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पाखण्डवाद का डाइलेक्टिक्स अर्थात उत्तर आधुनिक गाय बछड़े की कथा अनन्त

बुश के गुलाम दरबारी राजनेताओं का एका कायम। मूलनिवासियों के सफाये के लिए। भूमि सुधार के दुसरे चरण में जमीन मालिकों से खरीदकर किसानों में बांटेगी वाममोर्चा सरकार और गांवों में ढीली होती पकड़ मजबूत करने के लिए इलाका दखल करेगी सेज अभियान तेज करते हुए। भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कांग्रेस, परमाणु सौदे को लेकर नूरा कुश्ती, खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, नीली क्रान्ति, शेयर बाजार और राष्ट्रद्रोही एनआरआई भारत सरकार के असली प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के कोलाज में इस खण्डित रक्ताक्त अपृश्यता रंगभेद आधारित भूराजनीति की मुकम्मल तस्वीर साफ है।

पाखण्डवाद का डाइलेक्टिक्स अर्थात उत्तर आधुनिक गाय बछड़े की कथा अनन्त
पलाश विश्वास
गुलाम दरबारी राजनेताओं का एका कायम। मूलनिवासियों के सफाये के लिए। भूमि सुधार के दुसरे चरण में जमीन मालिकों से खरीदकर किसानों में बांटेगी वाममोर्चा सरकार और गांवों में ढीली होती पकड़ मजबूत करने के लिए इलाका दखल करेगी सेज अभियान तेज करते हुए। भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कांग्रेस, परमाणु सौदे को लेकर नूरा कुश्ती, खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, नीली क्रान्ति, शेयर बाजार और राष्ट्रद्रोही एनआरआई भारत सरकार के असली प्रधानमंत्री की अमेरिका यात्रा के कोलाज में इस खण्डित रक्ताक्त अपृश्यता रंगभेद आधारित भूराजनीति की मुकम्मल तस्वीर साफ है। माकपा ने विश्वास व्यक्त किया कि केन्द्र में सत्तारूढ़ संप्रग सरकार अपना पाँच वर्ष का कार्यकाल पूरा करेगी। माकपा महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमें शुरू से ही पता था। उन्होंने कहा कि कोयम्बटूर में पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन में तीसरे विकल्प पर ही चर्चा होगी। माकपा महासचिव ने संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं पर गुंडागर्दी करने का आरोप लगाया। पार्टी कांग्रेस में मौजूद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी [माकपा] के महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि तीसरा विकल्प गठित करने और उसे जनता के सामने पेश करने के लिए वामपंथी पहल की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वामपंथी एकता की बुनियाद पर ही इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि वामदलों में कुछ खास मुद्दों पर मतभेद होना असामान्य नहीं है। इसके बावजूद ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे वाम एकता कमजोर हो।



भारत में यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि अमेरिका में संभावित आर्थिक मंदी भारत की तेज गति से बढ़ती आर्थिक वृद्धि को कैसे प्रभावित करेगी । भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी होने की संभावना है, लेकिन आगामी वर्ष में स्वस्थ गति से आगे बढ़ती रहेगी । परंतु जनवरी में मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक, सेंसेक्स अमेरिका में संभावित मंदी की वजह से उपजी आशंकाओं के चलते वैश्विक आर्थिक वृद्धि में गिरावट आने के कारण अन्य एशियाई बाजारों की तरह काफी नीचे गिर गया । उसके बाद के हफ्तों में स्तब्ध निवेशकों ने इस वर्ष के शुरू में सेंसेक्स को अपने चरम से 20 प्रतिशत से भी ज्यादा नीचे गिरते हुए देखा है । अर्थशास्त्री ऐसी आशंकाओं को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं । श्री सौमित्र चौधरी प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य हैं । उन्होंने कहा कि अमेरिका की संभावित मंदी का भारत की आर्थिक वृद्धि पर बहुत मामूली असर पड़ेगा ।

उन्होंने कहा कि कुछ असर तो पड़ेगा, लेकिन अमेरिकी मंदी का सीधा असर बहुत अधिक नहीं होगा, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अब भी निर्यात की मांग को नहीं, बल्कि घरेलू मांग को पूरा करता है ।

भारत की घरेलू मांग उसके 5 करोड़ लोगों के मध्यम वर्ग से आती है । उनकी बढ़ती हुई आय ने वाहनों, मोबाइल फोनों और मकानों की बिक्री में तेजी से वृद्धि की है और उद्योगों के तेजी से बढ़ने में योगदान दिया है ।

परंतु अर्थशास्त्री चेतावनी दे रहे हैं कि उपभोक्ता मांग उतनी ही अधिक नहीं होगी, जितनी कि पिछले वर्षों में रही है और इसका मुख्य कारण यह है कि पिछले वर्ष मुद्रास्फिति बढ़ने से सरकार ने ब्याज दरें बढ़ा दी हैं ।

