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21 फ़रवरी, 2008


ब्लॉग्स (1)
पिछले पैंतीस साल से हिन्दी में लिखते रहने की उपलब्धयां अनेक है। झारखण्ड, उत्तराखण्ड और छत्तीसगढ़ के जनसंघर्षों में भागेदारी। उत्तरप्रदेश और बिहार मे मिला भरपूर अपनापा। मध्य प्रदेश और राजस्थान के पाढकों से संवाद बना रहा। पर जनपक्षधर लेखन के लिए अब कहीं कोई गुंजाइश नहीं बनती। सम्पादक प्रकाशक पूछता नहीं। आलोचक पढ़ते नहीं। तमाम लघुपत्रिकाएं पार्टीबद्ध या व्यवसायिक। व्यवसायिक मीडिया और साहित्य बाजार के कब्जे में। पूरा भारतीय उपमहा देश, यह खणड विखण्ड भूगोल इतिहास बालीवूड, कारपोरेट और क्रिकेट में निष्णात। धोनी और ईशान्त शर्मा की उपलब्धियों के सामने फीके पड़ने लगे हैं अमिताभ, किंग खान, सचिन तेंदुलकर, राहुल, गांगुली और अनिल कुंबले। शेयर सूचकांक और विकास दर में उछाल वाले शाइनिंग इण्डिया में एक अप्रतिष्ठत अपतिष्ठानिक मामूसी लेखक की क्या बिसात। किराये के मकान में बसेरा। हिन्दी सेवा के पुरस्कार स्वरुप जीवन में कोई व्यवहारिक कामयाबी नहीं है। मकान मालिक की धमकियां अलग। कूड़ा जमा रखने से अाखिर क्या हासिल होगा? पांडुलिपियों से कफन का इंतजाम तो नहीं होना है। सो, बारह तेरह साल की मेहनत की फसल अमेरिका से सावधान की प्रकाशित अप्रकाशित पांडुलिपियां, तमाम पूरी अधूरी कहानियां, उपन्यास, कविताएं, पत्र, पत्रिकाएं आज कबाड़ीवाले के हवाले करके बड़ी शान्ति मिली। अब कम से कम चैन से मर सकूंगा। अब हमें पांडुलिपियों के साथ फूंकने की नौबत नहीं आएगी। और पढ़ें...