तीय संसद का बजट सत्र शुरु हो गया। विश्व बैंक गुलाम अमेरिकी औपनिवेशिक सरकार का एजंडा राष्ट्रपित के अभिभाषण से साफ हो गया। विदेशी पूंजी से स्वस्थ मीडिया आम आदमी और अल्पसंख्यकों को फोकस में लाने का पुरजोर प्रयास कर रहा था। पर फोकस में आ गया भारत अमेरिकी परमाणु उदोग। इससे पहले सांसदों को सरविहीन मुर्गियां कहकर विवाद में फंसे अमेरिका स्थित भारतीय राजदूत रणेन सेन का कार्यकाल सालभर और बढ़ाकर सेनसेक्स सत्तावर्ग ने अपने इरादे जता दिये थे। सरकारी कर्मचारियों को बेहतर वेतनमान देकर लोकलुभावन बजट पास करवाकर परमणु सौदे के साथ यूपीए अब मध्याविध चुनाव करवाने की तैयारी में है। णाकपा पार्टी कांग्रेस में यूपीए और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों पर वार भले हों, पर जमीनी स्तर पर वामपंथी कहीं भी सत्तावर्ग के मुकाबले में नहीं हैं। दरअसल वाम नेतृत्व भी सत्तावर्ग का अटूट हिस्सा है। अल्पसंख्यकों और मूलनिवासियों को छलावे में रखकर विचार धारा की ढपली बजाते हुए वामपंथी भी संघ परिवार के नक्शेकदम पर ब्राह्मणवादी हिंदू राष्ट्र के निर्माण में जी जान से लगे हुए हैं। नंदीग्राम और सिंगुर प्रकरण के बाद वामपंथियों के नकली साम्राज्यवाद विरोध, फर्जी धर्मनिरपेक्षता और पूंजीवादी मार्क्सवाद की पोल खल गयी है। अब किस मुंह से वे यूपीए को समर्थन की थोथी दलीलें पेश करेंगे?
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