वित्तमंत्री चिदम्बरम के प्रायोजित बजट के बाद से चुनावों की विज्ञापनी मंत्रध्वनि गायत्रीमंत्र की तरह जापी जा रही है तमाम विचारधाराओं, पार्टियों, मीडिया और सत्तावर्ग के प्रतिष्ठानिक गलियारों में। अखबारों और टीवी चैनलों ने हायतौबा मचाना शुरू कर दिया कि क्या गजब हो गया कि लोकलुभावन चुनावी बजट के जरिये विकास की गति थाम ली गयी है। दरअसल यह सोची समझी रणनीति है सामूहिक बलात्कारों और नरसंहारों के लिए। बल्कि कारपोरेट जगत की प्रतिक्रियाएं काफी हद तक ईमानदार है। शेयर बाजार में मामूली हलचल के बावजूद उत्तर आधुनिक बाजार के तमाम देशी विदेशी सपनों के सौदागर आश्वस्त है कि बलि से पहले बकरे की पूजा की रस्म ही निभाई गयी है और चुनाव और लोकतन्त्र के नाटक के बावजूद खुला बाजार, जनआखेट, बलात्कार, नीली क्रान्ति, उदारीकरण, निजीकरण, छंटनी, अंग्रेजी साम्राज्यवाद, उच्चतकनीक, भूमि लूट, प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के बंदर बंटवारे की मनुस्मृति रंगभेदी व्यवस्था में कोई फेरबदल नहीं होने वाला। विदर्भ के किसानों को कोई नहीं बचानेवाला और नंदीग्राम, कलिंगनगर, चायबागानों, जूटमिलों, कल कारखानो और खेत खलिहानों में आदमखोरों क महाभोज जारी रहेगा।
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