श्री चौधरी ने आगाह किया कि कर्ज ज्यादा महंगे होने पर पैसा कम खर्च किया जाएगा । उन्होंने कहा कि सभी तरह की वस्तुओं के, खासकर खाद्य और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं । जब मुद्रास्फिति का दबाव बहुत अधिक होता है तो उसे कम करने के लिए कदम उठाने पर आर्थिक वृद्धि कुछ धीमी हो जाती है ।

सरकार का कहना है कि उसे आगामी वर्ष में आर्थिक वृद्धि की दर 8.7 प्रतिशत होने की आशा है, जबकि एक साल पहले यह 9.6 प्रतिशत थी ।



माकपा अब धर्म और जाति को भी महत्व देगी। संघ परिवार को रोकने के लिए। गोबलय की अवधारणा छोड़कर उत्तर प्रदेश और बिहार झारखणड में समेट दी हिन्दी दुनिया। कांग्रेस को दिल्ली की सत्ता में बने रहने के लिए प्रणव ले आये वाशिंगटन की मंजूरी। कांग्रेस को केन्द्र की सत्ता सौंपकर बंगाल और केरल में नरमेध यज्ञ जारी रखेगी माकपा कांग्रेस के सक्रिय सहयोग से। प्रणव और दासमुंशी, बुश और मनमोहन के रहते वामपंथियों को क्या फिक्र? मुसलिम वोट बैंक के लिए तसलिमा को निकाल बाहर किया तो आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और साम्प्रदायिकता के खतरे के नारे के साथ बना रहेगा यूपीए। माकपा आगामी 29 मार्च से तीन अप्रैल तक कोयम्बटूर में होनेवाली अपनी 19वीं पार्टी कांग्रेस में पार्टी दलितों के अधिकारों के संघर्ष के लिए एक व्यापक मंच बनाने की घोषणा करने जा रही है। 19वीं पार्टी कांग्रेस में पेश होनेवाले राजनीतिक प्रस्ताव के मसविदे में दलितों के अधिकारों को लेकर डेढ़ पृष्ठ खर्च किए गए हैं और उनमें चार प्रस्ताव शामिल किए गए हैं। लोकसभा चुनावों पर निगाह लगाए वामपंथी दलों ने रविवार को केंद्र की संप्रग सरकार पर देश को गलत रास्ते पर ले जाने का आरोप लगाया। वामदलों ने कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ तीसरा विकल्प तैयार करने का आह्वान भी किया। वामपंथी पार्टियों ने कहा कि यह विकल्प साझा जन संघर्ष के जरिये कायम किया जाना चाहिए।



महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि तीसरा विकल्प गठित करने और उसे जनता के सामने पेश करने के लिए वामपंथी पहल की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वामपंथी एकता की बुनियाद पर ही इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि वामदलों में कुछ खास मुद्दों पर मतभेद होना असामान्य नहीं है। इसके बावजूद ऐसा कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे वाम एकता कमजोर हो।



पार्टी की इस चार दिवसीय कांग्रेस में एक हजार से ज्यादा डेलीगेट्स शामिल हो रहे हैं। इनमें 30 देशों से आए कम्युनिस्ट मेहमान भी शामिल हैं। कांग्रेस में भारत अमेरिका परमाणु सौदा, बढ़ती कीमतों, किसानों के समक्ष उत्पन्न संकट और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की समस्याओं आदि पर भी विचार होगा।



केंद्र में सरकार को बाहर से समर्थन दे रही प्रमुख वामपंथी पार्टी के महाधिवेशन सत्र में परमाणु करार को लेकर पार्टी के गंभीर विरोध की बात दोहराई गई और जोर दिया गया कि पार्टी इसे कार्यान्वयन से रोकने के लिए अपना पूरा दमखम लगा देगी। कांग्रेस और भाजपा से इतर तीसरा विकल्प तैयार करने के आह्वान और भारत अमेरिका सैनिक संधि को समाप्त करने की मांग के साथ माकपा की छह दिवसीय कांग्रेस शनिवार को शुरू हुई। इसमें वाशिंगटन के साथ नागरिक परमाणु समझौते पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा गया कि पार्टी इसे कार्यान्वयन से रोकने के लिए अपना पूरा जोर लगा देगी। 19वीं कांग्रेस के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए माकपा महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाली सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता में आने से रोकने के लिए सभी कदम उठाए जाने चाहिए और तीसरा विकल्प नीतियों के वैकल्पिक मंच पर आधारित होना चाहिए जो महज चुनावी गठबंधन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष पार्टियां हैं, जो जनोन्मुख आर्थिक नीतियों, सामाजिक न्याय के उपायों और स्वतंत्र विदेश नीति पर वाम से सहमत हो सकती हैं। ऐसा मंच नि:संदेह चरित्र में गैर सांप्रदायिक होगा। इस अपील में उनका साथ देते हुए भाकपा महासचिव एबी बर्धन ने कहा कि यह वक्त है जब हमें कांग्रेस और भाजपा दोनों का एक वाम तथा लोकतांत्रिक विकल्प तैयार करने का हर प्रयास करना चाहिए। भारतीय अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी मंदी के असर का जिक्र करते हुए करात ने कहा कि सरकार में हमारे कुछ नेता पशु भावना का त्याग करने की बात करते हैं और अब भी पूंजी खाता परिवर्तनीयता की बात करते हैं, हमें आशा है कि मौजूदा संकट कुछ उचित सबक सिखाएगा। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान में कई मानते हैं कि अमेरिका दुनिया की प्रमुख शक्ति बनने में भारत की मदद करेगा। उन्होंने कहा कि यह त्रुटिपूर्ण है जिसकी वजह से अमेरिका के साथ सामरिक तालमेल की बात सत्ताधारी वर्ग में उपजती है। संप्रग सरकार ने उसी को आगे बढ़ाया है, जिसे भाजपा नीत सरकार ने शुरू किया था।




भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी .भाकपा. के महासचिव ए. बी. बर्द्धन ने राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी .भाजपा. के विकल्प के तौर पर ..तीसरा मोर्चा.. तैयार करने के लिए समान विचारधारा वाले दलों से संधि वार्ता करने की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी .माकपा. से आज अपील की। भाईचारे के तहत बधाई देने पहुंचे वर्धन ने कहा कि ऐसा वैकल्पिक कार्यक्रम जनता के मुद्दों पर साझा संघर्ष के जरिए ही उभर सकता है। और पार्टियां हैं, जो किसी विकल्प का तलाश कर रही हैं। भाकपा नेता ने कहा कि वाम दलों को उनके साथ [अन्य पार्टियों से] बातचीत करनी होगी और उन्हें ऐसे किसी तीसरे विकल्प के निर्माण के लिए साझा संघर्ष में शामिल करना होगा तथा दोनों वामपंथी दलों को इस पर मिलकर काम करना होगा। नंदीग्राम व सिंगूर जैसे कांडों की कालिख और पंूजीवाद के समर्थन में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य सरीखे माकपा के सुधारवादियों को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने कटघरे में खड़ा किया है। भाकपा ने उदारीकरण अैर सेज समर्थक माकपा नेताओं की कड़ी आलोचना की है और उन दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है कि पूंजीवादी शासन व्यवस्था में समाजवाद ला पाना नामुमकिन है। केरल व बंगाल के भाकपा कामरेड सेज मामले में दोनों राज्यों में माकपा की नीति पर चलने को विवश हैं, लेकिन बाकी प्रदेशों के ज्यादातर वक्ता इस पक्ष में हैं कि सेज के खिलाफ पार्टी की लाइन में लचीलापन लाने की बजाए मुखर विरोध की नीति को ही जारी रखा जाए। तेलंगाना का सकंट : तेलंगाना के कामरेडों का भाकपा नेतृत्व पर जबर्दस्त दबाव है कि उन्हें अलग प्रदेश की लोकप्रिय मांग पर चुप नहीं बैठना चाहिए।



बर्धन ने वाम एकता मजबूत बनाने की जरूरत को रेखांकित किया। तीसरा विकल्प कायम करने के इच्छुक दलों का सीधा उल्लेख किए बिना उन्होंने कहा कि कई अन्य धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक दल ऐसे विकल्प की तलाश में हैं। हमें उनसे संवाद कायम करना है। इस तरह का एक विकल्प कायम करने के लिए उन्हें अपने साझा संघर्ष में शामिल करना है।

उन्होंने भारत अमेरिका परमाणु सौदे का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि संप्रग सरकार जानबूझकर न्यूनतम साझा कार्यक्रम के प्रावधानों का उल्लंघन कर रही है। इस कार्यक्रम में एक ऐसी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है जिसका लक्ष्य बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विकास करना है। उन्होंने कहा कि हम सरकार की नीतियों से बहुत चिंतित हैं। सरकार कदम दर कदम भारत और अमेरिका के बीच करीबी सामरिक भागीदारी की ओर बढ़ रही है। परमाणु समझौता परमाणु ऊर्जा तक पहुंच कायम करने का निर्दोष प्रयास मात्र नहीं है बल्कि उसके साथ एक सामरिक भागीदारी को ढंकने का प्रयास है।



भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) की बीसवीं राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठक हैदराबाद में रविवार को शुरु हुई. बैठक के पहले दिन देश में तीसरे राजनीतिक विकल्प बनाने का आह्वान किया गया.
पार्टी के महासचिव एबी बर्धन ने कहा, "हमारी पार्टी सोचती है कि समय आ गया है कि कांग्रेस और भाजपा का विकल्प तैयार किया जाए."

पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति की चार दिन चलने वाली इस बैठक में यूपीए सरकार की नीतियों सहित कई महत्वपूर्व राजनीतिक मसलों पर चर्चा की संभावना है.



