ने मांग की है कि वर्तमान 'ड्यूटी एंटाइटलमेंट पास बुक' (डीईपीबी) योजना के तहत निर्यातकों को तमाम शुल्कों से मुक्त कर दिया जाना चाहिए।
डीईपीबी योजना के तहत निर्यातकों द्वारा चुकाए जाने वाले शुल्कों में राहत दी जाती है और आयात होने वाले वस्तुओं पर शुल्क बढ़ा दिए जाते हैं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) इसे निर्यात सब्सिडी कहकर इसकी कड़ी आलोचना करता रहा है। डीईपीबी को इस वर्ष 31 मार्च तक समाप्त हो जाना था लेकिन इसकी अवधि बढ़ा दी गई है।
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने रविवार को कहा कि महंगाई की मार झेल रही जनता ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है और संप्रग को आगामी चुनावों में रिकार्ड तोड़ महंगाई की कीमत चुकानी पड़ेगी।
भाजपा के स्थापना दिवस के अवसर पर विपक्ष के नेता आडवाणी ने राजधानी दिल्ली में कहा कि सबको मालूम है कि संप्रग ने अपने छह साल के शासन में महंगाई रोकने के लिए किस प्रकार कदम उठाये थे। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्ववाली संप्रग सरकार इस मामले में पूरी तरह विफल रही है।
आडवाणी ने कहा कि संप्रग सरकार ने बजट में महंगाई रोकने के दावे किए थे, लेकिन दो दिन पहले ही मुद्रास्फीति की दर बढ़कर सात प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि संप्रग को बढ़ी हुई कीमतों की आगामी चुनाव [लोकसभा] में कीमत चुकानी पडेगी। आम जनता वोट का इस्तेमाल पार्टियों को सबक सिखाने में करती हैं। उन्होंने कहा कि जनता संप्रग सरकार की नीतियों से परेशान होकर भाजपा के नेतृत्व वाले राजग को सत्ता में लाने का इंतजार कर रही है।
इस मौके पर पार्टी राजनाथ सिंह ने आडवाणी की आत्मकथा 'माई कंट्री माइ लाइफ' पर आधारित एक वेबसाइट का शुभारंभ किया।
भाजपा द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर देने की चर्चा करते हुए आडवाणी ने कहा कि यह वेबसाइट हमारे चुनाव अभियान का हिस्सा होगी। उन्होंने कहा कि इसके जरिये देश के भविष्य यानि युवा वर्ग तक पहुंचा जा सकेगा, क्योंकि वे कंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि इस वेबसाइट का इस्तेमाल चुनाव प्रचार अभियान के दौरान बढ़ता जाएगा।
आडवाणी ने कहा कि यह सुखद संयोग है कि आज नवसंवतसर की पहली प्रतिपदा है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक के वी हेडगेवर की जयंती है और आज ही भाजपा का स्थापना दिवस है। भाजपा की स्थापना छह अप्रैल 1980 में हुई थी। ऐसे अवसर पर इस वेबसाइट की शुरुआत एक शुभ संकेत है। उन्होंने कहा कि आज का दिन भविष्य पर विचार करने का है और यह भविष्य इस देश का युवा वर्ग है। हम सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से उस तक पहुंचेंगे। उन्होंने कहा कि भाजपा का निर्माण संकट की घड़ी में हुआ था। उस वक्त हमें तत्कालीन जनता पार्टी से प्रस्ताव पारित कर निष्काषित किया गया था। उन्होंने कहा कि इस पार्टी में यह सामर्थ्य है जो संकट को भी अवसर में बदल सकती है। उन्होंने कहा कि भाजपा ही देश में एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने देश की राजनीति को दो ध्रुवीय बनाया है।
महंगाई से लड़ने की कमज़ोर कोशिश
आलोक पुराणिक
आर्थिक विशेषज्ञ
http://www.bbc.co.uk/hindi/business/story/2008/04/080401_alok_puranik.shtml
हाल के दिनों मे खाने पीने की चीज़ो के दाम बेतहाशा बढे है.
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 मार्च, 2008 को लिए गए फ़ैसले में खाने के कच्चे तेलों पर से आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिया है और खाने के रिफ़ाइंड तेलों के आयात पर शुल्क को घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया है.
मक्खन और घी पर लगा आयात शुल्क 40 फ़ीसदी से घटाकर तीस फ़ीसदी कर दिया गया है. पर मसला सिर्फ़ मक्खन घी और खाने के तेलों का नहीं है.
