Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Take a tour | Family Filter: On
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

16 फ़रवरी, 2008


ब्लॉग्स (1)
नैनो का सपना सपना ही रहेगा, मध्य वर्ग भूमंडलीय खुले बाजार में गुलछर्रे उड़ाने को बेताब। शेयर सूचका विकास का पैमाना मान िलया गया निर्विवाद। देश की स्वतन्त्रता सम्प्रभुता गिरवी पर रख दी गयी। वित्तमंत्री, प्रधानमंत्री, राजनेता वाशिंगटन से तैनात किये जाने लगे। प्रणव जैसा कुलीन ब्राह्मण वास्तविक प्रधानमंत्री बतौर अमेरिका की दलाली कर रहे हैं ठीक वैसे ही, जैसे इंदिरा जमाने में नंबर दो की हैसियत से रुसी दलाली कर रहे थे। वामपंथी तब भी कांग्रेस के साथ थे नेहरु प्रगतिशील थे तो इंदिरा गांधी समाजवादी। अब सोनिया गांधी मनमोहन सिहं धर्म निरपेक्ष। देश प्रदेश की नीतियां सरकारें बदलते ही बदल जातीं ततत्काल, पर नरसिम्हा सरकार के जमाने से जारी नवउदारवाद का तूफान देखिये, थमने का नाम नहीं लेता। भाजपाइयों का हिंदुत्व हो या फिर वामपंथियों का मार्क्सवाद, मायावती का दलित आंदोलन हो या नवीन पटनायक का महान कलिंग या करुणानिधि की द्रविड़ राष्ट्रीयता, भारत को अमेरिका बना देने की आपाधापी जारी। अमेरिकी उपनिवेश में तब्दील हो गया यह विभाजित, रक्ताक्त उपमहादेश। मारे जारहे हैं मुलनिवासी। सेज के बहाने, कैमिकल हब की खातिर, विदेशी पूंजी के लिए अमेरिकी रियासते बन रही हैं। प्ाकृतिक संसाधनों की खुली लूच है। मूलनिवासी आजीविका और जीवन से वंचित। पर नैनो के ख्वाब में मगन नवधनाढ्यों को नंदीग्राम, सिंगुर या लवी मुंबई का खून नजर नहीं आता। बनाने को बना दिये तीन नये राज्य, उत्तराखंड, ऱारखंड और छत्तीसगढ़। राष्रीयताएं किनारे हो गयी और हिंदुत्व का परचम लहराया। पूर्वोत्तर और कश्मीर में विशष सैन्य कानून लागू है पांच दशक से। हमने आपात काल देख लिया। नक्सलवाद का दमन देख लिया। दलितोत्थान देख लिया। हरित क्रंति और समाजवाद के बाद आपरेशन ब्लू स्टार और बाबरी ध्वंस भी देख लिए। इंदिरा और राजीव की हत्यांएं, सांप्रदायिक आंदोलन, पूर्वोत्तर और कश्मीर में आतमकवाद, खालिस्तान आंदोलन और संपूर्ण क्रांति, गैरकांग्रेसवाद का जायजा भी लिया हमने। अब अपनी कृषि, शिक्षा, भाषाओं, संस्कृतियों, लोकधुनों, गीतों, साहित्य, स्वास्थ्य, देशी तमाम कामधंधों कको तबाह होते देख रहे हैं। अमेरिकी दिवालिया अर्थयवस्था का पिछलग्गू हो गया देश। नतीजा देखिये, कैसे गोता मारता शेयर सूचकांक। फिर भी विकास दर के फर्जी आंकड़े जारी करके फरेब में फंसाया जाता हमें। आररक्षण और वेतनमान के जरिये खुशामदी तबका राजकाज में मददगार। टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर और मीडिया भी मनुष्य और प्कृति के चौतरफा सर्वनाश के लिए गोलबंद। किसान या भूखों मर रहे हैं या आत्महत्.ा कर रहे हैं। किस देश के निवासी हैं हम? जिस देश में गंगा बहती है और तमाम नदियां बिक गयीं। रहने को घर नहीं, सारा जहां हमारा। मूलनिवासियों को जड़ों से उखाड़कर वे वंदेमातरम गाते हुए गला काट रहे हैं। कातिल नीली संस्कृति ने पांव पसार लिये हैं। एकजुट हैं ब्राह्मण, यहूदी और श्वेत रंगभेदी कारपोरेट साम्राज्यवाद। छह हजार जातियों में बंटा यह देश हमलावरों से बचा नहीं सकता हमें और हम कायल हैं मनमोहन, चिदम्वरम, आडवाणी, मायावती, बुद्धदेव,नरेंद्र मोदी, वसुंधरा, नवीन, देशमुख, सचिन, सानिया, सोनिया, राहुल , प्रियंका, अमिताभ, ऐश, गांगुली, अंबानी, टाटा जैसे उत्तर आधुनिक आइकनों के। हमें कौन बचायेगा? और पढ़ें...