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23 मार्च, 2008

 

• भारत की एनआरआई राष्ट्रविरोधी गुलाम सरकार के असली प्रधानमंत्री ब्राहमण शिरोमणि प्रणव चले बुश की कदमवोशी के लिए

बंगाल के ब्राह्मण ही अगुवा हैं वैश्विक उत्तर आधुनिक मनुस्मृति रंगभेद आधारित यहूदी श्वेत सवर्ण साम्राज्यवाद का। प्रणव के बयानों से साफ जाहिर है कि भारतीय और अमेरिकी जनता को झांसे में रखकर विपक्ष को कोई मौका दिये बगैर भारतीय सत्तावर्ग कैसे अपना वर्चस्व कायम रखने में कामयाब है। बंगाल में नन्दीग्राम नरसंहार से पहले १९७९ में ही वामपन्थियों ने दलितों का कत्लेआम किया था मरीचझांपी ने। ब्राह्मणवादी सत्तावर्ग ने इतिहास की हत्या की है। महादेश के भूगोल को विभाजन का पर्याय बना दिया है। मातृभाषा और संस्कृति, मातृभूमि से निर्लज्ज बलात्कार जारी है। वामपंथी बंगाल में सिंगुर और नंदीग्राम, रिजवानूर त्रासदी के मध्य तसलिमा से निजात पाने के बाद अब भूमि सुधार के दूसरा चरण लागू करने की तैयारी में हैं ताकि बागी सर्वहारा को जमीन, आजीविका और जीवन से वंचित करते हुए गेस्टापो को और मजबूत बनाया जाये। यह सारा खेल प्रणव बुद्ध बुश गठजोड का है़।

क्रांति के मसीहा वामपंथी अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी मुहिम के बहाने मुसलमानों का भयादोहन कर रहा है और संघ परिवार ग्लोबल हिन्दू राष्ट्र के ख्वाब में मशगुल अमेरिका परस्ती में पाखणडी वामपंथियों और सत्ताधारी गुलामों से पीछे नहीं हैं कतई। गांधीवाद एक सवर्ण फर्जीवाड़ा है मूलनिवासियों को अनन्तकाल तक गुलाम रखने के लिए। तो समाजवादी वर्णशंकर विचारधारा है, सत्ता की अवैध संतान। आम जनता भारत महादेश के मूसनिवासियों के कत्लेआम में सबके हाथ खून से सराबोर। आम बजट से कोई राहत नहीं मिली। कारपोरेट बढ़ रहे हैं। सेनसेक्स पतन से तबाह हो रहे हैं आम निवेशक और सत्तावर्ग के खजाने लबालब। राजनीति और अर्थव्यवस्था के सारे तन्त्र प्राकृतिक संसाधनों की लूट से सम्बद्ध। मूलनिवासी मारे जायें, इसी आखेट में साथ साथ हैं सारे हत्यारे। बस, दिखावे का विरोध है। नूरा कुश्ती है। ताकि वध्य को बलि का अंदेशा न हो।   और पढ़ें...
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