एबी बर्धन ने कहा, "हमें भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर ऐतराज़ है." अमरीका के साथ परमाणु समझौते को लेकर पार्टी के विरोध को लेकर उन्होंने कहा, "123 समझौता हमारे देश की संप्रभुता का अपमान है."उन्होंने कहा कि पार्टी को परमाणु ईंधन के उपयोग और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ समझौते को लेकर कोई दिक़्क़त नहीं है.



पिछले एक साल में जब-जब भारत सरकार और अमरीकी नेताओं के बीच परमाणु करार के मुद्दे पर कोई चर्चा या औपचारिक घोषणा की गई तो वामपंथी पार्टियों ने मनमोहन सिंह सरकार की आलोचना की.
भारत और अमरीका के बीच परमाणु करार पर सहमति बनने के तुरंत बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीएम) ने आठ पन्ने का एक बयान जारी किया था.

साथ ही सरकार से कहा कि वो इस समझौते पर बन रहे गतिरोध और राजनीतिक पार्टियों के विरोध पर ध्यान दे.

लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए) की अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने इसे अनदेखा कर दिया.



कुछ महीने पहले बीबीसी से बातचीत में सीपीआई महासचिव एबी वर्धन ने साफ किया था कि कांग्रेस नेतृत्व इस भ्रम में है कि भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) विरोधी होने के चलते वामपंथी आँखें बंद करके मनमोहन सिंह को समर्थन देते रहेंगे.उन्होंने उस समय मनमोहन सिंह सरकार द्वारा अमरीका सरकार के साथ बढ़ते सैनिक संबंधों पर भी अपना विरोध जताया था.



भारत के इतिहास में ऐसे कई मौके आए है जब वामपंथियों ने राष्ट्रीय मुख्यधारा से बिल्कुल अलग रुख़ अपनाया है.
इस बार परमाणु मुद्दे पर भी वामपंथी दलों का सुर कुछ और ही है. उन्होंने समर्थन वापसी की बात तो नहीं कही है लेकिन सरकार को अपनी राय और रुख़ से अवगत कराते हुए चेतावनी ज़रूर दी है.

कई हल्कों में ये आवाज़ उठती रही है कि वामपंथियों का यह रुख़ आम लोगों की राय को प्रतिबिंबित नहीं करता.





माकपा अब हिन्दी प्रदेशों में अपने पांव पसारने के लिए वहां के दलितों को अपनी तरफ खींचने में जुट गई है। पार्टी को बोध हो गया है कि हिन्दी प्रदेशों की राजनीति जाति आधारित है और माकपा चूंकि जाति आधारित राजनीति की विरोधी है, इसलिए उसने एक दूसरा रास्ता निकाला है। पार्टी ने अपने राजनीतिक एजेंडे में दलित-मुद्दे को शामिल किया है। नंदीग्राम के अनुभव विदेशी और घरेलू निजी निवेश आकर्षित करने की जरूरत तथा वाम मोर्चा शासित राज्यों में उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण से जुड़ी समस्या ने माकपा को पार्टी के नेतृत्व वाली सरकारों में अपनी भूमिका के संबंध में नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। माकपा समाजवाद के मार्ग को छोड़कर पूंजीवाद को अपना रही है। इसी वजह से राज्य की आम जनता माकपा से हट रही है। माकपा राज्य सचिव विमान बोस ने शनिवार को संवाददाताओं से बातचीत में यह आशंका व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पंचायत चुनाव को केंद्र कर राज्य में अशुभ गठजोड़ शुरू हुआ है। परस्पर विरोधी विचारवाली पार्टियां जब अशुभ गठजोड़ करती हैं तो उससे शुभ नतीजा होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। गठजोड़ में चरमपंथी, दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक शक्तियां भी शामिल हो रही हैं। पंचायत चुनाव में विपक्षी दलों की ओर से हिंसा फैलाने की आशंका है।



तिब्बत में जारी हिंसा के मामले में कुछ भी कहने से इनकार करते हुए माकपा ने कहा कि यह चीन का आंतरिक मामला है। पार्टी के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि भारत सरकार तिब्बत को चीन का अभिन्न भाग मानती है। सरकार ने यह भी कहा है कि वह शरणार्थियों को भारत में रहने की अनुमति देगी। यह नीति दलाईलामा के भारत आने से पहले से रही है और हम इस रुख का समर्थन करते हैं।



उस समय रक्षा मंत्रालय की बागडोर मौजूदा विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी के हाथों में थी। माकपा के पोलित ब्यूरो ने भी इस खुलासे के बाद सख्त बयान जारी किया है और सरकार के सामने अनेक सवाल उठाए हैं। पार्टी ने कहा कि है कि इस सौदे पर वह सरकार से संसद में बयान देने की माँग करेगी। पोलित ब्यूरो ने कैग की रिपोर्ट का हवाल देते हुए पूछा है कि क्या यह सब अमेरिकी हथियार एवं रक्षा उपकरण खरीदने को लेकर बुश प्रशासन के दबाव में किया गया।मौके का फायदा उठाते हुए माकपा ने शनिवार को सरकार से नियंत्रक महालेखापरीक्षक [सीएजी] की रिपोर्ट के आधार पर इस संदेहास्पद रक्षा सौदे की जांच कराने की मांग कर दी है। पार्टी की केंद्रीय समिति ने एक बयान जारी कर कहा है कि तमाम जरूरी प्रक्रिया को दरकिनार कर 36 साल पुराने अमेरिकी युद्धपोत 'ट्रेंटन' [आइएनएस जलअश्व] को खरीदे जाने की जांच की जानी चाहिए।


