पिछली दफा महाश्वेता देवी को पटखनी देकर संघ परिवार के उम्मीदवार गोपीचंद नारंग को जिताने में उन्होंने गुलजार, कमलेश्वर, गिरिराज किशोर जैसों के साथ गठजोड़ किया था। एवज में वे अकादमी के उपाध्यक्ष बन गये। तबसे योजनाबद्ध ढंग से नारंग को पलीता लगाते हुए वे अपने हक में समीकरण साधते रहे। नारंग खद गद छोड़ने के मूड में कतई नहीं थे। पर वे उखड़ने की हालत में आ गये तो मजबूरन उन्होंने गांगुली को आगे कर दिया। मुकाबले में थे वासुदेवन नायर। जिन्होंने पिछली दफा महाश्वेता दी के हक में नाम वापस ले लिया था। उनके चुनाव संचालक बने के सच्चिदानंदन। पर महाश्वेता खेमा नारंग को रोकने के बाद गांगुली को नायर पर तरजीह दी। आखिर सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय के बाद सुनील साहित्य अकादमी पर काबिज दूसरे महारथी है। यह करिश्मा तो सांसद और प्रबल कांग्रेसी, नेहरु के प्रिय ताराशंकर बंदोपाध्याय तक नहीं कर पाए। महाश्वेता दी बांग्ला ब्राह्मण राष्ट्रीयता के अश्वमेध घोड़े का लगाम थामकर कैसे युद्धघोषणा करते। उनके सिपाहसलार राजेंद्र यादव, केदारनाथ सिंह, कमलाप्रसाद, कृपाशंकर चौबे और दूसरे तमाम रथी महारथी देखते रह गये। सुनील की योजना पूरी हो गयी।
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