उदाहरण के तौर पर मसूर की दाल के थोक भाव पिछले साल में 28.46 प्रतिशत बढ़ गए हैं.
अरहर की दाल के थोक भाव एक साल में 16.10 प्रतिशत बढ़ गए हैं.
आलू के थोक भाव एक साल में क़रीब 24.48 प्रतिशत बढ़ गए हैं.
मूंगफली के तेल के भाव एक साल में क़रीब 10.49 प्रतिशत बढ़ गए हैं.
असली तस्वीर
इनके भावों में बढ़ोत्तरी का मतलब है कि सीमित आय वर्ग वाले की वास्तविक आय में कमी. वेतन में से जो हिस्सा खाने पीने की चीज़ों में जा रहा था, उसमें और बढ़ोत्तरी के आसार हैं.
महंगाई की बढ़ोत्तरी का 6.68 फीसदी का आंकड़ा पूरी तस्वीर सामने नहीं रखता. इन खाने पीने की चीजों के भाव बताते हैं कि महंगाई की मार कहाँ और किस वर्ग पर पड़ रही है.
हाल में आई गिरावट से शेयर बाज़ार अभी तक नहीं उबर पाया
आलू के भावों में तेज़ी की रफ़्तार सेंसेक्स से आगे निकल गई है. बल्कि सेंसेक्स तो गिरावट की स्थिति में है, पर यह बात आलू के बारे में नहीं कही जा सकती है. और कमोडिटी एक्सचेंजों की कृपा से आलू भी निवेश का आइटम बना हुआ है.
हाल के क़दमो के बेअसर होने की आशंका इसलिए है क्योंकि दालों और सब्जियों के भावों पर किसी भी किस्म का नियंत्रण करने में केंद्र या राज्य सरकारें असमर्थ रही हैं. खुले बाजार में किसी भी चीज़ की क़ीमत उसकी डिमांड और सप्लाई से तय होती है.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में जब भी भारतीय अर्थव्यवस्था से इस तरह की ख़बरें आती हैं, तो भारत को खाने का कच्चा तेल बेचने वाले, रिफ़ाइंड तेल बेचने वाले अपने भाव बढ़ा लेते हैं. यानी आयात शुल्क में जो कटौती होती है, उसका फायदा यहाँ के उपभोक्ताओं को नहीं पहुँचता.
माल बेचने पर दूसरे देशों के निर्यातक क़ीमत बढ़ा लेते हैं, उस क़ीमत पर घटा हुआ आयात शुल्क भी उपभोक्ताओं तक सस्ते आइटम पहुँचाने में विफल रहता है. इस समस्या का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से की ख़रीद क्षमता बहुत कमज़ोर है.
कमज़ोर पर असर
मंहगाई ने लोगों के घर का बजट बढ़ा दिया है
मोटे तौर पर माना जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में क़रीब चौरासी करोड़ लोग ऐसे हैं जो रोज़ बीस रुपये रोज़ पर बसर करते हैं. सेंसेक्स के उछलने का फ़ायदा इन तक नहीं पहुँचता. पर आलू के भाव और सरसों के तेल उछलने की चोट इन तक ज़रुर पहुँचती है.
हाल तक की सेंसेक्स बूम में जिन्होने लाखों करोड़ों कमा लिये हैं उन्हें आलू या सरसों के तेल के कुछ ज़्यादा भाव देना नहीं अखरेगा लेकिन जिसकी दस दिन की कमाई ही दो सौ रुपये होगी उन्हे तो फ़र्क पड़ता है.
इसका एक दौर में इलाज होता था राशन की दुकान, जो अपनी कुव्यवस्था में भी थोड़ी बहुत राहत देने का काम करती थी. जैसा भी सही, सस्ता गेहूँ वहाँ मिलता था. जैसे भी सही, घटिया चावल वहाँ मिलते थे. पर सार्वजनिक वितरण व्यवस्था अब ध्वस्त हो चुकी है.
महंगाई से किसी क़िस्म की संस्थागत निजात अब तक समाज के कमज़ोर वर्ग को नहीं है.
सार्वजनिक वितरण व्यवस्था इस मसले का एक इलाज है. लेकिन सार्वजनिक वितरण व्यवस्था किसी भी सरकार की चिंता का विषय नहीं है.
आसमान पर महंगाई
भारत के लोग पिछले एक साल की सबसे बड़ी महंगाई से जूझ रहे हैं.
अख़बारों की राय...
दिल्ली के अन