भारतीय राजनीति प्राचीन काल से वैदिकी ब्राह्मणों के कब्जे में रही है। द्रविड़ सभ्यता के अवसान उपरान्त जारी वैदिकी हिंसा का सिलसिला बन्द नहीं हुआ है। जारी है शूद्रायन का महा अश्वमेध यज्ञ। जिसे हिन्दुत्व कहा जाता है। चन्द्र गुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और पाल वंश के इतिहास में मूलनिवासी अस्मिता की श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है तो पुष्यमित्र ने अशोक का उत्तराधिकार को मनुस्मृति की व्यवस्था में बदल दिया। राजधर से बौद्धधर्म के विलोप और हिन्दुत्व के पुनरुत्थान से शुरु हुआ भारतीय समाज को छह हजार जातियों में विभाजित करने हेतु शूद्रायन का दूसरा चरण। पाल वंश के बाद बंगाल की दलित भूमि सेन वंश के शासनकाल में बामहनों के दखल में चला गया। मुगल पठान काल में भारतीय सत्तावर्ग ने मुसलिम शासकों का साथ निभाने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखायी। इसी काल में मूलनिवासियों पर जुल्मोसितम का इसतरह इंतहा कर दिया ब्राहअमणों ने कि व्यापक धर्मान्तरण हुआ। अंग्रेजी हूकुमत के दौरान मुम्बई, कोलकाता और मद्रास को केन्द्र में रखकर जो औपनिवेशिक शासन का तानाबाना बना उसमें सवर्ण ससत्तावर्ग की खास भूमिका थी। शूद्र, आदिवासी और मुसलमान किसान जहां समय समय पर बगावत करते रहे तो ब्राह्मणों की अगुवाई में सवर्म सत्तावर्ग ने ऐसे हर जनविद्रोह को कुचलने में विदेशी हुक्मरान का पूरा साथ दिया। मुंडा, संथाल, कोल, भील महाविद्रोह, सन्यासी विद्रोह, नील विद्रोह की कथा यही है। यहां तक कि सन १८५७ के महाविद्रोह में महाराष्ट्र. तमिलनाडु और बंगाल के कुलीन ब्राह्मणों की अगुवाई में सवर्ण सत्तावर्ग ने अंग्रेजों का साथ दिया। इनमें तथाकथित नवजागरण के मसीहा भी शामिल थे। हरिचांद ठाकुर या ज्योतिबा फूले के अस्जृश्यता विरोधी आन्दोलन और मूलनिवासियों की उच्चशिक्षा के खिलाफ थे ये लोग। दलित मुसलिम प्रजाजन पर सवर्ण जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ ढाका में ही मुसलिम लीग का गठन हुआ। पर बंगाल की अंतरिम सरकार बनी कृषक प्रजा पार्टी के फजलूल हक की अगुवाई में । उन्होंने किसानों से दगा करके ब्राह्मण नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी क मंत्री बनाया, तब जाकर कहीं मुसलिम लीग आंदोलन जोर पकड़ने लगा। महाप्राण जोगेन्द्र नाथ मण्डल और बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की अगुवाई में राष्ट्रीय दलित आन्दोलन जब मूलनिवासियों के हकहकूक के लिए तहलका मचाने लगे तो बंगाल और महाराष्ट्र के दलितों की तर्ज पर पूना और कोलकाता के बामहण एक जुट होकर भारत के विभाजन की तैयारी में जुट गया। इस बीच सवर्म सत्तावर्ग के राष्ट्रपिता ने दलितों के स्वतन्त्र मतदान अधिकार को पूना पैक्ट के जरिये खत्म कर दिया। दूसरे महायुद्ध ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उपनिवेशों को स्वतन्त्र करने को मजबूर बनाया तो भारतीय ब्राह्मणों ने सत्ता हथिया लिया और देश के टुकड़े टुकड़े कर दिये। तो ब्राह्मणों ने सत्ता की खातिर पहले समाज को मनुस्मृति के जरिये बांटा । फिर देश को बांटने का क्रम शुरू हुआ। जिसका परिणाम आज रक्ताक्त यह महादेश भूगोल है।

विचारधाराएं और पार्टियां सत्ता समीकरण और सवर्ण हितों के मुताबिक बनती बिगड़ती रही। दक्षिणपंथ और मध्यपंथ, वामपंथ और गांधीवाद, समाजवाद, लोहियावाद, बहुजनवाद सबकुछ मूलनिवासियों के खिलाफ चला गया। आहिस्ते आहिस्ते अर्थव्यवस्थ, समाज और देश का ऐसा कारपोरेटीकरण होता गया कि सत्ता इने गिने परिवारों तक सिमटती गयी और अब मूलनिवासियों के अलाव देशभर की गरीब आम जनता आजीविका, नागरिकता और जीवन, मानवाधिकार और नागरिक अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों पर नैसर्गिक अधिकारों से बेदखल हैं। यह उत्तर आधुनिक मनुस्मृतिवाद है। भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के तमाम महासचिव ब्राह्मण ही होते रहे हैं। किसी ने भारतीय समाज पर कभी फोकस नहीं किया। क्रान्ति के आयात तक सीमाबद्ध रहे। देश के इतिहास, द्रविड़ सभ्यता, राष्ट्रीयताओं , बौद्ध शासनकाल, दलित विरासत और मूलनिवासियों के हकहकूक की कोई फिक्र नहीं थी अबतक।

कोयम्बटूर कांग्रेस में कारपोरेटीकरण के तकादे से बुश बुद्ध गठबंधन को जायज ठहराने के लिए अब कांग्रेस की तर्ज पर अम्बेडकर का सहारा लिया जा रहा है। नंदीग्राम में दलितों और मुसलमानों के कत्लेआम की पृष्ठभूमि में। राज्यसभा चुनाव में माकपा के साथ कांग्रेस सदस्यों के मतदान करने से यह स्पष्ट हो गया। श्री चटर्जी ने कहा कि राज्य में माकपा के खिलाफ ममता बनर्जी का कोई विकल्प नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुश्री बनर्जी ने माकपा के अत्याचार के खिलाफ लड़ रही हैं और माकपा विरोधी अन्य दलों को संगठित कर रही हैं। खुशी की बात है कि माकपा विरोधी एसयूसीआई के सदस्यों ने राज्यसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार दिनेश त्रिवेदी को वोट दिया।

जनवरी १९७९ में सुंदरवन के मरीचझांपी द्वीप में दंडकारण्य के शरणार्थियों को पुनर्वास की लालच देकर बुलाकर उन्हें भोजन और पानी स वंचित करके लम्बी नाकेबंदी के मध्य गोलियों से भून डाला गया। लाशों को न जलाया गया और न दफनाया गया। भबाघों का चारा बना दिया गया। नंदीग्राम, तसलिमा नसरीन और रिजवान प्रेमकथा पर हो हल्ला करने वाले कोलकाता और बंगाल के ब्राह्मण बुद्धजीवी, पत्रकार और राजनेत इसपर पिछले तीस साल से चुप्पी साधे रहे और कामरेड ज्योति बसु की जय जयकार करते रहे। मरीचझांपी भारत में मूलनिवासियों की कत्ल की नयी वैज्ञानिक संस्कृति की जन्मगाथा है। जिसे आज देशभर में रोजगार और विकास के नाम पर सेज आखेटगाहों में दशव्यापी पना दिया गया।

भारत में १९२५ में ककम्युनिस्ट पार्टी का जन्म हुआ। १९५२ में प्रमुख विपक पार्टी थी कम्युनिस्ट पार्टी
। पर अब वामपंथी आंदोलन का संसदीय धड़ा बंगाल, केरल और त्रिपुरा के क्षेत्रीय भूगोल में सिमट गया है। ८३ साल के संबे अन्तराल के बाद अखिल भारतीय स्तर पर वामपंथ का असर नगण्य है। इसके मुकाबले माओवाद का असर कहीं व्यापक है। हिंदी पट्टी और दक्षिण भारत तक में माओवादी आंदोलन की मौजूदगी से वसन्त के वज्रनिनाद के तीन दशक बाद भी राष्ट्रशक्ति की मुश्किलें दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ, राष्ट्र शक्ति की दमनकारी व्यवस्था में सक्रिय शरीक और ग्लोबल सत्तावर्ग का अहम हिस्सा संसदीय वामपंथ नेहरु इन्दिरा के जमाने से लगातर केन्द्रीय सत्ता और अमेरिकापरस्त ताकतों से गठजोड़ करके तीन राज्यों की सत्ता में ही सिमट गया है। माकपा ने १९६४ में सलकिया कांग्रेस में हिन्दी पट्टी में सक्रियता और प्रभाव बढ़ाने की रणनीति तय की थी। हाल में हैदराबाद कांग्रेस में पार्टी ने एक दलित एजंडा भी तय किया। पर हुआ इसका उलट। अमेरिकापरस्त ताकतों के सा थ गठबन्धन के जरिए ब्राह्ममवाद के हितों में सवर्ण वर्चस्व बनाये रखने के फेर में हिंदी पट्टी में पार्टी का नामोनिशा मिट गया। सेज अभियान और आत्मघाती शहरीकरण, पूंजीवादी विकास का रास्ता अख्तियार करके किसान आदोलन, मजूर आन्दोलन और भूमि सुधार की परम्परा को तिलंजलि देकर वामपंथ अब भारत में मूलनिवासियों के खात्मा अभियान की मुख्य ताकत बन गया है। साम्राज्यवाद के विरोध के बजाय वह अब कांग्रेस के साथ अमेरिकापरस्ती में संघियों से आगे निकल गया है।
सलकिया प्लेनम के ठीक तीस साल बाद १९०८ में आसन्न पार्टी कांग्रेस में हिंदी पट्टी क अवधारणा को तिलांजलि दी जा रही है। वह भी बंगाल के कामरेडों के हिंदी सीखन सिखाने की नौटंकी के बाद। पार्टी अब झारखंड या हरियाणा को हिंदी पट्टी में शामिल माने को अवैज्ञानिक करार दे रही है। भाषा के बजाय अब पार्टी के जोर राज्यवार सामाजिक आर्थक विश्लेषण पर है। जिसके मद्देनजर पार्टी का फोकस पूरी हिंदी पट्टी के बजाय उत्तर प्रदेश , बिहार और झारखंड तक सीमाबद्ध हो जायेगा।

को.म्बटूर में सत्तर दशक से सत्ता में भागीदारी के सबसे बड़े दो वामपंथी सौदागर कगामरेड ज्योति बसु और कामरेड सुरजीत गैरहाजिर हैं। और राज्यवार परिस्थति के मुताबिक राजनीतिक कार्यभार, कार्यक्रम और रणनीति तय करने के बहाने बुद्धदेव, निरुपम सेन और विमान बोस के दिशा निर्देश के तहत पाखण्डवाद के नये डायलिटिकिस रचकर जेएनयू पलट कामरेड करात दम्पति और सीताराम येचुरी- बसु और नम्बूदरीपाद, सुरजीत और डांगे की विरासत कोही आगे बढ़ा रहे हैं। मसलन माकपा और भाकपा अब भी तीसरे विकल्प की बात करके सौदा को जिन्दा रखे हुए हैं। केन्द्र सरकार को अस्थिर बनाकर जनतापार्टी, जनता दल और फिर कांग्रेस की केन्द्र सरकार पर दबाव बनाकर वामपंथी अबतक केरल, बंगाल और त्रिपुरा में हर जनविरोधी कार्रवाई और नरसंहार संस्कृति को अंजाम देते रहने की खुली छूट हासिल करती रही है। पहले कांग्रेस के खूनी पंजे को तोड़ना सर्वोच्च प्राथमिकता थी। जबकि दर हकीकत पहले कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नंबूदरी पाद की ब्रखास्तगी के बावजूद वामपंथी जवाहर लाल नेहरु और इन्दिरा गांधी को समाजवादी मानते रहे। दोनों सोवियत विकास माडल और रुसी विदेश नीति के अनुयायी और गुट निरपेक्ष आंदोलमन के नेता थे। नेहरू की रूसपरस्ती के मद्देनजर कम्युनिस्ट नेतृत्व ने तेलंगना महाविद्रोह और ढिमरी ब्लाक किसान आन्दोलन से दगा भी किया। फिर बंगाल में नक्सलवादी आन्दोलन को कुचलने में ज्योति बसु और सिद्धार्थ शंकर राय सत्ता की प्रबल मारामारी के बावजूद एकाकार थे। बंगाल में सत्तर दशक का वह खूनी अध्याय माकपा कांग्रेस गठबंधन का चरमोत्कर्ष था। जिसे अब दलित बंगाली शरणार्थियों को देश निकाला अभियान और अमेरिका परस्त पूंजीवादी विकास के जरिये बुद्ध और प्रणव की जोड ने राष्ट्रीय बना ठोड़ा है।

भारत चीन सीमाविवाद को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पा्र्टी का विभाजन हो गया । मूल भाकपा कांग्रेस की पिछलग्गू बनी रही सोवियत इशारे से। पर माकपा चीन को हमलावर नहीं मानती और सीमाविवाद के लिए नेहरु को जिम्मेवार मानती रही। ऱूस चीन समन्वय खत्म होने के बाद माकपाई चीनी लाइन पर चलने लगे। किन्तु जब बीजिंग में बंगाल में वसन्त का वज्र निनाद सुनायी पड़ा तो माकपाई सहम गये। इस बीच बांग्लादेश युद्ध के दौरान भारत सोवियत मैत्री संधि पर दस्तखत के साथ भाकपा की पहचान इंदिरा कांग्रेस के चुनाव चिह्न गाय बछड़े तक सिमटकर रह गयी। भाकपा ने इंदिरा के आपातकाल का पुरजोर समर्थन किया । इससे पहले १९७१ के मध्यावधि चुनाव में भाकपा कांग्रेस के साथ मोर्चाबद्ध थी। दूसरी तरफ रूसपंथी समाजवादी इंदिरा गांधी को तानाशाह बताते हुए उसे उखाड़ने के लिए अमेरिकापरस्त पूर्व राजा रजवाड़ों, समाजवादियों और संघ परिवार के साथ जुड़ गयी माकपा। इसमे बसु, नंबूदरीपाद और सुरजीत की खास भूमिका थी। इस तरह उत्तर भारत में माकपा की भूमिका चिरकुट की हो गयी। इसीतरह वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए फिर अमेरिकापरस्त संघ परिवार से गठजोड़।

गौरतलब है कि कांग्रेस की विदेशनीति और आर्थिक नीतियो के पूरी तरह अमेरिकी हो जाने से पहले तक माकपा उसे नंबर एक दुश्मन मानती रही। विश्व बैंक ने मनमोहन सिंह को भारत का वित्त मंत्री बना दिया और नवउदारवादी अर्थव्यवस्था चालू हो गयी तो ५६ हजार कल कारखानों को बंद कराने के बाद, चायबागानों, जूट और कपड़ा उद्योग को तबाह करने के बाद माकपा ने मनमोहन के प्रधानमंत्रीत्व में पूंजीवादी विकास का रास्ता अपना लिया। मजे की बात है कि वोट की राजनीति में माकपा इन्हीं आर्थिक नीतियों और विदेशनीतियों, अमेरिकापरस्ती के खिलाफ बोलते हुए कदम दर कदम कांग्रेस का सहयोग करते हुए उसे जनविरोधी और राष्ट्र विरोधी कहने से नहीं हिचकिचाती। जब अमेरिका के खिलाफ थी कांग्रेस तब माकपा उसके सख्त खिलाफ थी। और अब जब कांग्रेस मनमोहन प्रणव कमलनाथ चिदम्बरम की अगुवाई में पूरीतरह अमेरिकी हो गयी तब कांग्रेस की सबसे बड़ी सहयोगी माकपा। कीसिंजर का राइटर्स में भव्य स्वागत, इंडोनेशिया में कम्युनिस्टों के कत्लेआम के लिए कुख्यात सलेम के खातिर नंदीग्राम में कैमिकल हब के लिए नरसंहार और भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेवार यूनियन कार्बाइड खरीदने वाली नापाम बम विशेषज्ञ डाउज को बंगाल में न्यौता की वैचारिक पृष्ठभूमि क्या है- बतायेंगे कामरेड?

सिंगुर टाटा के हवाले पर ओड़ीशा में पास्को का विरोध।
नंदीग्राम में कैमिकल सेज के लिए नरसंहार और अन्यत्र सेज का विरोध।
उत्तर प्रदेश में रिटेल चेन का विरोध और बंगाल की गली मोहल्ले में रिटेल चेन की
धूम।
किसान आन्दोलन आन्ध्र और उत्तराखंड में, बंगाल में नहीं।
मजूर आन्दोलन केरल, त्रिपुरा और बंगाल के भूगोल से बाहर।
बंगाल में बांग्ला ब्राह्मण राष्ट्रीयता का माकपाई वर्चस्व और राष्ट्रीयता आन्दोलन को सिरे से खारिज करना।
मोदी के हिंदू कार्ड का विरोध और तसलिमा नसरीन का निष्कासन।

कोई इस पाखणडवादी डायलिक्टेक्स का दूसरा नमूना पेश करके दिखायें।


अब माकपा देशभर में पार्टी का आधार बनाने के कार्यभर को रोमांटिक काल्पनिक मानती है। इसी के साथ अब माकपा धर्म पर संघ परिवार का एकाधिकार खत्म करने पर भी जोर देगी। भारतीय समाज को नजरअंदाज करके अमेरिका, रूस और चीन त्रभुज केंद्रित विदेश नीति के मुताबिक नीति रणनीति बनाने वाली माकपा अब भाजपा और संघ परिवार की तर्ज पर भारतीय बनने के फिराक में जाति और ध्रर्म जैसे मुद्दो को तरजीह देगी। जजाहिर है कि साम्राज्यवाद विरोध के बजाय फासीवाद को मुख्य दुश्मण बताकर कांग्रेस के साथ केन्द्र में गठजोड़ और राज्यों में विरोध क बाजीगरी को सैद्धान्तिक जामा पहनाने वाली माकपा अब समाजवादियों और संघियों की तरह ही भारतीय समाज के ताने बाने में ही अपने कायाकल्प के उपाय खोजेगी।

देश के पहले बर्खास्त मुख्यमंत्री कामरेड नम्बूदरीपाद मनुस्मृति आधारित वर्ण व्यवस्था को आर्यसभ्यता की महीम देन बताने सेसकभी नहीं चुके। इन्दिरा गांधी को समर्थन और रूसी विदेशनीति को नीतीगत आधार बनाने की वजह से डांगे की भाकपा को गाय (इंका) का भछड़ा बताने वाली माकपा ने अमेरिकापरस्त संघियों, गैरकांग्रेसवादियों, लोहियावादियों, पूर्व राजा रजवाड़ों और संघ परिवार को समर्थन देकर १९७७ और १९८९ में दो दो बार, पहले मोरारजी देसाई और फिर वीपीसिंह की सरकारे बनाकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया। पर नेहरु गांधी परिवार के समाजवादी रूसपरस्त विकास माडल के अवसान के बाद नवउ